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असहमति के अधिकार की रक्षा ही लोकतंत्र की असली ताकत

लोकतंत्र की मजबूती इस बात में है कि असहमति की आवाजों के लिए भी जगह बनी रहे। सत्ता से सवाल पूछने वाली स्वतंत्र प्रेस और खुली बहस ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली ताकत हैं।
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Aug 07, 2026
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हर्ष काबरा, (वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्लेषक)

ट्रंंप की नीयत पर सवाल हो सकते हैं, लेकिन उनका यह कहना सही है कि लोकतांत्रिक मतभेद गोलियों से नहीं, बल्कि खुली बहस से सुलझाए जाने चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ केवल पसंदीदा विचारों को बोलने का हक नहीं, बल्कि नागवार और असहमत आवाजों के लिए जगह बचाए रखना है। डॉनल्ड ट्रंप के बयानों को गंभीरता से लेना मुश्किल है और यदि बयान प्रेस के बारे में हों, तो मुश्किल और बढ़ जाती है। अमरीकी राष्ट्रपतियों में शायद ही किसी का पत्रकारों से रिश्ता इतना कटु रहा हो। उन्होंने समाचार संस्थानों को बेईमान बताया है, पत्रकारों को जनता का दुश्मन करार दिया है, सवाल पूछने वाले रिपोर्टरों पर शिष्टाचार की सीमाएं लांघकर निजी हमले किए हैं। प्रेस की आजादी का मसला उठाने वाले संस्थानों पर नकेल कसने के लिए उनके लाइसेंस तक रद्द करने की धमकियां दे डाली हैं। इसीलिए व्हाइट हाउस संवाददाता संघ के हालिया जलसे में उनके बोल चौंकाने वाले रहे। ट्रंप ने फरमाया कि अमरीकी आवाम को अपने मतभेद 'गोलियों से नहीं, बल्कि खुली और पुरजोर बहस से' सुलझाने चाहिए।

हो सकता है यह अवसर की मर्यादा निभाने की मजबूरी में कहा गया हो, क्योंकि उसी शाम उन्होंने पत्रकारों पर 'ट्रंप डिरेंजमेंट सिंड्रोम' यानी ट्रंप-विरोधी विकार से ग्रस्त होने का तंज भी कस दिया। यों तो ट्रंप कोई भी संदेश देते विश्वसनीय नहीं लगते। लेकिन लोकतंत्र के व्यापक हित को देखते हुए सिर्फ यही वजह उनके इस संदेश को खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं। कोई भी सिद्धांत केवल इसलिए अवैध नहीं हो जाता कि उसका पैरोकार स्वयं उसे आचरण में नहीं लाता। यही बात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी लागू होती है। अगर सिर्फ वही बात कही जा सके जिसे सत्ता सुनना चाहती है, तो सार्वजनिक बहस का स्थान सहमति का छलावा ले लेता है। और यदि केवल बहुमत को तुष्ट करने वाली बात कहने की स्वतंत्रता हो, तो वह स्वतंत्रता नहीं, सुविधा कहलाती है। ऐसे में लोकतंत्र जवाबदेही से कतराने लगता है।

प्रेस पर कीचड़ उछालना और उसका गला घोंटना, ये अलग बातें हैं। एक नेता पत्रकार की बेइज्जती करे, किसी खबर पर आपत्ति जताए, अखबार पर पक्षपात का आरोप मढ़े, यह सब कितना भी बदरंग क्यों न हो, खुद-ब-खुद सेंसरशिप नहीं बन जाता। मामला गंभीर तब हो उठता है, जब इस टकराव में प्रशासकीय शक्ति भी झोंक दी जाती है। ट्रंप प्रशासन ने पत्रकारों और उनके सूत्रों के खिलाफ ट्रंप से जुड़े विवादास्पद मुद्दे उठाने पर कई बार कार्रवाई की है। यहीं अमरीकी व्यवस्था का महत्व सामने आता है। संविधान का पहला संशोधन सरकारी शक्ति पर अंकुश लगाता है। अदालतें नियमित रूप से ट्रंप के मीडिया-विरोधी फैसलों को असंवैधानिक बताकर रद्द करती रही हैं, जैसे एसोसिएटेड प्रेस के पत्रकारों के व्हाइट हाउस कार्यक्रमों में शिरकत पर प्रतिबंध, सुरक्षा का हवाला देकर स्वतंत्र पत्रकारिता पर लादे गए दमनकारी नियम, नेशनल पब्लिक रेडियो, पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग सर्विस और वॉइस ऑफ अमरीका को खत्म करने की कोशिशें तथा वॉल स्ट्रीट जर्नल, न्यूयॉर्क टाइम्स और वॉशिंगटन पोस्ट के खिलाफ मानहानि के मुकदमे। यही वजह है कि लोकतंत्र में व्यक्तियों से अधिक संस्थाओं का महत्व होना चाहिए। ऐसा नहीं है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था हमेशा पटरी पर चलती है। लेकिन यह व्यवस्था सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछने की जगह तो बनाती ही है। राजनीतिक ध्रुवीकरण के दौर में लोग अक्सर यह बुनियादी फर्क भूल जाते हैं। जब कोई हमारे विरोधी नेता की आलोचना करता है तो हम उसकी सराहना करते हैं, लेकिन अपनी पसंद के नेता पर सवाल उठते ही विरोध करने लगते हैं। लोकतंत्र में यह जरूरी नहीं कि सब एक सुर में बोलें।

लोकतंत्र तो बस अलग सुर में बोलने की गुंजाइश चाहता है। असली खतरा असहमति को अपराध बताकर उसे सेंसरशिप, सरकारी मशीनरी या सत्ता के दबाव से कुचलने की कोशिश में है। यदि सरकार ही तय करने लगे कि कौनसी राय सही है और कौनसी गलत, तो कल यही शक्ति किसी भी विरोधी आवाज को दबाने का माध्यम बन सकती है। लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है कि हम जिन विचारों से असहमत हों, उनके बोलने के अधिकार की भी रक्षा कर सकें।

Updated on:
07 Aug 2026 04:49 pm
Published on:
07 Aug 2026 04:49 pm