ओपिनियन

अंतिम दिनों में दर्द से राहत और जीवन को सम्मान

सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के तहत रोगी की आयु, आय अथवा बीमारी के प्रकार की परवाह किए बिना सभी को पैलिएटिव केयर सेवाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
3 min read
Jul 15, 2026
peliative care
peliative care

डॉ. पंकज जैन,(प्रोफेसर,मेडिकल कॉलेज कोटा)

जीवन के अंतिम पड़ाव एवं गंभीर लंबी बीमारियों से जूझते स्वजनों की पीड़ा हर किसी के लिए कष्टकारी होती है। यह एक भावनात्मक एवं मानवीय पहलू तो है ही, साथ ही चिकित्सकीय दृष्टिकोण से वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य की आवश्यकता के अनुरूप एक उभरती हुई विधा है, जिसे मेडिकल साइंस में पैलिएटिव मेडिसिन और हॉस्पिस केयर से परिभाषित किया जाता है। पैलिएटिव मेडिसिन गंभीर बीमारी से पीडि़त लोगों के लिए विशेष चिकित्सकीय देखभाल है, जो एक बहुविषयक टीम द्वारा प्रदान की जाती है। इस टीम में पारंगत फिजिशियन, नर्स, फिजियोथेरेपिस्ट, फार्मासिस्ट, आहार विशेषज्ञ, ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट, सामाजिक कार्यकर्ता एवं काउंसलर शामिल होते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य रोगी को दर्द से राहत देना, लक्षणों को नियंत्रित करना तथा रोगी को मानसिक और आध्यात्मिक देखभाल प्रदान कर उसका तनाव कम करना है, ताकि रोगी और उसके परिजनों दोनों की जीवन-गुणवत्ता में सुधार हो सके। साथ ही, रोगी को जीवन के शेष समय में यथासंभव पूर्ण एवं सुखमय जीवन जीने का अवसर मिल सके।

पैलिएटिव केयर और हॉस्पिस केयर एक-दूसरे के पूरक हैं। ये सेवाएं किसी भी अस्पताल, नर्सिंग होम, घर अथवा संस्था द्वारा प्रदान की जा सकती हैं। गुणवत्तापूर्ण पैलिएटिव देखभाल के लिए चार प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है- 1. शारीरिक लक्षण, 2. मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य, 3. सामाजिक आवश्यकताएं (जिनमें पारिवारिक संबंध, देखभाल एवं आर्थिक मामले शामिल हैं), 4. आध्यात्मिक एवं स्व-अस्तित्व संबंधी आवश्यकताएं। उच्च-मध्यम एवं उच्च आय वाले देशों में अनुमानित 70 प्रतिशत मृत्यु किसी लंबी बीमारी या स्वास्थ्य स्थिति के कारण होती है। अमरीका में कुल व्यक्तिगत स्वास्थ्य देखभाल व्यय का लगभग 10 प्रतिशत (करीब 450 अरब डॉलर) आबादी के उस 0.98 प्रतिशत वर्ग पर खर्च होता है, जो अपने जीवन के अंतिम वर्ष में होता है।

यह कैंसर के अलावा सीओपीडी (श्वास संबंधी बीमारी), लिवर फेल्योर, अल्जाइमर्स तथा एड्स जैसी बीमारियों से ग्रस्त मरीजों की देखभाल में भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। जब किसी रोगी की बीमारी नियंत्रण से बाहर हो जाती है, तभी से पैलिएटिव केयर शुरू की जा सकती है। वहीं, जब रोगी के छह महीने से अधिक जीवित रहने की संभावना नहीं होती, तब उसे हॉस्पिस केयर में स्थानांतरित किया जा सकता है। किसी भी क्रॉनिक बीमारी से पीडि़त रोगी को हॉस्पिस केयर की सलाह देने का अर्थ यह होता है कि अब लक्षणों को नियंत्रित करने एवं जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने पर अधिक ध्यान देना आवश्यक है। अमरीका में हॉस्पिस केयर का दायरा पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा है। वर्ष 2000 में जहां 21.6 प्रतिशत मृतकों ने हॉस्पिस केयर का उपयोग किया, वहीं वर्ष 2009 में यह आंकड़ा बढ़कर 42.2 प्रतिशत हो गया। वर्ष 2019 तक मेडिकेयर के तहत आने वाले 51.6 प्रतिशत लोग मृत्यु के समय हॉस्पिस सेवाओं में नामांकित थे।

हमारे देश में भी पैलिएटिव केयर का दायरा तेजी से बढ़ रहा है, किंतु यह अभी भी उपेक्षित एवं स्वास्थ्य प्रणाली का सीमित पहुंच वाला क्षेत्र बना हुआ है। एक अनुमान के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग 70 लाख से 1 करोड़ लोगों को पैलिएटिव केयर की आवश्यकता होती है, किंतु केवल 1 से 2 प्रतिशत लोगों को ही यह सुविधा उपलब्ध हो पाती है। पैलिएटिव केयर के समक्ष आज भी अनेक चुनौतियां हैं, इनमें राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियों में पैलिएटिव केयर को पर्याप्त स्थान न मिलना, स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए प्रशिक्षण का अभाव, ओपिऑयड दर्द निवारक दवाओं की सीमित उपलब्धता तथा नीति-निर्माताओं, स्वास्थ्य पेशेवरों एवं आमजन में इसके प्रति जागरूकता की कमी प्रमुख हैं। सांस्कृतिक एवं सामाजिक बाधाएं तथा पैलिएटिव केयर को लेकर समाज में व्याप्त भ्रांतियां भी इसकी राह में अवरोध उत्पन्न करती हैं। सर्वसुलभ पैलिएटिव केयर सुनिश्चित करने के लिए सभी स्तरों पर समन्वित प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।

ऐसी स्वास्थ्य नीतियां बनाई जानी चाहिए, जो पैलिएटिव केयर को स्वास्थ्य सेवाओं के प्रत्येक स्तर पर एकीकृत करें, क्योंकि रोग के प्रारंभिक चरण में दी गई पैलिएटिव केयर सबसे अधिक प्रभावी सिद्ध होती है। यह न केवल रोगी की जीवन-गुणवत्ता में सुधार करती है, बल्कि अनावश्यक अस्पताल भर्ती की आवश्यकता भी कम करती है। साथ ही, संसाधनों को सुदृढ़ एवं विस्तारित करने की आवश्यकता है। इसके तहत वर्तमान स्वास्थ्य पेशेवरों को प्रशिक्षण देना, नए स्वास्थ्य पेशेवरों के पाठ्यक्रम में पैलिएटिव केयर को शामिल करना तथा आमजन को इसके प्रति शिक्षित एवं जागरूक करना आवश्यक है। आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के तहत रोगी की आयु, आय अथवा बीमारी के प्रकार की परवाह किए बिना सभी को पैलिएटिव केयर सेवाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

नीति-निर्माताओं द्वारा पैलिएटिव देखभाल के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं तथा समय-समय पर इन सेवाओं के विकास और प्रभावशीलता का आकलन भी किया जाए। बढ़ती जीवन-प्रत्याशा तथा संक्रामक एवं गैर-संक्रामक रोगों के बढ़ते बोझ के परिणामस्वरूप पैलिएटिव केयर की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। ऐसे में ऐसी रणनीति विकसित की जानी चाहिए, जिससे पैलिएटिव केयर आमजन को सहज उपलब्ध हो और हर व्यक्ति अपने जीवन के अंतिम दिनों में भी गरिमापूर्ण, सम्मानजनक एवं गुणवत्तापूर्ण जीवन जी सके।

Updated on:
15 Jul 2026 04:45 pm
Published on:
15 Jul 2026 04:45 pm