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बच्चों की जीवन ऊर्जा को सही दिशा देने से मिलतीं उपलब्धियां

राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक विजेता अरुंधति चौधरी की सफलता बताती है कि बच्चों पर अपने सपने थोपने के बजाय उनकी प्रतिभा और रुचि को पहचानना अधिक महत्त्वपूर्ण है। पिता ने उनकी बॉक्सिंग के प्रति रुचि का सम्मान किया और सही मार्गदर्शन दिया, जिसका परिणाम अंतरराष्ट्रीय सफलता के रूप में सामने आया। लेख इस बात पर जोर देता है कि अभिभावकों का अनावश्यक दबाव बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास को प्रभावित कर सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि माता-पिता विशेषज्ञों की सलाह लेकर बच्चों को उनकी क्षमता के अनुरूप आगे बढ़ने का अवसर दें। यही दृष्टिकोण बच्चों को सफल, आत्मविश्वासी और जिम्मेदार नागरिक बना सकता है।
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Aug 05, 2026
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अतुल कनक, स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार

ग्लासगो यूनाइटेड किंगडम के तहत स्कॉटलैंड में जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा शहर है। 23 जुलाई से 2 अगस्त तक यहां राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन किया गया। यूंं तो भारतीय खिलाडिय़ों ने इन खेलों में कई पदक जीते, लेकिन फिलहाल हम बात करेंगे 70 किलोग्राम भार वर्ग में मुक्केबाजी का स्वर्ण पदक जीतने वाली मूल रूप से राजस्थान के कोटा शहर की अरुंधति चौधरी की। अरुंधति चौधरी की कहानी बताती है कि यदि माता-पिता बच्चों पर अपने सपने थोपने के बजाय उनकी प्रतिभा को पहचानें और उनकी ऊर्जा को सही दिशा देने का विवेक जागृत करें तो बच्चों की उपलब्धियां केवल परिवार की ही कीर्ति को नई बढ़ातीं बल्कि देश, समाज को भी गौरवान्वित करती हैं।

बॉक्सिंग की रिंग में च्पंचज् की ताकत आजमाने की चाह
अरुंधति जिस शहर की मूल निवासी है,उस शहर में देश भर के युवा इंजीनियरिंग और मेडिकल के क्षेत्र में चमकदार कॅरियर बनाने की कोशिश में कोचिंग के लिए आते हैं। स्वाभाविक है कि पढ़ाई में सामान्य या सामान्य से कुछ अच्छा प्रदर्शन करने वाले स्थानीय अभिभावकों की भी यह इच्छा होती है कि उनका बच्चा इंजीनियरिंग या मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं में अपना भाग्य आजमाए। अरुंधति के पिता कोटा में ही एक प्राइवेट स्कूल के संचालक हैं। उनकी भी इच्छा थी कि उनकी बेटी आइआइटी की तैयारी करे। लेकिन अरुंधति बॉक्सिंग की रिंग में अपने च्पंचज् की ताकत आजमाना चाहती थी। पिता ने बेटी की इच्छा को स्वीकार किया और अपनी आयु के 24वें वर्ष में राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर अरुंधति ने देश के लिए नई उम्मीदें जगा दीं। उसका इरादा है कि वह ओलंपिक खेलों में ऐसा ही प्रदर्शन करके मिट्टी का कुछ कर्ज उतार सके।
राष्ट्रमंडल खेलों में कुछ ऐसे भी खिलाडिय़ों ने देश का मान बढ़ाया जिन्हें इस मुकाम तक आने के पहले आर्थिक संघर्षों का सामना करना पड़ा। अरुंधति के पिता के सम्मुख ऐसा संघर्ष नहीं था। उन्होंने तो अरुंधति की तैयारी पर अच्छा खासा खर्च भी किया। लेकिन जो एक बात अरुंधति की सफलता की यात्रा में महत्वपूर्ण रही, वह यह कि उसके छुटपन में ही उसके पिता ने उसकी प्रतिभा को पहचान लिया और उसकी उस जीवन ऊर्जा को सही दिशा भी दी,जो विपरीत परिस्थिति में परेशानियों का कारण भी हो सकती थी। उन्होंने अरुंधति की ऊर्जा को नकारात्मकता से बचाने के लिए उन्होंने उसे खेलों में रुचि लेने को कहा। बस,यही एक प्रतिभा के जीवन का टर्निंग प्वांइट था। अरुंधति एक बार रिंग में उतरी तो फिर उसने पीछे मुडकऱ नहीं देखा।

बच्चे की जीवन ऊर्जा को सही दिशा देना महत्त्वपूर्ण
हम इस उदाहरण से समझ सकते हैं कि छोटी उम्र में ही बच्चे की प्रतिभा को पहचानना और उसकी जीवन ऊर्जा को सही दिशा देना कितना महत्त्वपूर्ण है। आज पेरेंटिंग इसीलिए एक महत्त्वपूर्ण विषय होता जा रहा है कि कई बार अभिभावकों की जिद या उनकी नासमझी बच्चों के जीवन से खिलवाड़ का कारण बन जाती है। कुछ सालों पहले एक बच्चे का च्सुसाइड नोटज् बहुत चर्चित हुआ था। उसने लिखा था कि वो इतिहास और अंग्रेजी साहित्य पढऩा चाहता था लेकिन उसके माता- पिता चाहते थे कि वो इंजीनियर बने। माता-पिता के दबाव के कारण उसने इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा की तैयारी तो शुरू कर दी लेकिन वो भौतिकी,रसायन और गणित में अपना मन नहीं लगा पा रहा। उसे लग रहा है कि वो माता-पिता का सपना पूरा नहीं कर सकेगा। इसलिए वह बहुत दबाव में है। काश,माता- पिता ने बच्चे की इस इच्छा को पहचाना होता और उसकी जिस दिशा में बहकर उसकी जीवन ऊर्जा एक धारा बनना चाहती है,उस दिशा में आगे बढऩे की उसे स्वतंत्रता दी होती। देश के मशहूर कवि कुमार विश्वास अक्सर कहते हैं कि उन्होंने इंजीनियरिंग में प्रवेश ले लिया था। लेकिन उन्हें लगा कि उनका मन कविताओं और साहित्य में अधिक रमता है तो उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ कर साहित्य का अध्ययन किया। उनके पिता ने प्रारंभिक तौर पर अपनी खिन्नता व्यक्त की लेकिन बाद में उन्हें मनमाना कॅरियर चुनने की स्वतंत्रता दे दी। कुमार ने समाज में प्रतिष्ठा पाने का पिता का स्वप्न नए तरीके से पूरा किया। माता-पिता कभी बच्चे का बुरा नहीं चाहते। लेकिन उनके अनुभवों की अपनी सीमा होती है। ऐसे में विषय विशेषज्ञों से, मनोवैज्ञानिकों से कॅरियर काउंसलर्स से परामर्श लिया जा सकता है। बच्चे की प्रतिभा को पहचानकर उसकी जीवन ऊर्जा को सही दिशा देना शायद हमारे दौर की सबसे बड़ी जरूरतों में एक है क्योंकि सफलता के साथ हमें बच्चों को एक जिम्मेदार नागरिक होने के संस्कार भी देने होते हैं।

Updated on:
05 Aug 2026 07:49 pm
Published on:
05 Aug 2026 07:00 pm