
विष्णु सोमवंशी हैं। सोम ही बीज है जो अग्नि में आहुत होकर निर्माण करता है। पुरुष सृष्टि नहीं करता, बीज का वपन करता है। सृष्टि का एक सिद्धान्त है—तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्—ईश्वर निर्माण करके उसके भीतर ही प्रवेश कर जाता है। सोम ही अन्न है, सोम ही बीज है। सोम ही अग्नि में आहुत होकर अग्नि में प्रवेश कर जाता है। बाहर से भस्म होता जान पड़ता है, किन्तु ऐसा होता नहीं है। वह अग्नि से जुड़कर अग्निसोमात्मक सृष्टि का निर्माण करता है।
विष्णु परमेष्ठी के अधिष्ठाता प्राण हैं। इसके तीन मनोता हैं—भृगु, अंगिरा, अत्रि। परमेष्ठी सोमलोक है। सोम भृगु की विरल अवस्था है। परमेष्ठी के एक क्षेत्र में आप: का निर्माण होता है—स्वयंभू के अग्नि प्राण के योग से। यह क्षेत्र मह:लोक कहलाता है। जिसके लिए कृष्ण कह रहे हैं—ममयोनिर्महद्ब्रह्म…। भृगु के आप:-वायु-सोम से सोम ही सूर्य पर आहुत होता है। आप: (जल) तो अग्नि को बुझा देता है। भृगु के स्नेहन और शर्करा ही वायु की सहायता से अग्नि में आहुत होते हैं।
पुरुष विष्णु है, स्त्री सौम्या है, शुक्र है। पुरुष की शक्ति है। पुरुष का सोम भाग स्त्री की अग्नि में आहुत होता है। आप: नहीं होता आहुत। स्त्री शोणित सोम को लेकर आगे बढ़ता है, स्त्री भ्रूण की ओर। इसी प्रकार स्त्री का सौम्य शरीर भी पुरुष के अग्नि शरीर में आहुत होता है। पुरुष शरीर से बीज के घटक बटोरता है। सोमाहुति के बाद तो जल (आप:) ही शेष रह जाता है। जल अग्नि का शत्रु होता है।
स्त्री-पुरुष दोनों ही भीतर आत्मा हैं। भारतीय विवाह का स्वरूप इसी आत्मिक धरातल पर प्रभावी होता है। जीवन-यात्रा के गतिमान होने की और प्रसारित होने की कामना पुरुष मन (श्वोवसीयस मन) में उठती है। सूक्ष्म शरीर के हृदय (ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र अक्षर प्राणों का संस्थान) में उत्पन्न मन तक पहुंचती है। मन कामनापूर्ति के लिए प्राणों को प्रोत्साहित करता है। कामना ही भूख (अशनाया) कहलाती है। स्त्री ही पुरुष-मन में कामना पैदा करने वाली शक्ति है। कामना मन का बीज है जो क्रिया द्वारा जीवन को गति प्रदान करती है।
हृदय में तीन अक्षर प्राण हृ-द-य- रहते हैं, जिनको वेद विज्ञान में लेने वाला- देने वाला- नियमन करने वाला कहा है। भूख की पूर्ति अन्न (सोम) से होती है। अग्नि में सोम की आहुति से होती है। जिस प्रकार बाहर में स्त्री का सौम्य शरीर पुरुष के आग्नेय शरीर में आहुत होता है, वैसे ही विष्णु प्राण बाहर से अन्न लाकर (ब्रह्मा के केन्द्रस्थ ब्रह्म की) जीवात्मा को तृप्त करता है। इस अन्न में देव-प्राण भी रहते हैं और असुर-प्राण भी। अन्न के साथ दोनों ही प्राण शरीर में जाते हैं। विष्णु पत्नियां, सरस्वती एवं लक्ष्मी यह कार्य करती हैं। सूक्ष्म देह स्थित विष्णु ऊपर परमेष्ठी लोक में (आकाश रूप) शब्द से जुड़े हैं। नीचे की ओर पृथ्वी की अर्थ सम्पदा से जुड़े हैं। दोनों मिलकर अन्न का स्वरूप निर्मित करती हैं। दोनों साथ ही रहती हैं। शब्दान्न शब्द-सृष्टि का तथा अर्थान्न अपरा प्रकृति का निर्माण करता है।
यहां यह बात समझना आवश्यक है भूख स्थूल देह में पहले पैदा होती है तब तो स्त्री देह की स्थूल और सूक्ष्म भावों की आहुतियां निर्माण का स्वरूप तय करती हैं। चूंकि भावना त्रिगुणात्मक होती है अत: अन्न के गुण बदल जाते हैं। यहां स्त्री स्वयं अन्न बनकर आहुत हो रही है। विवाह (भारतीय) के बाद दोनों के शरीर यज्ञ के साथ एक हो जाते, आत्मा एक हो जाता है। स्त्री का सोम पुरुष में सदा के लिए - एक संकल्प के साथ - आहुत हो जाता है। अन्य पुरुष को वहां सोम उपलब्ध ही नहीं रहता। स्त्री की सौम्यता पुरुष जीवन का स्थायी भाव बन जाती है। मृत्युपर्यन्त दोनों का अग्निसोमात्मक यज्ञ अनवरत चलता रहता है। जिस प्रकार पारमेष्ठ्य सोम और सूर्य की सावित्राग्नि का प्रकृति यज्ञ चलता रहता है।
विवाह पूर्व स्त्री की सौम्यता स्वतंत्र होती है। उसके सभी सम्बन्धों का आधार हर्षोल्लास और माधुर्य ही होता है। विवाह पश्चात् इस स्नेहन और माधुर्य का बड़ा अंश आहुत हो चुका होता है। उसका भीतर का आग्नेय भाग पति के साथ जीवन यात्रा में सहभागी बन चुका होता है। उसका आत्मिक भाव भी भावी जीवन के अनुसार पति के आत्मा के साथ एकाकार हो चुका होता है। शरीर इस यात्रा में कर्म का माध्यम रहकर गौण हो जाता है। गृहस्थ जीवन में भी स्त्री के लिए शरीर गौण तथा आत्मा प्रधान हो जाता है। जीवन की सभी गतिविधियों से भौतिक शरीर का उपयोग एक मर्यादा में बंधकर रह जाता है, जिसमें परम्पराएं भी शामिल हो जाती हैं। कर्तव्य धर्म का रूप ले लेता है।
स्त्री का यह धर्म-भाव पुरुष जीवन का निर्माण करता है। धैर्य और सहनशीलता उसकी विशिष्ट पहचान होती है, जो आज केवल भारतीय परम्परावादी स्त्री में ही देखी जाती है। शिक्षा ने उसके अहंकार को बढ़ा दिया। उसे बात-बात पर ठेस लग जाती है। मौन तो छूट ही गया, जो एक परिपक्व महिला का आभूषण रहा है। शिक्षा ने उसकी परोक्ष भाषा भी छीन ली। वह भी पुरुष की तरह आक्रामक होने लगी है। उसके भीतर की अग्नि का ही पोषण हो रहा है।
एक परिपक्व स्त्री क्षमावान होती है। उसको मात्र पति को प्रसन्न करने के लिए जीना है। बाकी विश्व उसके लिए विश्व-मात्र है। हाँ, उसका मातृ भाव सबको उपलब्ध रहता है। स्नेहन पति और सन्तान को सींचने के काम आता है। सन्तान में वह पति की ही छवि देखती है। पति ही उसके शरीर में प्रवेश करता है, सन्तान बनकर बाहर आता है। उसके लिए सन्तान भी पति की भाँति परमेश्वर ही है। उसके गर्भ से हर सन्तान भगवान बनकर ही बाहर आती है। इसीलिए वह भगवती है। भग का एक अर्थ—धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, यश और श्री है। यही भगवान के लक्षण हैं।
स्त्री का तप ही उसके हृदय स्थित जीव को विज्ञान और आनन्द की ओर (मुक्ति साक्षी) प्रेरित करता है। पति हृदय का ब्रह्मांश प्रभावित होता है। गृहस्थाश्रम में सन्तान के साथ ब्रह्मांश को जोडऩे के प्रयास स्त्री करती है। अन्य पुरुष के साथ यह अनिवार्यता नहीं रहती। वहां वह भी आग्नेय होती है। स्त्री की इस दिव्यता का संचालन उसका यज्ञीय स्वरूप ही कर सकता है। सत्य का मार्ग एक ही होता है, असत्य के अनन्त मार्ग हैं। कहा है—ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या। आनन्द भाव में दोनों आत्मा पुन: अपने स्वरूप में लीन हो जाते हैं।
अग्नि सदा ऊपर उठती है। उठने के साथ ही शीतल होती जाती है। तैंतीसवें स्तोम पर पहुंचकर सोम में परिवर्तित हो जाती है। सोचिए! सौ साल के जीवन में पुरुष की क्या स्थिति बन जाती है! स्त्री भी सौम्या है। नीचे आते-आते घर्षण से ही उष्ण होती जाती है। यह भी सच है कि दोनों की स्थितियों का यह परिवर्तन स्वत: नहीं हो जाता। सोम के यज्ञ से घन अग्नि तरल और तरल से विरल होता है। परम्परा से तो सोम विवाह के साथ ही अग्नि में लीन हो गया। उसका स्वतंत्र स्वरूप ही शेष नहीं रहा। दूसरी ओर उसका स्थूल शरीर पहचान मात्र रह गया। शेष विश्व के लिए उसका आप: (जल) भाग रह गया। अन्य अग्नि वहां तक पहुंचते-पहुंचते बुझ जाएगा।
सृष्टि पुरुष की होती है, स्त्री की नहीं। आम लगने का आधार पहले गुठली, बाद में धरती मां। स्त्री के सोम को तो अग्नि के भीतर, उसका अंश रहकर ही जीना है। भीतर रहकर शनै:-शनै: अग्नि को तरल और विरल करते जाना है। कर्मयोग-ज्ञानयोग-भक्तियोग से होकर बुद्धि योग (वैराग्य) तक ले जाना है। गृहस्थाश्रम के अन्त में पति को भी निवृत्ति मार्ग पर साथ रखना है। उसका परोक्ष भाव उसकी दिव्यता का प्रमाण है। धैर्य, सहन करना और क्षमाशीलता में उसकी परिपक्वता झलकती है।
इस सम्पूर्ण यात्रा का एक ही बड़ा उद्देश्य है—उष्णता और अहंकार से मुक्ति—पुरुष की। दोनों सूक्ष्म शरीर में ही जीते हैं। कारण शरीर से नित्य प्रारब्ध का भोग भी बना रहता है। इसके परिणामस्वरूप सुख-दु:ख का उतार-चढ़ाव बना रहता है। यह परीक्षा काल होता है। पुरुष और स्त्री दोनों का त्रिगुणी स्वरूप, अन्न के साथ सूक्ष्म मनोभावों का उपयोग सोच-समझकर करना पड़ता है। यह उचित संगत और मन की स्थिरता पर आश्रित है। स्त्री भीतर ही भीतर पुरुष मन को कामनाओं से बाहर निकालती जाती है, जबकि वह स्वयं कामना बनी रहती है—अपने संकल्पित स्वरूप में। ऋत रूप में पुरुष की कामना को आवृत्त किए रहती है। अन्य कामनाओं के लिये बाधा बनी रहती है। नीतिशास्त्र में पारंगत होने से तथा परोक्ष भाषा के उपयोग से पुरुष को भनक भी नहीं पड़ती कि उसके साथ क्या हो रहा है। बस, यही माया का स्वरूप और भूमिका है।
क्रमश:
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