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डॉ. मनीष जैसल,(शिक्षक एवं लेखक)
कुछ महीनों से सोशल मीडिया पर एक नया ट्रेंड तेजी से लोकप्रिय हुआ है। लोग अपनी साधारण तस्वीर एआइ की मदद से 1990 के दशक के बचपन की तस्वीर में बदल रहे हैं। कहीं पुरानी स्कूल ड्रेस, कहीं रेडियो, टेप रिकॉर्डर, लालटेन, गांव की गलियां और पीपल के पेड़ के नीचे बैठा परिवार। इन तस्वीरों को देखकर लोग कहते हैं, 'यही तो मेरा बचपन था।' लेकिन सवाल यह है कि क्या एआइ सचमुच हमारा बचपन लौटा रहा है, या हमारी वास्तविक यादों की जगह कृत्रिम स्मृतियां गढ़ रहा है? मनोवैज्ञानिकों के अनुसार हमारी स्मृतियां स्थिर नहीं होतीं, बल्कि समय और अनुभवों के साथ बदलती रहती हैं। यदि एआइ से बनी कोई यथार्थवादी तस्वीर बार-बार देखी जाए, तो व्यक्ति उसे वास्तविक याद भी मान सकता है। इसी को मनोविज्ञान में 'फॉल्स मेमोरी' कहा जाता है। सोशल मीडिया पर वायरल 'चाइल्डहुड एआइ चैलेंज', 'देन एंड नाउ' और 'फ्यूचर मी' जैसे ट्रेंड इस मनोवैज्ञानिक प्रभाव को और गहरा कर रहे हैं। लोग अपनी वास्तविक यादों की तुलना एआइ की बनाई कल्पनाओं से करने लगे हैं। हालांकि इस तकनीक का एक सकारात्मक पक्ष भी है। डिमेंशिया, अल्जाइमर और स्मृति ह्रास से जूझ रहे लोगों के लिए एआइ आधारित स्मृति-सहायक प्रणालियों पर दुनिया भर में काम हो रहा है।
पुराने फोटो, आवाज और पारिवारिक कहानियों के माध्यम से ये प्रणालियां स्मृतियों को सक्रिय रखने का प्रयास करती हैं। शुरुआती शोध बताते हैं कि इससे भावनात्मक जुड़ाव और स्मृति जागरण में मदद मिल सकती है, हालांकि इस क्षेत्र में अभी और शोध की आवश्यकता है। समस्या तब शुरू होती है, जब हम अपनी स्मरण शक्ति का काम पूरी तरह मशीनों को सौंप देते हैं। आधुनिक मनोविज्ञान इसे 'कॉग्निटिव ऑफलोडिंग' कहता है। यानी जिन मानसिक कार्यों को पहले हमारा मस्तिष्क करता था, उन्हें अब तकनीक पर छोड़ दिया गया है। पहले लोग फोन नंबर याद रखते थे, अब यह जिम्मेदारी मोबाइल निभाता है। आज दुनिया में 5.5 अरब से अधिक लोग इंटरनेट और 5 अरब से अधिक लोग सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं। जनरेटिव एआइ के कारण बड़ी संख्या में नई डिजिटल छवियां बन रही हैं, जिसने दृश्य संस्कृति और हमारी स्मृतियों से जुडऩे के तरीके को तेजी से बदल दिया है।
भारत भी इस बदलाव का प्रमुख हिस्सा है। भारत दुनिया के सबसे बड़े स्मार्टफोन और सोशल मीडिया उपयोगकर्ता देशों में है। लेकिन बचपन केवल तस्वीरों का नहीं, बल्कि गंध, ध्वनि, स्पर्श और भावनाओं का संसार है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार स्मृतियां अनुभवों का जीवंत ताना-बाना होती हैं। इसलिए यदि आने वाली पीढिय़ां अपने बचपन को एआइ-निर्मित चित्रों से पहचानेंगी, तो उनकी स्मृतियों का स्वरूप भी बदल सकता है। एआइ के साथ सबसे बड़ी चिंता निजता की भी है। किसी एआइ ऐप पर तस्वीर अपलोड करना अपनी पहचान और निजी जानकारी सौंपना है।
हालांकि एआइ का सकारात्मक पक्ष भी है। यही तकनीक पुरानी और धुंधली तस्वीरों को नया जीवन दे सकती है, पारिवारिक यादों को सुरक्षित रख सकती है और सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढिय़ों तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है। यदि एआइ हमारी यादों को सहेजने में मदद करे, तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन अगर वही हमारी यादों को बदलने लगे, सच और कल्पना की सीमा मिटाने लगे, तो हमें सोचना होगा। आखिर स्मृतियां केवल तस्वीरों से नहीं बनतीं वे जीवन से बनती हैं। और जीवन का कोई विकल्प आज भी किसी मशीन के पास नहीं है। बच्चों को पारिवारिक एल्बम देखने, दादा-दादी की कहानियां सुनने की संस्कृति सिखानी होगी। हमें समझना होगा कि बचपन हमारे अनुभवों, रिश्तों, संघर्षों, खुशियों और भावनाओं में जीवित रहता है। एआइ उन यादों को व्यवस्थित कर सकता है और सुरक्षित रखने में सहायता कर सकता है, लेकिन वह उन्हें जी नहीं सकता। इसलिए अगली बार जब कोई एआइ आपके बचपन की तस्वीर बनाए, तो उसे देखकर मुस्कुराइए अवश्य, लेकिन अपने पुराने फोटो एल्बम, दादी की कहानियां, परिवार के साथ बिताए वास्तविक क्षणों को भी याद कीजिए। क्योंकि तकनीक स्मृतियों का माध्यम हो सकती है, उनका विकल्प नहीं।
Updated on:
05 Aug 2026 05:28 pm
Published on:
05 Aug 2026 05:28 pm
