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राजस्थान विधानसभा अपने गठन के 75वें वर्ष में अमृत महोत्सव मना रही है। निश्चित ही यह लोकतांत्रिक यात्रा का एक ऐतिहासिक पड़ाव है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस महोत्सव में उन मुद्दों पर गंभीर चर्चा होगी जो विधायिका को लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ बनाने के लिए आवश्यक है। साथ ही इस अवसर पर हमें उन गंभीर सवालों का सामना करना चाहिए जो हमारी विधायिका की जड़ों को हिला रहे हैं?
विधानसभा को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है। यहां जनता की आशाओं और आकांक्षाओं को आवाज मिलनी चाहिए। मगर पिछले कुछ वर्षों में हमारे निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की जो छवि बनती जा रही है, वह चिंता का विषय है। सत्तापक्ष और विपक्ष की 'नूराकुश्ती' ऐसी होती है कि जनहित के मुद्दे कहीं दब कर रह जाते हैं। नेता विपक्ष में रहते हुए जिन मुद्दों पर आवाज बुलंद करते हैं, सत्ता में आते ही उन्हीं पर चर्चा तक नहीं करते।
यह कैसी विडंबना है कि विधानसभा सत्र बुलाना महज संवैधानिक औपचारिकता बन कर रह गया। हर बार पक्ष-प्रतिपक्ष सत्र में मुकाबले व हमले की जोर-शोर से तैयारी तो करते हैं, लेकिन यह कभी तय नहीं होता कि सत्र कितने दिन चलेगा, कितनी बैठकें होंगी और सदन की उत्पादन क्षमता क्या होगी। परिणाम सामने हैं। सदन की बैठकों की संख्या लगातार गिरती जा रही है।
नियमानुसार बड़े सदनों के साल में तीन सत्र और कम से कम 60 बैठकें होनी चाहिए। यानी पांच साल के कार्यकाल में 300 बैठकें। मगर राजस्थान में पहली और दूसरी विधानसभा को छोड़ दें, तो कभी यह संख्या पूरी नहीं हो पाई। तीसरी विधानसभा के गठन से ही बैठकों की संख्या लगातार घटती गई। कई साल तो ऐसे गुजर गए जब पूरे साल में 30 बैठकें भी नहीं हो सकीं। जब सदन ही नहीं चलेगा तो कार्यपालिका पर नियंत्रण कैसे होगा? सरकार में उत्तरदायित्व का भाव कैसे आएगा?
हर साल पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में यही चर्चा की जाती है-बैठकें नियमानुसार हों, सकारात्मक चर्चा हो, जनता से जुड़े मुद्दों पर बहस हो। मगर वास्तविकता इसके उलट है। बात-बात पर शोर-शराबा और बहिर्गमन आम हो गया है। सत्तापक्ष के रुख और आसन की व्यवस्था पर भी कई बार सवाल उठे हैं। जबकि अपेक्षा यह की जाती है कि आसन पर बैठने के बाद निष्पक्षता रहेगी।
राजस्थान में एक अजीब परिपाटी देखने को मिलती है। जो भी मुख्यमंत्री पद से हटता है, वह सदन में आना ही बंद कर देता है। चाहे अशोक गहलोत हों या वसुंधरा राजे। मुख्यमंत्री रहने के बाद जब भी ये विपक्ष में पहुंचे, तो इनका विधानसभा में आगमन रस्मअदायगी जैसा ही रहा। सदन में आए भी, तो किसी मुद्दे पर बोलना उचित नहीं समझा। हां, सदन के बाहर मीडिया को बाइट देने में ये सबसे आगे जरूर रहे। बात सिर्फ बैठकों की ही नहीं। प्रश्नकाल भी खुद सवालों के घेरे में है। प्रश्नकाल को विधानसभा में जनता की आवाज उठाने का सबसे कारगर जरिया माना जाता है।
मगर, जब पूछे गए सवालों के जवाब ही समय पर न मिलें, तो जनता की समस्याएं तो बढ़नी ही हैं। हैरानी की बात यह है कि पिछली कांग्रेस सरकार के 1171 सवालों के जवाब विधानसभा सचिवालय को मिले ही नहीं। वहीं, भाजपा की मौजूदा सरकार के पिछले चार सत्रों के 543 सवालों के जवाब अब भी लंबित हैं। पिछले बजट सत्र में विधानसभा सचिवालय ने विभिन्न विभागों को 8 हजार से ज्यादा सवाल भिजवाए थे, जिनमें से करीब आधे के तो जवाब ही नहीं आए।
हर बार विधायक प्रश्न तो लगाते हैं, लेकिन ऐसा कम ही हुआ है कि पांच साल के कार्यकाल में उनके सभी प्रश्नों का जवाब मिला हो। लंबे समय से यह स्थिति बनी रही, तो एक दौर में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल को सरकार को पत्र लिखकर प्रश्नों को ही खत्म करने के लिए प्रस्ताव भेजना पड़ा था। जब उन्होंने पुराने प्रश्नों की पड़ताल करवाई, तो पता चला कि 15-20 साल पहले लगाए गए प्रश्नों के जवाब तक नहीं आए थे।
विधायिकाओं में सदस्यों की अनुशासनहीनता और अमर्यादित व्यवहार सदैव चिंता का विषय रहा है। पीठासीन अधिकारियों की बैठकों में बार-बार जोर दिया जाता है कि राजनीतिक दल ईमानदार और शिक्षित व्यक्तियों को ही चुनाव में उतारें। मगर, होता इसके विपरीत है। संसद से लेकर विधानसभाओं तक में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग भरे हैं।
जनता की अपेक्षा सिर्फ इतनी नहीं है कि मुख्यमंत्री-मंत्री सदन में उपस्थित रहें, बल्कि यह भी है कि वे अपने विभागों की पूरी तैयारी के साथ आएं, लंबित प्रश्नों के जवाब शीघ्र उपलब्ध कराएं, और समस्याओं के समाधान की स्पष्ट समय सीमा बताएं। विधानसभा में पूछा गया हर प्रश्न किसी एक विधायक का नहीं, बल्कि हजारों नागरिकों की आवाज होता है। उस आवाज को दबाना लोकतंत्र पर कुठाराघात ही कहा जाएगा।
75 साल का यह अमृत महोत्सव तभी सार्थक होगा, जब सिर्फ दीप जलाने और समारोह मनाने तक सीमित न रहकर, विधानसभा अपनी प्रासंगिकता और गरिमा को वापस पाने का संकल्प ले।
bhuwan.jain@in.patrika.com
Updated on:
15 Jul 2026 08:18 am
Published on:
15 Jul 2026 08:13 am
