देश के बाकी राज्यों में चुनाव होते हैं, सरकारें बदलती हैं, एक पार्टी जीतती है तो दूसरी हारती है, लेकिन कहीं भी बंगाल जैसी निरंतर राजनीतिक हिंसा नहीं दिखती। बंगाल में दुर्भाग्य से हिंसा को राजनीतिक हथियार बना लिया गया है।
पश्चिम बंगाल में पहले अभिषेक बनर्जी और एक दिन बाद कल्याण बनर्जी पर हुआ हमला किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। राज्य में चुनाव हो गए, सरकार बदल गई लेकिन हालात नहीं बदले। पहले भाजपा विपक्ष में थी तो उसके नेता निशाना बनते थे, आज तृणमूल कांग्रेस विपक्ष में है तो उसके नेताओं पर निशाना साधा जा रहा है। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा कोई नई घटना नहीं है। यह राज्य दशकों से खून-खराबे और हत्याओं का गवाह रहा है। भारत में राजनीतिक हत्याओं की दर सबसे अधिक यहीं रही है। 1946 के दंगों और नोआखली हिंसा से लेकर 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन तक बंगाल में हिंसा की जड़ें गहरी हैं। 1970 का सांईबाड़ी हत्याकांड जैसे काले अध्याय आज भी याद किए जाते हैं। वाम मोर्चा शासनकाल में भी हिंसा की घटनाएं देखने में आती रहीं।
2011 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई तो उम्मीद जगी थी कि हिंसा थम जाएगी, लेकिन स्थिति ज्यादा नहीं बदली। तृणमूल शासन में भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले बढ़े। गृह मंत्री अमित शाह के अनुसार, 2014 से लेकर अब तक बंगाल में भाजपा के 321 कार्यकर्ताओं की हत्या की गई। अब भाजपा सरकार में तृणमूल नेताओं पर हमले हो रहे हैं। स्पष्ट है कि बंगाल में हिंसा मुख्य रूप से विपक्षी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को निशाना बनाती है। सत्ता जिसके पास होती है, विपक्ष उसी का शिकार होता रहा है। देश के बाकी राज्यों में चुनाव होते हैं, सरकारें बदलती हैं, एक पार्टी जीतती है तो दूसरी हारती है, लेकिन कहीं भी बंगाल जैसी निरंतर राजनीतिक हिंसा नहीं दिखती। बंगाल में दुर्भाग्य से हिंसा को राजनीतिक हथियार बना लिया गया है। हालांकि यहां यह भी मानना पड़ेगा कि 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद 2021 जैसी भारी हिंसा की खबरें नहीं आईं। यह एक सकारात्मक बदलाव है। फिर भी हाल के दिनों में तृणमूल नेताओं पर हुए हमले दिखाते हैं कि समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। बंगाल की राजनीति में हिंसा को अब सामान्य नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र में मतभेदों को हिंसा से नहीं, संवाद और कानून के रास्ते से सुलझाना चाहिए। नई सरकार को कानून-व्यवस्था को मजबूत करना होगा और सभी दलों को हिंसा छोड़ कर लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करना चाहिए। जब तक बंगाल में यह हिंसा का चक्र जारी रहेगा, लोकतंत्र की सच्ची जीत नहीं हो सकती।
सत्ता बदलती रहेगी, लेकिन अगर खून बहता रहा तो विकास और शांति सिर्फ सपना बनी रहेगी। राज्य सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वह राजनीतिक हिंसा को पूरी तरह रोकने के लिए ठोस कदम उठाए। भाजपा को अब यह करके दिखाना होगा, क्योंकि वह खुद विपक्ष में रहकर लंबे समय तक राजनीतिक हमलों के खिलाफ लड़ती आई है। साथ ही अन्य सभी राजनीतिक दलों को भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए संयम बरतना चाहिए और लोकतंत्र को मजबूत बनाने में सहयोग करना चाहिए।