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शरीर ही ब्रह्माण्ड: एकत्व का सृजन मार्ग

स्त्री और पुरुष अग्नि और सोम है। स्त्री भीतर आग्नेय है तथा बाह्य स्वरूप में सोम है। पुरुष भीतर सौम्य है और बाहर से आग्नेय है। प्रथमत: सौम्य स्त्री आग्नेय पुरुष में आहुत होती है। तब उसका स्थूल स्वरूप नष्ट हो जाता है।

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May 16, 2026
फोटो: पत्रिका

हमारे शरीर होते हैं—स्थूल, सूक्ष्म और कारण। इनका संचालन क्रमश: अपरा प्रकृति, परा प्रकृति और माया करती है। सूक्ष्म शरीर जीवात्मा का क्षेत्र है, प्राणमय कोश है। कारण शरीर मूल में अव्यय पुरुष का, ब्रह्म और माया का क्षेत्र है। इसमें किसी प्रकार की क्रिया नहीं है। सृष्टि का आलम्बन है। क्रिया सूक्ष्म-अक्षर में भी नहीं है, किंतु वह निमित्त कारण है। इसमें हृदय रूप तीन देवता—ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र तथा इनकी शक्तियां प्रतिष्ठित रहती हैं। यह जीवात्मा का क्षेत्र है। स्थूल शरीर ही इसका आश्रय है। जीवात्मा की गतिविधियां सूक्ष्म और स्थूल शरीर तक ही सीमित रहती हैं।


अव्यय पुरुष माया का शक्तिमान है। यहां ब्रह्म की प्रतिष्ठा केवल पुरुष शरीर में ही रहती है और माया की ब्रह्म सम्बन्धित गतिविधियां स्त्री शरीर में चलती हैं। इसके लिए स्त्री शरीर को दो श्रेणियों में बांटा गया है। एक स्त्री की स्थूल देह जिसे नौ द्वारों का पिंजरा कहा गया है। यह देह पुरुष देह की पूरक देह है। इनके कार्य प्रकृति (अपरा-परा) पर आधारित रहते हैं। दाम्पत्य भाव में रहते हैं। एक अन्य शरीर भी होता है स्त्री का जिसकी कार्य प्रणाली स्थूल शरीर का अंग रहते हुए भी स्वतंत्र होती है। यह ब्रह्म-माया का संसार है और केवल इनके ही काम आता है। इसके लिए स्त्री के शरीर में दसवां द्वार या ब्रह्मद्वार होता है। यह द्वार केवल ब्रह्म के आने-जाने के ही काम आता है।

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ब्रह्म का अवतरण साधारण रूप में संभव नहीं है। इसके लिए विशिष्ट मार्ग स्त्री देह में होता है। यह मार्ग दिव्य है क्योंकि यह भीतर और बाहर दोनों ही दृष्टियों से मात्र ब्रह्म के आवागमन से जुड़ा है। जब ब्रह्म इस मार्ग से प्रवेश करता है तो सूक्ष्म स्पन्दन उठते हैं, आनन्दातिरेक की अवस्था में द्वार स्वयं खुलता है। स्थूल इच्छा में यह द्वार खुलना संभव नहीं होता। मानो माया स्वयं इसका नियंत्रण कर रही है। माया ब्रह्म की सृजनेच्छा की परिणति है। सृजन कर्म माया का क्षेत्र है। अत: यह ब्रह्मद्वार भी मूलत: मायाभाव से जुड़ा रहता है। प्रत्येक मादा शरीर में यह ब्रह्म-माया लोक होता है। स्त्री का जीवात्मा पुरुष शरीर से उसके प्रत्येक अंग का अंश लेकर इसी द्वार से अपने शरीर में प्रतिष्ठित करता है, उसका पोषण करता है और समय आने पर इसी ब्रह्मद्वार से उसे भूमिष्ठ कर देता है।


ब्रह्म मार्ग का मुंह गर्भाशय में खुलता है, जिसका पोषण स्त्री के शोणित से होता है। शोणित में अन्न के सभी रस होते हैं। शेष रक्त स्त्री शरीर के सप्त धातुओं का (पुरुष शरीरवत) निर्माण करता है। गर्भाशय की गतिविधियां और कार्यकलाप इस देह से स्वतंत्र रहते हैं। स्थूल शरीर, प्रत्येक योनि का, माता के शरीर से बनता है। मानव-पशु-पक्षी सभी के शरीरों का निर्माण एक ही सिद्धान्त पर होता है। ध्यान परम्परा में दसवां मार्ग विसर्जन का कहा गया है। किन्तु स्त्री देह में यह विसर्जन और सृजन दोनों का मार्ग बन जाता है। जब स्त्री गर्भ धारण करती है तो ब्रह्मांश उसी मार्ग से प्रवेश पाता है। यह द्वार रस और भाव का केन्द्र है। साधना की चरम अवस्था के समान जब इस अग्नि सोमात्मक यज्ञ में प्रणय भाव चरम पर होता है तभी अमृत सोम का प्रवाह आग्नेयी वेदी पर होता है। तब अखण्ड भाव में पूर्णाहुति होकर गर्भ प्रतिष्ठित हो जाता है। पूर्ण घट बनकर उसी बह्मद्वार से भूमिष्ठ हो जाता है। ब्रह्म का प्रवेश आनन्द से जुड़ा है, वहीं उसका निकास सांसारिक बंधनों से समवेत हो जाता है।


चन्द्रमा सूर्यपत्नी है। वह पृथ्वी का अग्नि-पुत्र (आर्तव से निर्मित) भी है। चन्द्रमा स्त्री के प्राणमय कोश को प्रभावित करता है। आर्तव काल में वह द्वार अधिक ग्रहणशील हो जाता है। चंद्र की शक्ति उस द्वार को नाद (जीव) के लिए आकर्षक बनाती है, ताकि सूर्य-आत्मा का अवतरण संभव हो। यह केवल भौतिक गर्भाधान के लिए ही नहीं, आध्यात्मिक साधना में भी चन्द्रमा उस द्वार को ऊर्ध्वगामी बनाता है। सूर्य चेतना-प्रकाश-पुरुष का प्रतीक है, नाद है। आत्मा सूर्य लोक से उतरता है, पुरुष के माध्यम से स्त्री के दसवें द्वार में प्रविष्ट होती है। यही सूर्य-चन्द्र योग है, जिससे सृष्टि का नव प्रादुर्भाव होता है।

चूंकि सूर्य जगत का पिता है, चन्द्रमा माता है, अत: यह द्वार सदा चन्द्रमा के नियंत्रण में कार्य करता है। प्रत्येक मासिक-चक्र की पूर्णता पर ही यह द्वार खुलता है। सन्तान प्राप्ति में सूर्य-चन्द्रमा के अतिरिक्त मंगल (रक्त) और शुक्र (रेत) भी प्रभावी भूमिका निभाते हैं। स्थूल देह प्रकृति (लक्ष्मी) आधारित है, सूक्ष्म (परा) सरस्वती या शब्द ब्रह्म पर आधारित है। चूंकि आत्मा मन-प्राण-वाक् रूप है, अत: ईश्वरीय मन ही प्राण-वाक् रूप में सृष्टि का आधार बनता है। मन की कामना (बीज) माया है। बल रूप है। निर्माण में उपयोगी है (स्वयं कर्ता नहीं है)। माया का कार्य प्रकृति से भिन्न है। अत: भिन्न क्षेत्र में कालानुसार होता है। नवें द्वार पर्यन्त जीवात्मा का क्षेत्र है। जीवात्मा के कार्यकलाप अन्न के माध्यम से चलते हैं।


स्त्री और पुरुष अग्नि और सोम है। स्त्री भीतर आग्नेय है तथा बाह्य स्वरूप में सोम है। पुरुष भीतर सौम्य है और बाहर से आग्नेय है। प्रथमत: सौम्य स्त्री आग्नेय पुरुष में आहुत होती है। तब उसका स्थूल स्वरूप नष्ट हो जाता है। अब वह स्थूल देह के प्रति सजग नहीं रहती उसका समस्त क्रिया भाव अक्षर के साथ जुड़ जाता है। प्राण स्वरूपा होकर वह अपने पुरुष के लिए कर्मों को संचालित करती है। विवाह में पिता द्वारा वर में प्राणों के स्थापन के साथ ही वह आहुत होकर वर में प्रतिष्ठित हो जाती है। यहीं से उसकी सूक्ष्मता की, दिव्यता की यात्रा आरम्भ हो जाती है। उसके सृजन कर्म का अलौकिक मार्ग प्रशस्त होता है। अपनी सौम्य आकृति से वह पति को आकर्षित करती है ताकि ब्रह्म बीज को स्वगर्भ में स्थापित कर सके। एक नारी के जीवन का वह क्षण गौरवमय होता है जब वह अपने अनुराग में बंधे पुरुष से उत्कट प्रेम के प्रमाणस्वरूप संतान प्राप्त करे। यहां यह प्रणय भाव सात्विक व सुमधुर होता है।


यह पुण्य सृजनकर्म पुन: सूक्ष्मता के परस्पर यज्ञीयकरण से ही संभव है जहां सोम की आहुति अग्नि में होनी है। स्त्री शरीर में क्षर-अक्षर एक साथ तीर्थरूप रूप में विद्यमान रहते हैं। ब्रह्म का स्वरूप भी निर्विकार है, बदलता नहीं है। हां, इससे अवतरित चेतना का प्रतिबिम्ब मार्ग के भोग और संस्कार से प्रभावित अवश्य होता है। अत्यधिक भोगों से स्त्री के सूक्ष्म शरीर पर आरोपित संस्कार, गुणधर्म से चित्त में विक्षेप और संस्कारों का संघर्ष उत्पन्न होता है। इससे दसवें द्वार की दैविक एकाग्रता भंग हो जाती है। जो मार्ग एक ही नाद, एक ही भाव से, ब्रह्म के अक्षर-अवतरण के लिए था, वह क्षर (जीव) और माया भाव का संगम बन गया।


यह दिव्य द्वार स्वभावत: एकत्व का द्वार है- अक्षर से जुड़ने के लिए-एकरस के लिए। भोग भावना से उसमें अनेकता आ जाती है। तब वह अक्षर- चेतना को आकर्षित न करके माया के बहुरूपों को आकर्षित करने लगता है। अब वह सामान्य मार्ग सा होकर जड़ हो जाता है। अवतरित चेतना का प्रतिबिम्ब भी विकृत हो जाता है। एकनिष्ठता ही दैविक द्वार की कुंजी है। योग भाव से नाद को समर्पित रहता हुआ माया का स्वरूप एकाग्र-प्रसन्न-तपोमय हो जाता है।

क्रमश: gulabkothari@epatrika.com

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