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महावीर जयंती विशेष: सफल और सार्थक जीवन का आधार सम्यक् दर्शन, ज्ञान और चरित्र

व्यसन व्यक्ति की मानसिक पवित्रता को नष्ट कर उसकी सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक चेतना को विकृत कर देता है। इनसे बचाव के लिए भगवान महावीर ने अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह- इन पांच अणुव्रतों के माध्यम से मानव के संतुलित व्यक्तित्व विकास की नींव रखी।

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Mar 30, 2026

डॉ. अरिहंत कुमार जैन, असिस्टेंट प्रोफेसर ( सौमैया विद्याविहार विवि, मुंबई )

भगवान महावीर भले ही जैनधर्म के 24वें तीर्थंकर हैं, परंतु उनके सार्वकालिक, सर्व कल्याणकारी, सर्वोदयी और शाश्वत सिद्धांत उन्हें जनधर्म का प्रणेता प्रस्तुत करते हैं। भगवान महावीर ने हमें जीवन को वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक ढंग से जीने की कला सिखाई है, जिसका सर्वप्रथम प्रयोग उन्होंने स्वयं पर किया और अपने दिव्य अनुभवों को मानव कल्याण के लिए जन-जन तक जनभाषा 'प्राकृत' के माध्यम से पहुंचाया। वे जानते थे कि भाषा भावों की अभिव्यक्ति और ज्ञान-प्रचार का साधन है। अत: इसके लिए यदि जनसामान्य के बोलचाल की जनभाषा प्राकृत को माध्यम बनाया जाए तो अति उत्तम होगा।

भगवान महावीर ने अनुसंधान किया कि प्रारंभिक तौर पर ऐसी कौन-सी आदतें हैं, जो मानव के व्यक्तित्व विकास में बाधक हैं। उन्होंने पाया कि सात ऐसी आदतें और पांच ऐसे पाप हैं, जो मानव को सम्यक् पथ से भटका रहे हैं, जिनमें हैं जुआ, मांसाहार, मद्य(शराब आदि नशे का सेवन), शिकार, चोरी आदि शामिल हैं। उन्होंने कहा कि व्यसनी व्यक्ति के जीवन में धर्म नहीं उतर सकता, क्योंकि व्यसन धर्म का शत्रु है। व्यसन व्यक्ति की मानसिक पवित्रता को नष्ट कर उसकी सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक चेतना को विकृत कर देता है। इनसे बचाव के लिए भगवान महावीर ने अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह- इन पांच अणुव्रतों के माध्यम से मानव के संतुलित व्यक्तित्व विकास की नींव रखी।

भगवान महावीर की यह स्पष्ट अवधारणा है कि हमारा व्यक्तित्व मात्र कपड़ों या शारीरिक सौंदर्य से ही निर्मित नहीं होता, उसमें हमारा चिंतन, वाणी और व्यवहार तथा आध्यात्मिक दृष्टि भी महत्वपूर्ण घटक है, जो हमारे सही और सम्पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करता है। वे कहते हैं कि यदि सफल जीवन जीना चाहते हो तो विचारों में 'अनेकांत', वाणी में 'स्याद्वाद', आचार में 'अहिंसा' और जीवन में 'अपरिग्रह'- इन चार सूत्रों को अपना जीवन आदर्श बना लें, जिनसे व्यक्ति के एक ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण हो सकता है, जो स्वयं के साथ परिवार, समाज, राष्ट्र तथा सम्पूर्ण विश्व के लिए भी कल्याणकारी होगा।

भगवान महावीर आत्मा की अनंत सामथ्र्य को उजागर करते हुए कहते हैं कि इस आत्मा में भी परमात्मा बनने का सामथ्र्य सहज रूप से ही विद्यमान है, आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम अपनी शक्ति को पहचानें और तदनुरूप आचरण करें। तात्पर्य यह है कि ज्ञान-दर्शन-सुख-बल आदि अनन्त सामथ्र्य से परिपूर्ण यह आत्मा यदि अपनी शक्तिको पहचान कर राग-द्वेष मोह आदि वृत्तियों से मुक्त हो जाए तो यह भी 'महावीर' सदृश बनने की पात्रता प्राप्त कर सकेगा। भगवान महावीर ने यह माना है कि व्यक्तित्व का आत्मिक विकास सर्वांगीण होना चाहिए। इसके लिए उन्होंने सम्यक् दर्शन (सही दृष्टि), सम्यक् ज्ञान (सही ज्ञान/निष्ठा) व सम्यक् चरित्र (सही आचरण)- इन रत्नत्रय के माध्यम से व्यक्तित्व विकास की ऐसी नींव रखी, जिसे मानव के मौलिक विकास में सहायक माना गया।

सर्वप्रथम व्यक्तित्व का सबसे बड़ा पहलू है कि आपकी दृष्टि कैसी है? आपका दृष्टिकोण सही होना चाहिए। आपकी दृष्टि और विश्वास से लक्ष्य के प्रति आपकी निष्ठा का पता चलता है और उसी से निर्धारित होता है कि आपकी सफलता कितनी सुनिश्चित है। यही 'सम्यग्दर्शन' है। सही ज्ञान के अभाव में हम लक्ष्य से भटक सकते हैं। लक्ष्य के बारे में हमारे पास सही तथा प्रामाणिक सूचनाएं भी होनी चाहिए। इसलिए 'सम्यक् ज्ञान' जरूरी है। आप अपने लक्ष्य को तब तक नहीं प्राप्त कर सकते जब तक कि आप सही आचरण को प्राप्त नहीं कर लेते। पथ पर सही तरीके से चलना सही आचरण है। 'सम्यक् चारित्र' ही हमारे व्यक्तित्व का अंतिम सोपान है।

Published on:
30 Mar 2026 02:10 pm
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