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न्यायाधीश की निर्णय क्षमता का विकल्प नहीं हो सकता एआइ

भारतीय न्यायपालिका कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का उपयोग अदालती प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी और सुगम बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन न्यायिक निर्णय का अंतिम अधिकार मानव के पास ही रहेगा। एआई प्रशासनिक और शोध संबंधी कार्यों में सहायक हो सकती है, पर वह सत्य की पुष्टि नहीं करती और मनगढ़ंत जानकारी (हैलुसिनेशन) का जोखिम भी रहता है। इस चुनौती से निपटने के लिए रिट्रीवल-ऑगमेंटेड जेनरेशन (क्र्रत्र) जैसी तकनीक प्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर उत्तर तैयार करने में मदद करती है। भारत के पास अपना लीगल एलएलएम विकसित करने की क्षमता है, लेकिन जवाबदेही, विश्वसनीयता और भाषाई विविधता जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। भविष्य में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न तकनीक का नहीं, बल्कि उस पर न्यायपालिका के भरोसे और जवाबदेही तंत्र का होगा।
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Aug 05, 2026
DigitalTransformation
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पंकज चतुर्वेदी, आइटी प्रोफेशनल

गत 7 जून 2026 को ऑक्सफोर्ड यूनियन और ऑक्सफोर्ड लॉ सोसाइटी के मंच से भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने भारतीय न्यायपालिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका को लेकर एक महत्तवपूर्ण संकेत दिया। ‘कॉन्सट्टियूशनल प्रॉमिस टू रियलिटी सेफगार्डिंग जस्टिस इन द एज ऑफ एआइ एंड टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायपालिका अदालती कार्यवाही को अधिक सुगम बनाने के लिए एक स्वदेशी एआइ इकोसिस्टम विकसित करने की संभावनाओं पर गंभीरता से काम कर रही है। लेकिन उसी सांस में उन्होंने इसकी सीमा भी स्पष्ट कर दी, प्रौद्योगिकी न्यायाधीश की स्वतंत्र सोच और निर्णय क्षमता का विकल्प नहीं, बल्कि उसकी सहायता का माध्यम होगी। यह बयान किसी दूर के भविष्य की कल्पना नहीं, बल्कि शुरू हो चुके बदलाव का संकेत है। 12 मई 2026 को सीजेआइ ने ‘वन केस, वन डेटा’ पहल की शुरुआत की, जिसके माध्यम से देश की विभिन्न अदालतों के बिखरे हुए डेटा को एकीकृत डिजिटल प्रणाली में जोड़ा जा रहा है। इसी के साथ राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र द्वारा विकसित ‘सु-सहायक’ चैटबॉट भी शुरू हुआ, जो वकीलों और आम नागरिकों को केस-स्टेटस, कॉज-लिस्ट, आदेश-फैसले, ई-सेवाएं और एफएक्यू जैसी जानकारी ऑप्शन-बटन्स और पूर्व-निर्धारित मॉड्ूयल्स के माध्यम से उपलब्ध कराता है। यानी यह प्रणाली किसी खुले जेनरेटिव भाषा-मॉडल की बजाय एक संरचित यानी गाइडेड मेडिटेशन आधारित सहायता प्रणाली के रूप में काम करती है। यानी बहस अब इस बात की नहीं रह गई कि एआइ अदालतों में आएगी या नहीं। वह दस्तक दे चुकी है। असली बहस यह है कि वह अदालतों में कितनी दूर तक जाएगी और उसकी सीमा कौन तय करेगा।

एआइ का उद्देश्य सत्य की पुष्टि करना नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने इस दिशा में अपनी सोच भी स्पष्ट कर दी है। 3 जून 2026 को जारी ‘न्यायालयों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल के लिए नियम, 2026’ के मसौदे में एआइ के उपयोग की सीमाएं निर्धारित की गई हैं। उद्धरण-सत्यापन मसौदा तैयार करने में सहायता, अनुवाद, प्रतिलेखन, केस-प्रबंधन, समय-निर्धारण, अभिलेख-प्रबंधन और न्यायिक प्रशासन जैसे कार्यों में ्रढ्ढ के उपयोग की अनुमति है। लेकिन न्यायिक निर्णय और जमानत जैसे जोखिम-आकलन वाले मामलों में एआइ की भूमिका स्वीकार नहीं की गई है। संदेश स्पष्ट है, जहां प्रशासनिक दक्षता की आवश्यकता है, वहां जहां न्यायिक विवेक की आवश्यकता है, वहां केवल मनुष्य।
यह सीमा क्यों आवश्यक है, इसे समझने के लिए एआइ के काम करने के तरीके को समझना होगा। एआइ के पास किसी पुस्तक की तरह तैयार उत्तरों का संग्रह नहीं होता। इसे लाखों दस्तावेजों पर प्रशिक्षित किया जाता है, जहां यह भाषा के पैटर्न सीखती है। नया प्रश्न मिलने पर यह किसी फाइल में उत्तर खोजने नहीं जाती, बल्कि सीखे हुए पैटर्न के आधार पर सबसे संभावित उत्तर का अनुमान लगाती है। इसलिए एआइ का उद्देश्य सत्य की पुष्टि करना नहीं, बल्कि सबसे संभावित उत्तर उत्पन्न करना होता है।

प्रमाणित कानूनी स्रोतों से जुड़ी रिट्रीवल प्रणाली भी आवश्यक
्रयहीं सबसे बड़ा जोखिम छिपा है। किसी वास्तविक न्यायिक निर्णय का उद्धरण देना और उसी शैली में एक काल्पनिक उद्धरण गढ़ देना, मॉडल के लिए तकनीकी रूप से अलग प्रक्रियाएं नहीं हैं। यही कारण है कि दुनिया भर की अदालतों में काल्पनिक उद्धरण के मामले सामने आए हैं। इस जोखिम को कम करने के लिए रिट्रीवल-ऑगमेंटेड जेनरेशन हिंदी में कैसे लिखूं जैसी तकनीक विकसित हुई, जिसमें मॉडल उत्तर देने से पहले प्रमाणित डेटाबेस से वास्तविक दस्तावेज प्राप्त करता है और उसी के आधार पर उत्तर तैयार करता है। यदि भविष्य में लीगल एआइ का व्यापक उपयोग होता है, तो केवल बड़ा लैंग्वेज मॉडल पर्याप्त नहीं होगा, उसके साथ प्रमाणित कानूनी स्रोतों से जुड़ी रिट्रीवल प्रणाली भी आवश्यक हो सकती है।
दिलचस्प बात यह है कि भारतीय न्याय व्यवस्था और एआइ दोनों में ‘सुधार’ की व्यवस्था है, लेकिन दोनों का स्वरूप बिल्कुल अलग है। न्यायपालिका अपील, पुनर्विचार और बड़ी पीठों के माध्यम से अपने निर्णयों की समीक्षा करती है। दूसरी ओर एआइ में गलत उत्तर मिलने पर प्रशिक्षण के दौरान उसके गणितीय मान बदले जाते हैं, ताकि भविष्य में बेहतर अनुमान लगाया जा सके। लेकिन तैनात होने के बाद एआइ स्वयं अपनी गलती पहचानकर तत्काल सुधार नहीं कर सकती। यही कारण है कि अनिवार्य मानवीय समीक्षा न्यायपालिका के लिए केवल तकनीकी आवश्यकता नहीं, बल्कि न्यायिक सिद्धांत है।

चुनौतियां भी उतनी ही गंभीर
ऑक्सफोर्ड में सीजेएआइ ने ‘स्वदेशी न्यायशास्त्र’ की बात की, लेकिन किसी विशिष्ट लीगल एलएलएम की घोषणा नहीं की। फिर भी यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या भारत अपना लीगल एलएलएम विकसित कर सकता है? उपलब्ध डिजिटल आधार, विशेषज्ञता और संस्थागत क्षमता को देखते हुए यह संभावना अवश्य दिखाई देती है कि भारत भविष्य में अपना लीगल एलएलएम विकसित कर सकता है। ई-कोर्ट मिशन के कारण सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के लाखों निर्णय पहले से डिजिटल स्वरूप में उपलब्ध हैं। आइआइटी, ट्रिपल आइटी राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, वरिष्ठ अधिवक्ता और सेवानिवृत्त न्यायाधीश जैसे विशेषज्ञ भी देश में हैं। लेकिन चुनौतियां भी उतनी ही गंभीर हैं। केवल अधिक डेटा होने से हैलुसिनेशन की समस्या समाप्त नहीं होती। यदि एआइ किसी कानूनी शोध में गलत सुझाव दे और उस पर भरोसा कर लिया जाए, तो जवाबदेही किसकी होगी, मॉडल विकसित करने वालों की, उसे लागू करने वाली संस्था की या उस पर भरोसा करने वाले व्यक्ति की? भारत की भाषाई और न्यायिक विविधता भी किसी एक मॉडल के सामने असाधारण जटिलता प्रस्तुत करती है। तो शायद सवाल यह नहीं है कि भारत अपना लीगल एलएलएम बना सकता है या नहीं। उपलब्ध संसाधनों को देखते हुए यह दिशा अव्यावहारिक नहीं लगती। असली सवाल यह है कि क्या हम ऐसा जवाबदेही तंत्र विकसित कर पाएंगे, जिस पर न्यायपालिका उतना ही भरोसा कर सके, जितना वह आज किसी न्यायिक नजीर, संविधान की धारा या न्यायाधीश के विवेक पर करती है?

Updated on:
05 Aug 2026 07:17 pm
Published on:
05 Aug 2026 07:04 pm