
UrbanGovernance
डॉ. रिपुन्जय सिंह
पूर्व सदस्य, राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड
भारत के तीव्र शहरीकरण के दौर में दीर्घकालिक भौतिक नियोजन की अनिवार्यता है। किसी शहर की पहचान उसकी ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि उसकी दूरदृष्टि से होती है। जो शहर बिना योजना के बढ़ता है, वह अंतत: जीवन, अवसर और गरिमा को बनाए रखने की अपनी क्षमता से आगे निकल जाता है। भारत आज विश्व के सबसे तेजी से शहरीकरण करने वाले देशों में है। हर वर्ष लाखों लोग बेहतर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और जीवन की आकांक्षा लेकर शहरों की ओर बढ़ रहे हैं। विकसित भारत का सपना भी मुख्यत: शहरों की उत्पादकता, नवाचार क्षमता और जीवन गुणवत्ता पर निर्भर करेगा। हमने शहरों को बढऩे दिया, लेकिन उन्हें विकसित नहीं किया। हमने निर्माण किया, परंतु नियोजन नहीं किया। हमने परियोजनाएं बनाईं, परन्तु शहर नहीं बना। परिणामस्वरूप आज अधिकांश शहर विकास और अव्यवस्था दोनों का समानांतर अनुभव कर रहे हैं।
हमारा शहरी विकास अभी भी प्रतिक्रियात्मक
आज जब कहीं सडक़ें जाम हो जाती हैं, तब फ्लाईओवर बनते हैं। जलभराव होने पर नालों की सफाई होती है। भूजल समाप्त होने पर नए स्रोत खोजे जाते हैं। हरित क्षेत्र सिकुडऩे पर वृक्षारोपण अभियान चलाए जाते हैं। अनधिकृत बस्तियां विकसित होने के बाद नियमितीकरण की योजनाएं बनाई जाती हैं। अर्थात हमारा शहरी विकास अभी भी प्रतिक्रियात्मक है, जबकि आधुनिक शहरों का निर्माण पूर्वदर्शी और निवारक नियोजन पर आधारित होना चाहिए।
इसी सोच का परिणाम है कि अनेक शहरों में मास्टर प्लान होने के बावजूद विकास उसकी दिशा से भटक गया। योजनाएं कागजों पर रहीं और शहर बाजार, जनसंख्या और राजनीतिक निर्णयों के अनुसार फैलते चले गए। यह प्रवृत्ति न केवल शहरी अवसंरचना पर असहनीय दबाव डालती है, बल्कि जलवायु परिवर्तन, शहरी बाढ, जल संकट, वायु प्रदूषण और सामाजिक असमानताओं को भी गहरा करती है।
विकसित भारत 2047 का मार्ग केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि सुविचारित शहरी विकास से होकर गुजरता है। इसलिए अब समय आ गया है कि भारत परियोजना आधारित विकास से आगे बढक़र योजना आधारित विकास को अपनाए। शहरों का निर्माण चुनावी कार्यकाल के पांच वर्षों को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि आने वाली पांच पीढिय़ों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
यही सोच है नियोजित विकास मॉडलों की ओर देखने के लिए प्रेरित करती है। इसी दृष्टि से 74वें संविधान संशोधन की भावना, नियोजन कानूनों के आधुनिकीकरण, भौगोलिक सूचना प्रणाली आधारित मास्टर प्लान, जलवायु-अनुकूल शहरी नियोजन तथा नागरिक सहभागिता को भारत की शहरी विकास नीति का अभिन्न अंग बनाना होगा।
शहरों का भविष्य सुनियोजित भौतिक नियोजन से है बनता
यदि हमें भारत को वास्तव में विकसित राष्ट्र बनना है, तो दूरदर्शी नेतृत्व, वैज्ञानिक नियोजन, सक्षम संस्थाओं और अनुशासित क्रियान्वयन से गढ़ा जाए। मास्टर प्लान केवल भूमि उपयोग का दस्तावेज नहीं, बल्कि किसी शहर के भविष्य का सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक संविधान है। शहरों का भविष्य संयोग नहीं, सुनियोजित भौतिक नियोजन से बनता है। तीव्र शहरीकरण के दौर में दीर्घकालिक भौतिक विकास की अनिवार्यता है। जो शहर बिना योजना के बढ़ता है, वह अंतत: जीवन, अवसर और गरिमा को बनाए रखने की अपनी क्षमता से आगे निकल जाता है।
आज हमारे अधिकांश शहर जाम, जल संकट, शहरी बाढ़, वायु प्रदूषण, अवैध कॉलोनियों, झुग्गी-बस्तियों, घटते हरित क्षेत्रों और कमजोर नागरिक सुविधाओं से जूझ रहे हैं। यह केवल बढ़ती जनसंख्या का परिणाम नहीं है, बल्कि हमारी दीर्घकालिक भौतिक योजना की कमजोरी और विकास की दूरदृष्टि के अभाव का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
किसी भी शहर का भौतिक नियोजन केवल भवनों, सडक़ों और कॉलोनियों का नक्शा नहीं होता। यह उस शहर के अगले 20 से 30 वर्षों के सामाजिक, आर्थिक, पर्यावरणीय और आधारभूत विकास की व्यापक रूपरेखा होता है। भौतिक नियोजन यह निर्धारित करता है कि शहर किस दिशा में विकसित होगा, कहां आवासीय क्षेत्र होंगे, कहां उद्योग स्थापित होंगे, कहां विद्यालय, अस्पताल और पार्क बनेंगे, जल स्रोतों, पहाडिय़ों, नदियों और हरित क्षेत्रों की सुरक्षा कैसे होगी, परिवहन व्यवस्था किस प्रकार विकसित होगी, भविष्य की जनसंख्या के लिए भूमि और आधारभूत संरचना कहां सुरक्षित रखी जाएगी। यदि यह योजना पहले से न बनाई जाए तो विकास अव्यवस्थित हो जाता है और शहर अपनी वहन क्षमता से अधिक बोझ उठाने लगता है।
मास्टर प्लान भविष्य का रोडमैप
मास्टर प्लान सिर्फ कानूनी दस्तावेज नहीं, भविष्य का रोडमैप है। जो शहर का भविष्य निर्धारित करता है। इसका उद्देश्य केवल भूमि का उपयोग निर्धारित करना नहीं, बल्कि भविष्य की पीढिय़ों के लिए रहने योग्य, सुरक्षित और समावेशी शहर तैयार करना है। दुर्भाग्य से भारत में अनेक मास्टर प्लान या तो वर्षों की देरी से तैयार होते हैं या उनके लागू होने तक वे पुराने पड़ जाते हैं। कई बार योजनाएं वास्तविक विकास की गति से पीछे रह जाती हैं और अनियोजित निर्माण उन्हें अप्रासंगिक बना देता है। किसी भी शहर की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी भूमि का उपयोग कितना वैज्ञानिक है। यदि आवासीय क्षेत्र उद्योगों के निकट विकसित होंगे, यदि जलाशयों पर कॉलोनियां बसेंगी, यदि नालों और बाढ़ क्षेत्रों पर निर्माण होगा, यदि कृषि भूमि अनियंत्रित रूप से कंक्रीट में बदल जाएगी, तो शहर पर्यावरणीय संकट का शिकार होगा। आज अनेक शहरों में यही स्थिति दिखाई देती है।
जोनिंग नियमों की अनदेखी से किसी भी शहर में अनुशासित विकास की आधारशिला है। किंतु अनेक शहरों में भूमि उपयोग परिवर्तन, अवैध निर्माण,नियमों में बार-बार संशोधन तथा कमजोर प्रवर्तन ने इस व्यवस्था को कमजोर किया है। यदि नियमों का पालन समान रूप से न हो तो नियोजन केवल कागज तक सीमित रह जाता है। आधारभूत संरचना हमेशा विकास के पीछे है। अधिकांश शहरों में आधारभूत संरचना विकास के पीछे चलती है। यही कारण है कि नई बस्तियां वर्षों तक मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहती हैं।
जलवायु परिवर्तन ने शहरी नियोजन की परिभाषा बदल दी
विकसित देशों में पहले आधारभूत संरचना तैयार होती है, उसके बाद विकास की अनुमति दी जाती है। हमें भी यही मॉडल अपनाना होगा। परिवहन की सबसे बड़ी भूल है कि वाहनों के लिए शहर, लोगों के लिए नहीं हैं। हमारे अधिकांश शहर निजी वाहनों को ध्यान में रखकर विकसित हुए हैं। परिणाम सामने है जिनमें बढ़ता जाम, प्रदूषण, ईंधन की बर्बादी, समय की हानि, सडक़ दुर्घटनाएं आदि हंै। जबकि आधुनिक शहरी नियोजन का सिद्धांत स्पष्ट है। हम वाहनों को नही, लोगों को गतिशील बनाइए। ट्रांजिट ओरिएंटेड डवलपमेंट, पैदल मार्ग, साइकिल ट्रैक और सार्वजनिक परिवहन भविष्य के शहरों की पहचान हैं।
जलवायु परिवर्तन ने शहरी नियोजन की परिभाषा बदल दी है। अब शहर केवल आर्थिक केंद्र नहीं रहे। उन्हें जलवायु परिवर्तन के प्रति सजग भी बनना होगा। अत्यधिक वर्षा, शहरी बाढ़, सूखा, हीट वेव और भूजल संकट ने स्पष्ट कर दिया है कि पुराने तरीके अब पर्याप्त नहीं हैं। भविष्य के शहरों में आधारभूत संरचना, वर्षा जल संचयन, शहरी वन, आद्र्रभूमियों का संरक्षण,पारगम्य सडक़ें, नवीकरणीय ऊजा, जल पुनर्चक्रण और हीट एक्शन प्लान को नियोजन का अनिवार्य भाग बनाना होगा।
भारत का भविष्य उसके शहरों में
हमारी शहरी विकास की सबसे बड़ी कमियां स्पष्ट हैं। जिनमे योजनाओं के बजाय परियोजनाओं पर अधिक ध्यान, दीर्घकालिक दृष्टि के स्थान पर अल्पकालिक राजनीतिक प्राथमिकताएं अनेक विभागों के बीच समन्वय का अभाव। पुराने आंकड़ों पर आधारित मास्टर प्लान, भूमि उपयोग नियमों का कमजोर पालन, नागरिकों की सीमित भागीदारी, भौगोलिक सूचना प्रणाली, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रियल-टाइम डेटा का अपर्याप्त उपयोग, मास्टर प्लान का नियमित पुनरीक्षण न होना, जलवायु को नियोजन का अभिन्न हिस्सा न बनाना है। मास्टर प्लान स्थिर दस्तावेज नहीं, बल्कि जीवंत दस्तावेज बनने चाहिएए जिनकी प्रत्येक पांच वर्ष में समीक्षा हो। शहरों की योजना केवल इंजीनियरों या योजनाकारों तक सीमित न रहे, बल्कि नागरिकों, शिक्षाविदों, पर्यावरणविदों, उद्योग जगत और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी से तैयार हो।
भारत का भविष्य उसके शहरों में बसता है। यदि हमारे शहर सुव्यवस्थित होंगे तो अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, निवेश बढ़ेगा, पर्यावरण सुरक्षित रहेगा और नागरिकों का जीवन स्तर बेहतर होगा। लेकिन यदि शहर बिना दूरदृष्टि के बढ़ते रहे, तो वे स्वयं अपने विकास के सबसे बड़े अवरोध बन जाएंगे। आज आवश्यकता केवल नए मास्टर प्लान बनाने की नहीं है, बल्कि नियोजन की संस्कृति विकसित करने की है। हमें संकट आने के बाद समाधान खोजने की प्रवृत्ति से बाहर निकलकर भविष्य को पहले से समझने और उसी के अनुरूप शहरों का निर्माण करने की आवश्यकता है।
Updated on:
03 Aug 2026 07:48 pm
Published on:
03 Aug 2026 07:41 pm
