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‘ई-20 नीति’ में ‘जीएम’ का जोखिम तो नहीं छिपा?

दिल्ली यूनिवर्सिटी में जीएम सरसों (डीएमएच-11) पर लंबे समय से शोध और परीक्षण जारी है। इसे सशर्त पर्यावरणीय मंजूरी मिलने के बाद मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में विचारधीन है।
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जयपुर

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Opinion Desk

Aug 04, 2026

ethanol

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मुकेश भूषण,(वरिष्ठ पत्रकार)

पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने के मुद्दे पर जारी देशव्यापी बहस के बीच, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) और अन्य राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के वैज्ञानिकों के एक समूह ने गोलमेज बैठक कर अनुवांशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसलों के परीक्षण के विनियामक ढांचे (रेगुलेटरी स्ट्रक्चर) को 'अधिक सुव्यवस्थित और विज्ञान-आधारित' बनाने की वकालत की है। तर्क दिया गया कि जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा और कृषि उत्पादकता की चुनौतियों से निपटने के लिए आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी का सुरक्षित उपयोग आवश्यक है। इस सुझाव में जीएम फसलों के परीक्षण में तेजी लाने की मंशा साफ दिखाई देती है। यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिम एशिया संकट के कारण ऊर्जा की निर्बाध आपूर्ति बनाए रखने के नाम पर सरकार एथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा देना चाहती है और भविष्य में 100 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का लक्ष्य हासिल करने की तैयारी चल रही है।

जीएम फसलों की दिशा में आगे बढऩे और एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की नीति के बीच सीधा संबंध भले न दिखता हो, परंतु दोनों में परोक्ष रूप से परस्पर निर्भरता का संबंध है। भारत में शत-प्रतिशत मिश्रण के लिए जितने एथेनॉल की आवश्यकता होगी, उसे जीएम फसलों के बिना हासिल नहीं किया जा सकता। ई-20 नीति के बचाव में सरकार जिस ब्राजील का उदाहरण अक्सर देती है, उसने भी यह लक्ष्य जीएम फसलों के बल पर ही प्राप्त किया है। इस पूरे परिदृश्य का तीसरा कोण अमरीका के साथ व्यापार समझौते में बना मौजूदा गतिरोध है, जो मक्का और अन्य कृषि उपजों के आयात पर भारत की हिचकिचाहट के कारण अटका हुआ है। अमरीका में 90 से 95 प्रतिशत जीएम मक्के का ही उत्पादन होता है। अपने किसानों को लाभ पहुंचाने और चुनावी फायदा लेने के उद्देश्य से राष्ट्रपति ट्रंप भारत में इसका बाजार खोलना चाहते हैं। भारत सरकार ने भी बीते दिनों पशु आहार और औद्योगिक जरूरतों के लिए अमरीकी कृषि उपज के सीमित आयात का मार्ग खोलने पर विचार करने के संकेत दिए थे, हालांकि अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। माना जा रहा है कि यदि कृषि क्षेत्र को अमरीका के लिए खोल दिया गया, तो भारतीय किसान और कारोबारी बड़े आर्थिक जोखिम में पड़ जाएंगे। बाजार की प्रतिस्पर्धा में अमरीकी उत्पादों के आगे हमारे किसान टिक नहीं पाएंगे। यदि एक बार सिद्ध हो जाता है कि जीएम फसलों से मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं है, तो इसकी खेती को प्रोत्साहित करके एक तरफ भारतीय किसानों को आय बढ़ाने का प्रलोभन दिया जा सकता है, दूसरी तरफ एथेनॉल की जरूरत पूरी हो सकती है और तीसरी तरफ जीएम बीज तैयार करने वाली अमरीकी कंपनियों को भी संतुष्ट किया जा सकता है।

इस 'विन-विन सिचुएशन' की आशंका के बीच यदि कोई सबसे बड़ी बाधा है, तो वह है जीएम फसलों की विनियामक प्रक्रिया। जीएम फसलों को प्रयोगशाला से खेतों तक पहुंचाने के बीच एक सख्त और बहुस्तरीय कानूनी ढांचा है, जो 'पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986' के तहत संचालित होता है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन 'अनुवांशिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति' (जीईएसी) जीएम फसलों के परीक्षण और व्यावसायिक उपयोग को मंजूरी देने वाली सर्वोच्च नियामक संस्था है। जीईएसी की अनुमति से ही प्रयोगशाला के बाद छोटे स्तर पर सीमित क्षेत्र में और नियंत्रित परिस्थितियों में इसका शुरुआती परीक्षण किया जाता है। इसके लिए संबंधित राज्य सरकार से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना भी अनिवार्य है। सभी सुरक्षा और वैज्ञानिक परीक्षणों में सफल होने के बाद ही फसलों के व्यावसायिक इस्तेमाल की अनुमति मिलती है। फिलहाल, केवल 'बीटी कॉटन' ही एकमात्र व्यावसायिक रूप से स्वीकृत जीएम फसल है।

भारतीय किसान और वैज्ञानिक समूह जीएम फसलों का भारी विरोध करते रहे हैं। यूपीए सरकार के समय (2010) बीटी बैंगन को अनुमति मिलने के बाद देशव्यापी विरोध के कारण रोक दिया गया था। लेकिन, हाल ही जीईएसी ने पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, लुधियाना में जीएम मक्के की दो किस्मों पर सीमित क्षेत्र में परीक्षण की मंजूरी दी है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में जीएम सरसों (डीएमएच-11) पर लंबे समय से शोध और परीक्षण जारी है। इसे सशर्त पर्यावरणीय मंजूरी मिलने के बाद मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में विचारधीन है। इसके अलावा, देश के अन्य विश्वविद्यालयों और आइसीएआर के संस्थानों में अरहर, चना और गन्ना जैसी फसलों के गुणों की जांच के लिए सीमित परीक्षण की योजनाएं फिलहाल पाइपलाइन में हैं।

जीएम फसलों की नियमावली में सुधार की सिफारिश करने वाली वैज्ञानिकों की गोलमेज बैठक को अमरीकी बीज कंपनियों की उस छटपटाहट के संदर्भ में भी देखे जाने की जरूरत है, जो भारत जैसे विशाल बाजार में प्रवेश के लिए बेचैन हैं। इस बैठक में 'ट्रस्ट फॉर एग्रीकल्चर साइंसेज' के अध्यक्ष डॉ. आर.एस. परोदा, 'रासी सीड्स प्राइवेट लिमिटेड' के संस्थापक डॉ. एम. रामासामी, 'फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया' के महानिदेशक डॉ. परेश वर्मा, 'साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर' के डॉ. सी.डी. मयी, इंटरनेशनल सर्विस फॉर द एक्विजिशन ऑफ एग्री-बायोटेक एप्लीकेशन (आइएसएएए) की कार्यकारी निदेशक डॉ. रोडोरा रोमेरो-अल्डेमिटा, ब्रिटेन के कृषि अर्थशास्त्री ग्राहम ब्रुक्स (पीजी इकोनॉमिक्स लिमिटेड) और कृषि वैज्ञानिक डॉ. एन.के. सिंह शामिल थे। नीति आयोग की रिपोर्ट 'रोडमैप फॉर एथेनॉल ब्लेंडिंग इन इंडिया 2020-25Ó में भी इस बात का जिक्र है कि देश में एथेनॉल की मांग को पूरा करने के लिए गन्ने के अतिरिक्त खाद्यान्न (विशेष रूप से मक्के) की प्रति हेक्टेयर पैदावार बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। भारत में एथेनॉल और शुगर उद्योग की प्रतिनिधि संस्था 'इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन' ने सरकार के समक्ष कई बार पक्ष रखा है कि ई-20 लक्ष्य को पूरा करने के लिए गन्ने के साथ मक्के की आपूर्ति बढ़ाना अनिवार्य है, जिसके लिए आधुनिक तकनीक और उन्नत बीजों की आवश्यकता है।

ई-20 नीति के कारण मक्के की कीमतों में हुई वृद्धि से परेशान होकर 'ऑल इंडिया पोल्ट्री ब्रीडर्स एसोसिएशन' और 'कंपाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन' ने मांग की है कि मक्के की पैदावार बढ़ाने के लिए आधुनिक जेनेटिक तकनीकों और जीएम मक्के के आयात या इसकी खेती के नियमों में ढील दी जाए। 'राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमीÓ के एक स्ट्रैटेजी पेपर के अनुसार, भारत में 2030 तक ई-30 का लक्ष्य हासिल करने के लिए 1.8 से 2.0 करोड़ टन मक्के की आवश्यकता होगी। यदि एथेनॉल, पोल्ट्री, पशु आहार और अन्य औद्योगिक जरूरतों को मिलाकर देखें, तो इसकी कुल मांग 2035-36 तक 7.15 करोड़ से 7.63 करोड़ टन तक पहुंच सकती है। इसके विपरीत, देश में मक्के का वर्तमान उत्पादन केवल 4.34 करोड़ टन ही है।

जाहिर है, एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति के कारण परोक्ष रूप से जीएम फसलों को अपनाने का एक नया दबाव बन गया है। ऐसे में पहला प्रश्न यह उठता है कि क्या इन दबावों के बीच जीएम फसलों के दुष्प्रभावों की अनदेखी कर दी जाएगी और इसके खिलाफ लंबे समय से जारी लामबंदी अप्रभावी हो जाएगी? सरकार ने इस संबंध में अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। सत्ताधारी भाजपा और इसके सहयोगी संगठन जीएम फसलों के मुखर विरोधी रहे हैं। इनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी शामिल है। 'कोएलिशन फॉर ए जीएम-फ्री इंडिया' और 'ग्रीनपीस इंडिया' के साथ-साथ कई किसान संगठन जीएम बीजों के खिलाफ निरंतर आंदोलन चलाते रहे हैं।

दूसरा प्रश्न यह है कि यदि सरकार जीएम फसलों के विरोध पर कायम रहती है, तो उसकी अपनी ई-30 या ई-100 नीति का क्या होगा? इसके लिए एथेनॉल कहां से आएगा? दो ही रास्ते हैं, उत्पादन या आयात? भारत सरकार फिलहाल तीसरे रास्ते पर चल रही है- पारंपरिक खेती में आधुनिक तकनीकों (नॉन जीएम) के मिश्रण से उत्पादन बढ़ाने पर जोर। लेकिन, सभी जानते हैं कि यह रास्ता भावी मांगों की पूर्ति के लिए अपर्याप्त है। पुरानी गाडिय़ों में होने वाली कथित तकनीकी खराबियों या माइलेज में कमी के तात्कालिक मुद्दों से इतर, ई-20 नीति के दूरगामी प्रभाव कहीं अधिक विचारणीय हैं। आखिरी प्रश्न यही कि ई-20 नीति में कहीं 'जीएम' का जोखिम तो नहीं छिपा है?