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चार राज्यों के नतीजों ने सियासी दलों को दिखाया आईना

जेडीयू के बाहुबली विधायक अनंत सिंह के प्रखर विरोध के बावजूद पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से जदयू के नीरज कुमार जीत गए जबकि पटना शिक्षक सीट समेत दरभंगा और सारण के नतीजों ने यह भी साफ कर दिया कि कांग्रेस के साथ भाजपा को भी आत्ममंथन करना जरूरी है।
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Updated: 3 Nov 2026, 5:38 PM IST
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चार राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों के लिए हुए चुनाव में एनडीए ने दबदबा बनाए रखा। एमएलसी चुनाव में आम मतदाता वर्ग नहीं, बल्कि सीमित मतदाता होते हैं। चार राज्यों की 28 सीटों के चुनाव में भाजपा-एनडीए ने 15 सीटें जीतीं जबकि इंडिया ब्लॉक के खाते में 9 सीटें गईं। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने उत्तर प्रदेश की 11 में से 6 और समाजवादी पार्टी ने 5 सीटें जीतीं, जिसमें वाराणसी की सीट भी है। समाजवादी पार्टी ने अपनी सीटों में इजाफा किया। उसके पास मात्र 3 सीटें ही थीं। बिहार में भी मतदाताओं ने बीजेपी को जबरदस्त आईना दिखाया है।

चार राज्यों की 28 सीटों के लिए चुनावों में कांग्रेस को मात्र एक सीट मिलना यही बताता है कि उसकी राजनीतिक पकड़ मजबूत नहीं है। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में कोई प्रत्याशी नहीं उतारा लेकिन बिहार, महाराष्ट्र में उसके कुल 12 उम्मीदवार मैदान में थे। इनमें से महाराष्ट्र में एक नागपुर जीत सका। जबकि कर्नाटक में खाता तक नहीं खुला। यहां चारों सीटें एनडीए ने जीतीं। इन 28 सीटों में कांग्रेस के पास 4 सीटें थीं। कांग्रेस अपने शासन वाले कर्नाटक में सभी चारों सीटें हार गई यह उसके लिए बेहद शर्मनाक भी है। बिहार और महाराष्ट्र में उसके सहयोगी दलों को जीत मिली, पर वह अपना खाता भी नहीं खोल सकी। ये चुनाव ईवीएम की बजाय बैलेट पेपर और बैलेट बॉक्स से कराए गए थे।

कांग्रेस वोट चोरी के आरोप लगाकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल तो खड़े कर रही पर अपने चुनावी प्रदर्शन से मुंह फेर रही है। बिहार में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के एक प्रत्याशी के साथ एक निर्दलीय भी एमएलसी बन गया लेकिन राष्ट्रीय जनता दल और भाकपा-माले लिबरेशन जैसे सहयोगी दलों का साथ मिलने के बावजूद कांग्रेस को नाकामयाबी हाथ लगी। कांग्रेस न तो प्रबुद्ध शिक्षकों को प्रभावित कर रही है न ही स्नातकों को।यदि कांग्रेस इन वर्गों को आकर्षित नहीं कर पा रही तो इसके लिए वह अपनी रीति नीति के अतिरिक्त किसी और को दोष नहीं दे सकती। कर्नाटक में विधान परिषद की सभी चार सीटों पर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। जेडीएस ने कांग्रेस से एक सीट छीन ली जबकि भाजपा ने अपनी सभी तीन सीटों पर जीत कायम रखी। इसी तरह महाराष्ट्र में पांच में से दो-दो सीटें एनडीए और महायुति ने जीतीं। बिहार की आठ सीटों पर भी चुनाव बड़े रोचक रहे। जेडीयू के बाहुबली विधायक अनंत सिंह के प्रखर विरोध के बावजूद पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से जदयू के नीरज कुमार जीत गए जबकि पटना शिक्षक सीट समेत दरभंगा और सारण के नतीजों ने यह भी साफ कर दिया कि कांग्रेस के साथ भाजपा को भी आत्ममंथन करना जरूरी है। बीजेपी ने इस चुनाव में हासिल कम किया और अपनी हानि ज्यादा कराई। राष्ट्रीय जनता दल की दो सीटों पर जीत और प्रशांत किशोर के एक उम्मीदवार की जीत से भाजपा को समय की चाल को समझ लेना चाहिए। यूपी में विधानसभा चुनाव होने हैं और वहां के प्रबुद्ध मतदाता यदि विपक्षी समाजवादी पार्टी को 11 में से 5 सीटें देते हैं तो यह सत्तारूढ़ दल के लिए बेशक चिंता की वजह होनी चाहिए।

कांग्रेस की पराजय पर नगाड़े बजाने से बेहतर है, वह यूपी बिहार में प्रबुद्ध मतदाताओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करे क्योंकि पार्टी की सरकारें ही प्रदर्शन का आईना होती हैं। भाजपा को बारम्बार बांकीपुर की पराजय जैसे दृश्य देखने पड़ रहे हैं। यूपी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर ही बिहार में नीतीश कुमार का उत्तराधिकारी सम्राट चौधरी को बनाया गया, ताकि पिछड़े और वंचित समाज के वोटों का बिखराव रोका जा सके। लेकिन भाजपा मतदाताओं के असंतोष का सही समय पर आकलन नहीं कर पाई। कांग्रेस को भी यदि समय रहते यह समझ आ जाए कि वोट चोरी के शिगूफे से कुछ हासिल होने वाला नहीं है व ईवीएम पर खीझ निकालना व्यर्थ है तो यह बेहतर होगा।
भाजपा को पारदर्शी व जनप्रिय सरकार देने की जिम्मेदारी का अहसास होना जरूरी है। बिहार के नतीजों ने भाजपा को बहुत कुछ समझा दिया है और यूपी के परिणाम ने भी उत्तरप्रदेश में भाजपा की सरकार व केंद्र सरकार को चमकदार आईना दिखा दिया है।

प्रियरंजन भारती,(वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार)

Updated on:
3 Nov 2026, 5:38 PM IST
Published on: