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बद्र समझौता: सहयोग की नई धुरी और भारत के सामने चुनौती

बद्र समझौते की परिकल्पना इसी निर्भरता को साझा औद्योगिक सामथ्र्य से घटाने की है। तुर्किये अपनी विकसित होती रक्षा-तकनीक, कतर पूंजी और पाकिस्तान अपने रक्षा-निर्माण संबंधी अनुभव का योगदान दे सकते हैं।
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जयपुर

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Opinion Desk

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विनय कौड़ा

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Updated: 30 Oct 2026, 7:50 PM IST

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राष्ट्रों की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ केवल अपनी सीमाओं पर ध्वज फहराना नहीं, बल्कि इतिहास के निर्णायक क्षणों में अपने विवेक से अपना पथ चुनना है। दोहा में इंडोनेशिया, तुर्किये, पाकिस्तान और कतर के बीच हस्ताक्षरित बद्र समझौता-ज्ञापन इसी मूल प्रश्न को हमारे सामने रखता है कि क्या राष्ट्र अपनी शक्ति के लिए नए साझेदार खोज रहे हैं अथवा अनजाने में अपनी स्वतंत्रता के नए बंधन भी गढ़ रहे हैं? इंडोनेशिया के लिए बद्र समझौते का आकर्षण समझने योग्य है। वह अपनी रक्षा-उत्पादन क्षमता बढ़ाना, संयुक्त अनुसंधान को प्रोत्साहित करना और विदेशी हथियार-आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता घटाना चाहता है। अमरीका और इजरायल के ईरान के विरुद्ध युद्ध तथा उसके पश्चिम एशियाई प्रभावों ने इस प्रश्न को अधिक तीव्र बनाया है कि संकट की घड़ी में बाहरी सुरक्षा-व्यवस्थाएं कितनी विश्वसनीय रहती हैं। अस्त्र अपने हाथ में हो, किंतु उसकी सामथ्र्य की कुंजी दूसरे के पास हो तो शक्ति और पराधीनता का यह विचित्र सह-अस्तित्व राष्ट्र की रणनीतिक स्वतंत्रता को प्रश्नांकित करता है।
बद्र समझौते की परिकल्पना इसी निर्भरता को साझा औद्योगिक सामथ्र्य से घटाने की है। तुर्किये अपनी विकसित होती रक्षा-तकनीक, कतर पूंजी और पाकिस्तान अपने रक्षा-निर्माण संबंधी अनुभव का योगदान दे सकते हैं। इंडोनेशिया अपने विशाल घरेलू बाजार और औद्योगिक संभावनाओं के माध्यम से इस व्यवस्था को व्यापक आधार प्रदान कर सकता है। किंतु समझौते पर हस्ताक्षर कर देना और तकनीकी आत्मनिर्भरता अर्जित कर लेना दो भिन्न उपलब्धियां हैं। कारखाने स्थापित करने, बौद्धिक संपदा के अधिकार निर्धारित करने और संवेदनशील तकनीक का वास्तविक हस्तांतरण सुनिश्चित करने में वर्षों लग सकते हैं। तुर्किये का रक्षा-उद्योग भी उन्नत इंजनों, सेंसरों और कुछ इलेक्ट्रॉनिक घटकों के लिए पश्चिमी तकनीक से पूरी तरह मुक्त नहीं है।
लेकिन इस समझौते का सबसे दिलचस्प पक्ष इंडोनेशिया की विशिष्ट स्थिति है। पाकिस्तान की सुरक्षा-चिंताओं का केंद्र भारत है। कतर के सामने खाड़ी क्षेत्र की अस्थिरता और ईरान से संबंधित प्रश्न हैं। तुर्किये की अपनी क्षेत्रीय आकांक्षाएं और इजरायल के साथ जटिल प्रतिद्वंद्विता है। लेकिन इंडोनेशिया की प्राथमिकताएं भिन्न हैं। वह पश्चिम एशिया से भौगोलिक दूरी पर स्थित एक विशाल द्वीपसमूह राष्ट्र है, जिसकी सुरक्षा समुद्री मार्गों, आर्थिक विकास और स्वतंत्र विदेश-नीति से गहराई से जुड़ी है। उसे इन साझेदारियों से रक्षा-क्षमता तो प्राप्त हो सकती है, किंतु उनके क्षेत्रीय संघर्षों की राजनीतिक विरासत स्वीकार करना उसके लिए अनिवार्य नहीं होना चाहिए।

इंडोनेशिया की ऐतिहासिक विदेश-नीति का सूत्र ‘बेबास आक्टिफ’ अर्थात् स्वतंत्र और सक्रिय कूटनीति इसी विवेक का परिचायक है। 1955 के बांडुंग सम्मेलन की उपनिवेशवाद-विरोधी चेतना से निकली उसकी विदेश-नीति की परंपरा ने यह आग्रह किया था कि नवस्वतंत्र राष्ट्र महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता के मोहरे मात्र न बनें। ब्रिक्स की सदस्यता और अमरीका के नेतृत्व में प्रस्तावित बोर्ड ऑफ पीस के साथ उसका जुड़ाव इस व्यापक आकांक्षा को दर्शाते हैं कि इंडोनेशिया अनेक शक्ति-केंद्रों से संबंध रखते हुए अपनी प्राथमिकताएं स्वयं निर्धारित करे। किंतु अनेक मंचों पर उपस्थिति और स्वतंत्र निर्णय-क्षमता एक ही वस्तु नहीं हैं। भारत के लिए बद्र समझौते का प्रश्न इसलिए अधिक संवेदनशील है कि पाकिस्तान की रक्षा-औद्योगिक क्षमता में संभावित वृद्धि दक्षिण एशिया के सामरिक संतुलन को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती है। तुर्किये की तकनीकी विशेषज्ञता, कतर की पूंजी और नए औद्योगिक साझेदार पाकिस्तान को दीर्घकाल में अतिरिक्त विकल्प दे सकते हैं। भारत-पाकिस्तान के ऐतिहासिक संबंधों और मई 2025 के सैन्य संघर्ष की पृष्ठभूमि में इस संभावना का गंभीर आकलन आवश्यक है। किंतु आकलन और आशंका को एक मान लेना रणनीतिक विवेक नहीं होगा। बद्र एक रक्षा-औद्योगिक समझौता है। फिलहाल इसे पारस्परिक रक्षा-संधि कहना उचित नहीं होगा। इंडोनेशिया की भागीदारी से यह निष्कर्ष भी नहीं निकलता कि वह भारत के विरुद्ध पाकिस्तान की ओर से सैन्य हस्तक्षेप का दायित्व स्वीकार कर चुका है। न ही बद्र समझौते में उसकी उपस्थिति उसे स्वत: तुर्किये, पाकिस्तान और सऊदी अरब की अलग मक्का रक्षा-व्यवस्था का सदस्य बनाती है।
यहीं भारत-इंडोनेशिया संबंधों का महत्व सामने आता है। इन संबंधों को किसी तात्कालिक रक्षा-समझौते की छाया में सीमित करके देखना दोनों देशों के ऐतिहासिक और सामरिक हितों के साथ अन्याय होगा। भारत और इंडोनेशिया के बीच समुद्री संपर्क, व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और एशियाई सभ्यताओं की दीर्घ स्मृति से निर्मित संबंध हैं। रामायण और महाभारत की कथाओं ने इंडोनेशियाई सांस्कृतिक जगत में अपने विशिष्ट रूप ग्रहण किए। यह इतिहास इस बात का स्मरण है कि भारत और इंडोनेशिया के संबंध सामरिक गणनाओं से कहीं अधिक व्यापक सभ्यतागत आधार रखते हैं।

आधुनिक काल में भी दोनों देशों की स्वतंत्र विदेश-नीति की आकांक्षा में ऐतिहासिक साम्य दिखाई देता है। भारत की गुटनिरपेक्ष परंपरा और इंडोनेशिया की स्वतंत्र एवं सक्रिय कूटनीति अलग-अलग राष्ट्रीय अनुभवों से विकसित हुईं, किंतु दोनों ने किसी एक शक्ति-गुट के अधीन होने के बजाय अपने निर्णयों का अधिकार सुरक्षित रखने पर बल दिया। राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो की 2025 में भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थिति दोनों देशों के उच्चस्तरीय संबंधों का उल्लेखनीय संकेत थी। आज हिंद-प्रशांत में समुद्री सुरक्षा, व्यापारिक मार्गों की निर्बाधता, रक्षा-उद्योग और क्षेत्रीय स्थिरता दोनों के साझा हितों के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं।

भारत को इसलिए इंडोनेशिया की नई साझेदारियों को केवल संदेह की दृष्टि से देखने के बजाय अपनी साझेदारी की उपयोगिता और विश्वसनीयता बढ़ानी चाहिए। भारत की सामरिक दृष्टि का उद्देश्य इंडोनेशिया के विकल्प सीमित करना नहीं, बल्कि उसे ऐसे विश्वसनीय विकल्प उपलब्ध कराना होना चाहिए जिनसे उसकी स्वतंत्रता मजबूत हो। किसी राष्ट्र को अपने पक्ष में रखने का सबसे टिकाऊ मार्ग उस पर दबाव डालना नहीं, बल्कि उसके राष्ट्रीय हितों के लिए उपयोगी साझेदार बनना है। साथ ही, हमें पाकिस्तान की रक्षा-क्षमता में संभावित परिवर्तन का आकलन वास्तविक उत्पादन-परियोजनाओं, तकनीकी हस्तांतरण और वित्तीय प्रतिबद्धताओं के आधार पर करना चाहिए, न कि केवल बद्र समझौते के राजनीतिक प्रतीकवाद से निष्कर्ष निकालना चाहिए।

इतिहास उन्हीं राष्ट्रों को स्थायी प्रतिष्ठा देता है जो सहयोग को सामथ्र्य में और सामथ्र्य को स्वतंत्रता में बदलना जानते हैं। इंडोनेशिया के लिए बद्र समझौते की असली परीक्षा यही है कि वह अपने साझेदारों से तकनीक ग्रहण करे, किंतु उनकी प्रतिद्वंद्विताओं का अनिवार्य उत्तराधिकारी न बने। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अपने औद्योगिक सामथ्र्य, कूटनीतिक विश्वास और ऐतिहासिक निकटता के आधार पर इंडोनेशिया से अपनी एशियाई साझेदारी को और सुदृढ़ करे। क्योंकि राष्ट्रों की स्वतंत्रता का सर्वोच्च अर्थ अकेले चलना नहीं, बल्कि साथ चलते हुए भी अपनी दिशा स्वयं चुनने का अधिकार सुरक्षित रखना है।

विनय कौड़ा , अंतरराष्ट्रीय विषयों के जानकार