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संपादकीयः अस्पतालों में आग की घटनाओं से उपजे सवाल

आग की ज्यादातर घटनाओं में जो कारण सामने आया है वह शॉर्ट सर्किट है। बिजली की पुरानी वायरिंग, क्षतिग्रस्त तारों, ढीले कनेक्शन और खराब उपकरणों के कारण होने वाला एक फॉल्ट।
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Mar 17, 2026
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ओडिशा में कटक जिले के सरकारी एससीबी मेडिकल कॉलेज के ट्रोमा सेंटर के आइसीयू में रविवार मध्यरात्रि की आग में दस मरीजों की जान जाने की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर क्यों हम अस्पतालों को आग के गोले में तब्दील होने से रोक नहीं पाते? क्यों हर थोड़े-थोड़े समय में किसी न किसी अस्पताल में अग्नि दुर्घटना घटित होती आ रही है? कोलकाता के एएमआरआइ हॉस्पिटल में आग में 90, मुंबई के ड्रीमलैंड मॉल कोविड अस्पताल में 9, भरूच के पटल वेलफेयर हॉस्पिटल में 18, जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल के आइसीयू में 8 लोगों की मौत- अस्पतालों में आग का अंतहीन सिलसिला चला आ रहा है।

यह क्या हो गया है? कोई भी किसी दुर्घटना से सबक लेता नहीं दिखता है। अस्पतालों के सामान्य नहीं, आइसीयू जैसे गहन चिकित्सा वार्डों तक में आग लग रही है और जानें जा रही हैं, जहां हर सामग्री, हर उपकरण और काम की छोटी से छोटी चीज अत्याधुनिक व वैज्ञानिक तकनीक से सुसज्जित होने की उम्मीद की जाती है। आग की ज्यादातर घटनाओं में जो कारण सामने आया है वह शॉर्ट सर्किट है। बिजली की पुरानी वायरिंग, क्षतिग्रस्त तारों, ढीले कनेक्शन और खराब उपकरणों के कारण होने वाला एक फॉल्ट। साफ समझा जा सकता है कि यह पूरी तरह टाले जाने वाला कारण है, लेकिन इसे लेकर किसी भी स्तर पर गंभीरता नहीं है।

शॉर्ट सर्किट जैसी घटनाओं को रोकने की व्यवस्था का कोई लिखित-अलिखित और नैतिक नियम नहीं है। एक बार भवन बन गया, बिजली की लाइन लग गई तो फिर कभी इसे देखा नहीं जाता, जबकि इसे नियमित रखरखाव की श्रेणी का नियम बनाकर इसकी आशंका और सैकड़ों जानों का जोखिम हमेशा के लिए खत्म किए जा सकते हैं। यह किया भी जाना चाहिए, क्योंकि अस्पताल पीड़ा हरने वाली जगह होती है। ऐसे स्थान पर लोगों को इतर कारणों से बेमौत मरना पड़ जाए, तो इससे शर्मनाक बात नहीं हो सकती।

इन सभी घटनाओं में ज्यादातर में ये पहलू भी निहित हैं कि आग ने भयावह रूप इसलिए लिया कि स्मोक डिटेक्टरों ने संकेत ही नहीं किया, जिससे अलार्म नहीं बजा। कहीं ऐसा हुआ भी तो आग बुझाने के इंतजाम नाकाफी थे और कहीं ये सब ठीक थे, तो मौके पर मौजूद स्टाफ इस तरह की आपदा पर नियंत्रण के लिए प्रशिक्षित नहीं था। इसमें कोई संदेह नहीं कि कटक में और कुछ अन्य स्थानों पर भी स्टाफ ने मरीजों को बचाने के लिए अपनी जान झोंक दी और कई मरीजों को बचाया भी, पर यह भी सही है कि वे प्रशिक्षित होते तो और अधिक लोगों को बचाया जा सकता था। इसलिए जरूरी है कि अस्पतालों में अग्नि दुर्घटनाएं रोकने के लिए एक समुचित, सुव्यविस्थत और सुचारू तंत्र बनाया जाए, जिसमें मरीज किसी तरह की ऊहापोह की स्थिति में न हों और उसकी जान सलामत रहे।

Updated on:
17 Mar 2026 01:35 pm
Published on:
17 Mar 2026 01:35 pm