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संपादकीय: पढ़ाई के लिए जान जोखिम में डालने की चिंताजनक मजबूरी

सवाल यह भी कि आखिर क्यों किसी हादसे का इंतजार करने के बाद ही सरकारी मशीनरी की चेतने की बारी आती है। यों तो शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) में स्पष्ट प्रावधान है कि हर बच्चे को उसके घर के नजदीक ही शिक्षा पाने का अधिकार है।
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शिक्षा में तकनीक के इस्तेमाल से स्मार्ट क्लासरूम, ऑनलाइन परीक्षाएं व दूसरे काम उस समय मुंह चिढ़ाते दिखते हैं, जब बच्चों को स्कूल जाने के लिए जान जोखिम में डालनी पड़ रही हो। मध्यप्रदेश के विदिशा जिले के एक गांव में सरकारी स्कूल में पढऩे के लिए आसपास के गांवों से बच्चों को बेतवा नदी को पार करने के जतन करने वाली तस्वीर डराने वाली है। न केवल मध्यप्रदेश बल्कि देश के दूसरे हिस्सों में भी खास तौर से बरसात के दौर में बच्चों को कहीं उफनते नालों, क्षतिग्रस्त रास्तों को पारकर स्कूल जाने की मजबूरी बनी हुई है।

सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतों से जुड़े हादसों की खबरों के बीच इस तरह की तस्वीरें समूची शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाली है। बच्चों की ऐसा दुस्साहस करने की मजबूरी सिर्फ इसीलिए है कि सरकार ने उनके गांव में स्कूल खोलने की या तो फिक्र ही नहीं की और की भी तो जरूरी संसाधन जुटाए ही नहीं। बच्चों की जिंदगी का रोजमर्रा का हिस्सा ही जोखिम भरे सफर में कटने लगे तो फिर वे भला पढ़ाई की चिंता कब करेंगे? सबसे बड़ा सवाल यह कि कहीं बहते नाले में एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर नाला पार करने का जतन करते तो कहीं पानी का बहाव थमने का लम्बा इंतजार करते बच्चे जिम्मेदारों को दिखाई नहीं देते। सवाल यह भी कि आखिर क्यों किसी हादसे का इंतजार करने के बाद ही सरकारी मशीनरी की चेतने की बारी आती है। यों तो शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) में स्पष्ट प्रावधान है कि हर बच्चे को उसके घर के नजदीक ही शिक्षा पाने का अधिकार है। खासतौर से प्राथमिक से माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा तो बच्चों को उनके घर के पास ही मिलनी चाहिए। पिछले वर्षों में सरकारों ने इस बात के प्रयास किए जरूर हैं लेकिन सिर्फ स्कूलें खोलने की मुनादी तक के ही। कहीं स्कूल में शिक्षक हैं तो बच्चे नहीं और कहीं बच्चे हैं तो शिक्षक नहीं। रही-सही कसर स्कूलों के समानीकरण की प्रक्रिया से पूरी हो जाती है।

नामांकन बढ़ाने के प्रयास करने की बजाय स्कूल को बंद कर पास के स्कूल में समायोजित करने का आसान तरीका ही महकमे को समझ में आता है। सरकारी स्कूलों की इमारतें जहां कहीं बेहतर हैं वे जनसहयोग से ही हैं अन्यथा कभी बरसात में छतें टपकने व कभी जर्जर इमारतों के ढहने की खबरेें आए दिन सुर्खियां बनती है। इन स्कूलों में अफसरों के बच्चे तो पढ़ते नहीं। फिर फिक्र कौन करने लगे? शिक्षा का मतलब स्कूल खोलना, बच्चों को किताबें उपलब्ध कराना और परीक्षाएं लेना तक ही नहीं है।पढ़ाई के लिए आवागमन में ही बच्चों को ऐसी मुसीबतें पार करनी पड़े तो यह उनके जीवन संघर्ष की परीक्षा लेना ही कहा जाएगा। मजबूर बच्चों की ऐसी पीड़ा सचमुच झकझोरने वाली है। हमारे देश में अधूरी रहने वाली सड़क व पुल निर्माण योजनाएं भी इस तरह की जोखिम को और तेज करती है। शायद इसीलिए कि बच्चे किसी का वोट बैंक नहीं।