
डॉ. विवेक एस. अग्रवाल, (सामाजिक सरोकारों से जुड़े मामलों के जानकार)
दवाएं जीवन के लिए जरूरी भी हैं और इनके बिना जीवन भी असंभव है, लेकिन वह तभी तक लाभदायक है, जब तक बीमारी के उपचार या बचाव के लिए इस्तेमाल किया जाए। बिना लक्षण अथवा परामर्श के दवाइयों के सेवन से नुकसान अधिक होता है। यह शारीरिक तंत्र को नुकसान पहुंचाने की क्षमता भी रखता है। भारत में दवाओं की बिना चिकित्सकीय परामर्श, ओवर द काउंटर पद्धति से हो रही बिक्री, तय खुराक से अधिक या कम की पैकेजिंग उन प्रमुख कारणों में है, जिनके कारण उपयोग पश्चात घातक दवाएं भी वातावरणीय संपर्क में आ जाती हैं । सामान्यतया दवाइयों की पैकेजिंग पर दिशानिर्देश भी मात्र अंग्रेजी भाषा में ही अंकित होते हैं, जिसके चलते उपयोग पश्चात निष्पादन कैसे किया जाना है, समझ से परे रहता है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार हर दवाई निश्चित मात्रा एवं तय अवधि तक ही मरीज को इलाज हेतु दी जाती है। हमारे यहां आम चलन है कि बीमारी के बाद बची हुई दवाओं को भविष्य की आवश्यकता के मद्देनजर रख लिया जाता है। उनको भी एक्सपायरी डेट के आधार पर नियमित रूप से निस्तारित करने की परिपाटी भी आमतौर पर नहीं पाई जाती।
इस संबंध में जागरूकता यदि शहरों में 20 फीसदी है तो गांव में प्राय: नगण्य ही है। इसका कारण सामान्यजन में एक्सपायरी डेट संबंधी जानकारी का न होना होता है, साथ ही पैकेजिंग पर एक्सपायरी होने की तिथि का बहुत ही सूक्ष्म अंकों में अंकित होना भी है। फार्मा कंपनियों द्वारा दवाइयों की बिक्री के लिए पैकेजिंग संबंधी स्पष्ट नीति एवं नियमों के अभाव में सामान्यतया इंजेक्शन वायल का अपवाद छोड़ 10, 15, 30 गोली अथवा कैप्सूल एवं 10 मिलीलीटर से 30 मिलीलीटर आंख आदि की दवा उपलब्ध होती है। इसमें से जितनी खुराक चिकित्सक की सलाह से लेनी है, अव्वल तो वह भी पूरी नहीं लेता और लेता भी है तो खुराक के बाद बची रह जाती है। जिसका निस्तारण भी बिना सोचे समझे कचरे के साथ कर दिया जाता है।
दवाओं की पैकेजिंग से भी नुकसानों की लंबी सूची बन जाती है। दवाओं की पैकेजिंग के लिए उपयोग में ली जाने वाली सामग्री में मुख्यतया प्लास्टिक, धातु और कुछ अंश: कागज होता है। इसके अतिरिक्त इन पर सूचना अंकित करने तथा पैकेजिंग को चिपकाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला रसायन भी दुष्प्रभाव युक्त होता है। वर्तमान में अधिकांशतया दवाइयां लगभग ठोस ब्लिस्टर पैक में बेची जाती हैं, जिनको संरचनात्मक रूप से रीसाइकल करना प्राय: मुश्किल होता है। एक मोटे अनुमान के अनुसार दवाओं की पैकेजिंग कार्बन उत्सर्जन का भी कारण है। इस कारण पैकेजिंग और दवा दोनों मिलकर भूमि और जल प्रदूषण का कारण बन जाते हैं। पैकेजिंग के विकल्प रूप में विभिन्न पर्यावरण सम्मत सामग्री यथा कपड़ा, सेल्युलोस इत्यादि का उपयोग करने की कवायद लंबे अरसे से चल रही है, लेकिन दवाइयों की पैकेजिंग में बदलाव के संबंध में कोई सार्थक पहल नहीं हो पाई है अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि पैकेजिंग के लिए उपयोग में ली जाने वाली सामग्री का यथासंभव वजन कम कर तथा प्रभावी उपयोग पश्चात संग्रहण अथवा रिवर्स खरीद व्यवस्था करने पर ही उपयोग पश्चात दवा के जहर को रोका जा सकता है।
इसे लेकर उपभोक्ताओं को भी जागरूक करना जरूरी है। बची हुई दवाई को दुकानदार द्वारा वापस लिया जाना उपभोक्ता का अधिकार होना चाहिए। हालांकि वर्तमान में बढ़ती ऑनलाइन दवा बिक्री व्यवस्था के चलते यह वापसी दुष्कर जरूर है, लेकिन नितांत आवश्यक भी है। विगत वर्षों में दवाइयों की खपत में लगभग 5 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से वृद्धि हुई है और उससे बहुत बड़े अनुपात में बची हुई दवाइयों की समस्या भी रौद्ररूप धारण कर रही है। दवा और उसकी पैकिंग के घातक प्रभाव से अवगत करवाने के लिए स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा अभियान चलाए जाने चाहिए। आवश्यकता है कि तेजी से बढ़ रही फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री पर उत्पादन के दौरान, पश्चात तथा उत्पाद स्तर पर समय रहते पर्यावरण सम्मत होने के बाध्यकारी नियम कठोरता से लागू किए जाएं, जिससे दवाएं जीवन की सहायक बनी रहें।