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संपादकीय: परवरिश में एआइ का नहीं, स्पर्श का हो महत्व

आज भी बच्चों के लिए पहली और सबसे जरूरी तकनीक एआइ नहीं, बल्कि माता-पिता से मिले संस्कार और जीवन के अनुभव हैं।माता-पिता का दिया ज्ञान, मूल्य और सही-गलत की समझ ही बच्चों के व्यक्तित्व की मजबूत नींव बनाते हैं।
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Aug 05, 2026
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हर नई तकनीक सुविधा का वादा करती है, लेकिन इसकी अपनी कीमत होती है। कैलकुलेटर ने गणना की स्वाभाविक क्षमता कुंद की और जीपीएस ने रास्ते याद रखने की आदत। नई चिंता यह खड़ी हो गई है कि कहीं एआइ हमारी परवरिश की सहज मानवीय प्रवृत्ति को ही न हड़पने लगे। क्या कोई अत्याधुनिक एल्गोरिदम एक उदास बच्चे की आंखों में उतर आई नमी पढ़कर उसे वह भरोसा दे सकता है, जो मां के आंचल या पिता के कंधे से मिलता है? क्या कोई चैटबॉट उस क्षण की धड़कन सुन सकता है, जब बच्चा पहली बार अपने माता-पिता को संबोधन देता है। निश्चित ही ये सवाल असहज हैं, लेकिन अब इन्हें टालना संभव नहीं।

चैटजीपीटी निर्माता ओपनएआइ के सीईओ सैम ऑल्टमैन ने बच्चों के लिए एआइ आधारित 'फैमिली पॉडकास्ट' बनाने का इरादा जाहिर किया है। फैमिली कैलेंडर और बच्चों की रुचियों को एआइ से कनेक्ट करने और इस आधार पर ऑडियो पॉडकास्ट बनाने का यह विचार सुनने में भले भविष्य की आकर्षक तस्वीर लगे, लेकिन उसके भीतर गंभीर चेतावनी का संकेत भी छिपा है। वह यह कि तकनीक अब हमारी जेब और दफ्तर से आगे बढ़कर घर के सबसे संवेदनशील कोनों तक पहुंचना चाहती है, जहां माता-पिता अपने बच्चों का व्यक्तित्व गढ़ते हैं। यदि बच्चों के हर सवाल का उत्तर भी मशीन देगी और उनकी हर उलझन का पहला दरवाजा भी वही बन जाएगी, तो माता-पिता की भूमिका आखिर बचेगी कहां? एआइ शिक्षक, सहायक और जानकारी का स्रोत हो सकता है, उसका विरोध समाधान भी नहीं है। लेकिन जिस दिन हमने इसे भावनात्मक रिश्तों का विकल्प मान लिया, उसी दिन समझ लीजिए कि हमने मनुष्य होने का सबसे मूल्यवान गुण गिरवी रख दिया। वह इसलिए भी क्योंकि बच्चे शब्दों से नहीं, भावों से बड़े होते हैं। उन्हें उत्तरों से अधिक उपस्थिति, एल्गोरिदम से अधिक आलिंगन और स्क्रीन से अधिक स्पर्श चाहिए। परवरिश कोई पहाड़ा नहीं है, जो एआइ रटा देगा। भारतीय संस्कृति में 'मातृ देवो भव, पितृ देवो भव' इस विश्वास की घोषणा है कि बच्चे की पहली पाठशाला मां की गोद है और पहला जीवन-पाठ पिता का व्यवहार। यह इसलिए भी कहा गया है क्योंकि बच्चे का पहला विश्वास, पहला संस्कार और पहला भावनात्मक आश्रय वही है। एआइ ज्ञान दे सकता है, लेकिन विश्वास नहीं।
हो सकता है आने वाले वर्षों में एआइ बच्चों के हर सवाल का जवाब देने लगे। लेकिन जिस दिन बच्चे अपने पहले डर, पहली असफलता लेकर मशीन के पास जाने लगेंगे, उस दिन यह तकनीक की जीत नहीं, हमारी हार होगी। इंटरनेट पर ऑल्टमैन को मिला जवाब- 'क्या हो अगर आप सीधे अपने बच्चों से ही बात कर लें?'- सिर्फ एक तंज नहीं, हमारे समय की सबसे जरूरी चेतावनी है। एआइ का सबसे बड़ा खतरा यह नहीं कि वह मनुष्य से आगे निकल जाएगा, बल्कि यह है कि सुविधा की तलाश में कहीं हम स्वयं कम मानवीय न हो जाएं।

Updated on:
05 Aug 2026 04:26 pm
Published on:
05 Aug 2026 04:24 pm