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भीषण गर्मी के दौर में कितना सुरक्षित है बोतलबंद पानी?

बढ़ रहा प्लास्टिक कचरे का बोझ भारत का बोतलबंद पानी उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है और राजस्थान जैसे शुष्क राज्यों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। साथ ही, प्लास्टिक कचरे का बोझ भी बढ़ रहा है। लेकिन वास्तविक चिंता केवल कचरे की नहीं है। चिंता यह है कि अत्यधिक तापमान वाली परिस्थितियों में प्लास्टिक पैकेजिंग के व्यवहार और उसके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों पर सार्वजनिक विमर्श लगभग अनुपस्थित है।

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May 27, 2026
plastic Water bottle

डॉ. मुकेश शर्मा, स्वतंत्र लेखक एवं शोधकर्ता

राजस्थान में गर्मी हर वर्ष नए रेकॉर्ड बना रही है। चूरू, श्रीगंगानगर, बीकानेर और जैसलमेर जैसे क्षेत्रों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच जाता है, लेकिन एक प्रश्न है, जिस पर न सरकार गंभीर चर्चा कर रही है, न उद्योग और न ही समाज- क्या हमारी प्लास्टिक पैकेजिंग व्यवस्था ऐसी भीषण गर्मी के लिए वास्तव में सुरक्षित है? आज राजस्थान के शहरों से लेकर कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों तक बोतलबंद पानी जीवनशैली का हिस्सा बन चुका है। रेलवे स्टेशन हो, बस स्टैंड, पर्यटन स्थल, धार्मिक मेले या सडक़ किनारे दुकानें- हर जगह प्लास्टिक की बोतलें सहज उपलब्ध हैं। सुविधा के इस युग में यह स्वाभाविक भी लगता है, किंतु समस्या वहीं से शुरू होती है, जहां सुविधा और सुरक्षा के बीच संतुलन बिगडऩे लगता है।

बढ़ रहा प्लास्टिक कचरे का बोझ
भारत का बोतलबंद पानी उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है और राजस्थान जैसे शुष्क राज्यों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। साथ ही, प्लास्टिक कचरे का बोझ भी बढ़ रहा है। लेकिन वास्तविक चिंता केवल कचरे की नहीं है। चिंता यह है कि अत्यधिक तापमान वाली परिस्थितियों में प्लास्टिक पैकेजिंग के व्यवहार और उसके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों पर सार्वजनिक विमर्श लगभग अनुपस्थित है। राजस्थान जैसे प्रदेश, जहां गर्मी सामान्य नहीं बल्कि चरम स्तर की होती है, वहां यह प्रश्न और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है। वैज्ञानिक अध्ययनों ने संकेत दिया है कि अत्यधिक तापमान की परिस्थितियों में कुछ प्रकार की प्लास्टिक सामग्री की रासायनिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है। माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक पर हो रहे हालिया शोधों ने भी नई चिंताएं उत्पन्न की हैं। यद्यपि इन प्रभावों के संबंध में वैज्ञानिक समुदाय अभी और प्रमाण एकत्र कर रहा है, फिर भी उपलब्ध निष्कर्ष इतने महत्त्वपूर्ण अवश्य हैं कि उन्हें केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता। जब करोड़ों लोग प्रतिदिन बोतलबंद पानी का उपयोग कर रहे हों, तब यह विषय जनस्वास्थ्य की चर्चा का हिस्सा बनना ही चाहिए।

पैकेजिंग सुरक्षा को लेकर अपेक्षित गंभीरता नहीं
विडंबना यह है कि हम खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता, दवाओं की सुरक्षा और वाहनों के मानकों पर तो विस्तार से चर्चा करते हैं, किंतु पैकेजिंग सुरक्षा पर अपेक्षित गंभीरता दिखाई नहीं देती। विशेष रूप से उन राज्यों में, जहां तापमान देश के अधिकांश हिस्सों से कहीं अधिक रहता है। प्रश्न यह नहीं है कि प्लास्टिक उपयोगी है या नहीं, प्रश्न यह है कि क्या वर्तमान मानक राजस्थान जैसी जलवायु की वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं? समस्या का दूसरा पक्ष आर्थिक है। प्लास्टिक प्रदूषण का मूल्य केवल बाजार में बिकने वाली बोतल की कीमत से नहीं आंका जा सकता। कचरा प्रबंधन, लैंडफिल, जल स्रोतों की सफाई, पर्यावरणीय क्षति और संभावित स्वास्थ्य जोखिमों की लागत अंतत: समाज को ही वहन करनी पड़ती है। यदि किसी उत्पाद की सुविधा का लाभ निजी है, लेकिन उसके दुष्प्रभावों की लागत सार्वजनिक है, तो नीति-निर्माताओं को हस्तक्षेप करना ही पड़ता है।

कई देशों ने मानकों पर किया काम
दुनिया के कई देशों ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं। जर्मनी और नॉर्वे जैसे देशों ने डिपॉजिट-रिटर्न प्रणाली के माध्यम से प्लास्टिक बोतलों की वापसी और पुनर्चक्रण को अत्यंत प्रभावी बनाया है। ऑस्ट्रेलिया जैसे गर्म जलवायु वाले देशों में भंडारण और परिवहन मानकों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इन उदाहरणों का उद्देश्य उनकी नकल करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि वैज्ञानिक नीति और उद्योग की जवाबदेही मिलकर समस्या का समाधान खोज सकती है। भारत में बीआइएस, एफएसएसएआइ और विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (ईपीआर) जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं, किंतु राजस्थान जैसे अत्यधिक गर्म राज्यों के लिए तापमान-आधारित पैकेजिंग सुरक्षा मानकों पर अभी भी पर्याप्त चर्चा दिखाई नहीं देती। जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में अत्यधिक गर्म दिनों की संख्या और बढऩे की संभावना है। ऐसे में पैकेजिंग सुरक्षा का प्रश्न केवल उपभोक्ता सुविधा का नहीं, बल्कि जलवायु अनुकूलन और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा का विषय भी है।

‘समर-सेफ पैकेजिंग मॉडल’ की आवश्यकता
यहीं से एक नए दृष्टिकोण की आवश्यकता सामने आती है- ‘समर-सेफ पैकेजिंग मॉडल’ की। इसका अर्थ केवल प्लास्टिक का विरोध नहीं, बल्कि ऐसी पैकेजिंग व्यवस्था विकसित करना है, जो 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी गुणवत्ता और सुरक्षा के मानकों पर खरी उतर सके। इसके अंतर्गत उच्च तापमान परीक्षण, स्पष्ट तापमान चेतावनी, सुरक्षित भंडारण मानक, जलवायु-विशिष्ट प्रमाणन और प्रभावी पुनर्चक्रण व्यवस्था जैसे उपाय शामिल किए जा सकते हैं। राजस्थान इस दिशा में देश का नेतृत्व कर सकता है। यहां की जलवायु स्वयं एक प्राकृतिक परीक्षणशाला है। यदि राज्य सरकार, वैज्ञानिक संस्थान, विश्वविद्यालय और उद्योग मिलकर गर्म क्षेत्रों के लिए सुरक्षित पैकेजिंग मानक विकसित करें, तो यह केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि विश्व के अन्य गर्म क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी मॉडल सिद्ध हो सकता है। यह अवसर केवल पर्यावरणीय सुधार का नहीं, बल्कि नवाचार, नीति-नेतृत्व और सार्वजनिक स्वास्थ्य संरक्षण का भी है।
अंतत: प्रश्न प्लास्टिक की बोतल का नहीं, सोच का है। हम 50 डिग्री तापमान वाली वास्तविकता में जी रहे हैं, लेकिन हमारी पैकेजिंग नीतियां अभी भी अपेक्षाकृत सामान्य जलवायु की धारणाओं पर आधारित हैं। यदि मौसम बदल चुका है, तो मानक भी बदलने होंगे। राजस्थान की तपती धरती आज हमसे यही पूछ रही है- क्या हमारी प्यास बुझाने वाली व्यवस्था हमारी सुरक्षा की भी उतनी ही चिंता करती है? यदि नहीं, तो अब समय आ गया है कि हम केवल ठंडा पानी नहीं, बल्कि सुरक्षित पानी मांगना शुरू करें।

Published on:
27 May 2026 07:52 pm
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