अनुसंधान के मूल्यांकन का पैमाना अब रस्मी खानापूर्ति के बजाय परिणाम-आधारित होना चाहिए, जो सीधे सामाजिक प्रभाव, नवाचार और व्यावहारिक समस्याओं के समाधान से जुड़ा हो। पीएचडी बौद्धिक विकास, नवाचार और राष्ट्रसेवा की ठोस बुनियाद होनी चाहिए।
शिक्षा अब किताबी ज्ञान के दायरे से निकलकर व्यावहारिक उपयोगिता की ओर उन्मुख हो रही है। इस दिशा में चीन ने एक क्रांतिकारी कदम उठाते हुए शोध-प्रबंध के बजाय कार्यशील उत्पादों के निर्माण के आधार पर इंजीनियरिंग पीएचडी की डिग्री देना आरंभ किया है। पिछले साल देश के डिग्री कानून में विधिवत बदलाव के बाद अब तक 11 ऐसी डिग्रियां प्रदान की जा चुकी हैं। फिलहाल यह विकल्प रणनीतिक और अभियांत्रिकी विषयों तक सीमित है, किंतु 60 से अधिक विश्वविद्यालय इससे जुड़ चुके हैं। अस्तित्व बनाए रखने के लिए शोधपत्र छापते रहने का दबाव अनुसंधान शुचिता से जुड़ी अनेक समस्याओं को जन्म देता है, जैसे पैसा फेंककर छद्म लेखकों से औद्योगिक पैमाने पर शोधपत्र गढ़वाने की प्रथा, फर्जी आंकड़े, तथ्यों और संदर्भों की तोड़-मरोड़, अकादमिक धोखाधड़ी, शोधपत्रों का गिरता स्तर आदि।
यह पहल इन्हीं समस्याओं को निशाना बनाकर शिक्षा जगत को चिप्स और एआइ जैसी उभरती चुनौतियों का सामना करने की कोशिश है। चिंगव्हा और हार्बिन इंस्टीट्यूट जैसे संस्थानों में इसका सफल परीक्षण अमरीका से तकनीकी होड़ में चीनी नीतिव्यूह का अहम हिस्सा है, शोधार्थियों को महज शोधपत्रों की असेंबली लाइन के बजाय जमीनी नवाचार की धुरी बनाने का प्रयास है। ऐसा करने से सैद्धांतिक नींव या डिग्रियों की वैश्विक मान्यता के कमजोर पड़ने का संदेह जरूर जताया गया है, परंतु चीन ने स्पष्ट कर दिया है कि उसका लक्ष्य मौलिक शोध को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे व्यावहारिक धरातल उपलब्ध कराना है।
चीन आज एक शोध महाशक्ति बन चुका है। 2024 में 145 प्रतिष्ठित विज्ञान और चिकित्सा पत्रिकाओं में छपे शोधपत्रों की संख्या पर आधारित 'नेचर इंडेक्स' में चीन ने पहली बार अव्वल स्थान प्राप्त किया। दुनिया के शीर्ष 10 में से 8 संस्थान चीन में हैं। चीन में सांस्कृतिक क्रांति के दौरान, 1966 से लगभग 12 वर्ष तक विश्वविद्यालय बंद रहे और शोध राजनीतिक दबाव तले घुटता रहा। उसके बाद देंग श्याओपिंग के सुधार काल में विज्ञान को आंशिक स्वायत्तता प्राप्त हुई। 1990 के दशक से चीन में अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाने की दौड़ शुरू हुई। 2006 के बाद शी जिनपिंग के नेतृत्व में शोध के साधनों और सुविधाओं में भारी निवेश हुआ।
इस प्रकार आरंभ हुई चीन की दौड़ को राजनीतिक इच्छाशक्ति, त्वरित निर्णय, भारी आर्थिक सहायता, आक्रामक डिजिटल रूपांतरण तथा प्रौद्योगिकी के प्रति सामाजिक उत्साह से उल्लेखनीय बल मिला है। भारत के किसी भी विश्वविद्यालय का नाम दुनिया के शीर्ष 100 संस्थानों में शुमार नहीं है। देश की पीएचडी प्रणाली प्रभावी शोधकर्ता निर्माण करने के बजाय केवल डिग्रियां बांटने पर केंद्रित नजर आती है। पीएचडी का ढांचा जर्जर हो रहा है। शोध-विषय प्राय: दोहराव भरे और दृष्टिपरक होते हैं, अपारंपरिक विचारों के जोखिम से कन्नी काटने वाले।
प्रशासनिक बोझ तले दबे पर्यवेक्षकों के पास मार्गदर्शन के लिए न तो समय है, न ही प्रोत्साहन। तथ्यों को रटना और उगल देना हमेशा से ही भारत में शैक्षणिक सफलता का चमत्कारी नुस्खा रहा है। यही वजह है कि मात्रा गुणवत्ता पर भारी पड़ती है। महज जानकारी को विश्लेषण का जामा पहना देना आम है। मूल्यांकन का भी पूरा जोर प्रकाशनों की संख्या पर होता है, गुणवत्ता पर नहीं। ऐसे में नकल या साहित्यिक चोरी जैसे झटपट समाधानों को बढ़ावा मिलता है। पीएचडी उत्कृष्टता का मानक नहीं, बल्कि एक विशेषाधिकार बनकर रह जाता है।
आर्थिक असुरक्षा भी भारतीय शोधार्थियों के लिए एक बड़ी समस्या है। जेआरएफ-एसआरएफ भुगतान महीनों लटके रहते हैं। कई छात्र कर्ज में डूबते चले जाते हैं। भारत सकल घरेलू उत्पाद का एक फीसदी से भी कम शोध पर खर्च करता है। प्रमुख संस्थानों में भी 30-40 फीसदी छात्र शोध कार्यक्रम बीच में ही छोड़ देते हैं। निजी विश्वविद्यालयों में व्यावसायिक दबाव ने शिक्षा और व्यापार की सीमाएं तो कब की मिटा दी हैं। गलगोटिया जैसे प्रकरण संस्थागत विश्वसनीयता को खोखला करते हैं।
भारत को आज ऐसे शोधकर्ताओं की दरकार है जो विचारों को विश्वसनीय प्रणालियों में बदल सकें। पीएचडी के मूल उद्देश्य की वापसी सुनिश्चित कर इसका लक्ष्य समाजोपयोगी मौलिक ज्ञान के सृजन से जोड़ा जाना आवश्यक है, जहां मूल्यांकन के मानक सामाजिक प्रभाव और नवाचार पर केंद्रित हों। स्टार्टअप, नीति अनुसंधान और उद्योग जगत के साथ सक्रिय सहयोग को पाठ्यक्रम का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा। पर्यवेक्षकों के व्यापक प्रशिक्षण सहित संकाय नियुक्तियों में पूर्ण पारदर्शिता लाकर संस्थानों की जवाबदेही तय करनी होगी।
अनुसंधान के मूल्यांकन का पैमाना अब रस्मी खानापूर्ति के बजाय परिणाम-आधारित होना चाहिए, जो सीधे सामाजिक प्रभाव, नवाचार और व्यावहारिक समस्याओं के समाधान से जुड़ा हो। पीएचडी बौद्धिक विकास, नवाचार और राष्ट्रसेवा की ठोस बुनियाद होनी चाहिए। भारत ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति और यूजीसी के नए नियमों के माध्यम से सुधार की ओर कदम बढ़ाए हैं, लेकिन मंजिल अभी दूर है। कुलीन संस्थानों तक सीमित सुधार समग्र व्यवस्था का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकते हैं? हमारे पास प्रतिभा और दृष्टि की कोई कमी नहीं।
आवश्यकता है एक ऐसे ढांचे की, जो नई संकल्पनाओं, नए विचारों से बिदके नहीं। भारत में वार्षिक विज्ञान डॉक्टरेट्स की संख्या है मात्र दस हजार। क्या 145 करोड़ की आबादी के लिए यह संख्या नाकाफी नहीं? आज भी साल-दर-साल हजारों एम.टेक. और पीएचडी सीटें खाली पड़ी रह जाती हैं। यहां मंशा केवल पीएचडी धारकों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसी दृष्टि विकसित करना है जो जमीनी समस्याओं का समाधान कर सके। चीन उदाहरण न सही, उत्प्रेरक तो बन ही सकता है।