
मधुरेंद्र सिन्हा, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार
केंद्र सरकार ने गत दिनों घोषणा की कि उसने पेट्रोल और डीजल की स्पेशल एक्साइज ड्यूटी में कटौती कर दी है ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी उछाल के बावजूद भारत में इनकी कीमतें स्थिर रहें। पश्चिम एशिया में अशांति और ईरान-इजरायल के युद्ध में अमरीका की एंट्री के बाद कच्चे तेल की कीमतों में आग लग गई। ईरान ने अपने ऊपर हुए हमले के जवाब में यूएई, कतर, सऊदी अरब, बहरीन पर मिसाइलें दागीं, जिससे कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित हो गई। इस युद्ध के शुरू होने के बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में 60 फीसदी का भारी इजाफा हुआ। युद्ध पूर्व जहां कच्चे तेल की कीमतें महज 70 डॉलर प्रति बैरल थी वे बढ़कर 110-120 डॉलर प्रति बैरल तक जा पहुंची।
भारतीय बाजार यानी एमसीएक्स में कच्चा तेल 9,000 रुपए प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जिससे पेट्रोल और डीजल की दरों में 10 से 15 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी की आशंका पैदा हो गई। दरअसल इस युद्ध से तेल के उत्पादन पर भारी असर तो पड़ा ही है, सप्लाई लाइन बुरी तरह बाधित हुई। इकोनॉमिक कॉम्प्लेक्सिटी ऑब्जर्वेटरी के आंकड़ों के मुताबिक ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों के विश्व के चार सबसे बड़े निर्यातक हैं। इनमें से कतर वह देश है, जहां से भारत सबसे ज्यादा एलपीजी गैस आयात करता है। ओमान से भारत यूरिया वगैरह जैसे उर्वरक मंगाता है। ये उर्वरक प्राकृतिक गैस से बनते हैं और उन फसलों में इस्तेमाल होते हैं, जिनसे दुनिया के करीब आधे अनाज पैदा होते हैं।
हॉर्मूज में जहाजों का आवागमन घटकर महज 20 फीसदी रह गया है, जिससे आपूर्ति घट गई है। उधर कतर के गैस क्षेत्रों पर हमला करके ईरान ने कुछ हिस्सों में आग लगा दी है। इससे उन इलाकों में कामकाज ठप हो गया, जिसका असर भारत पर सीधे तौर पर पड़ा। अब सरकार ने पेट्रोल पर टैक्स शून्य रखा है, जबकि डीजल पर 18.5 रुपए प्रति लीटर की दर तय की गई है। निर्यात के लिए पेट्रोल, डीजल और एटीएफ पर कई शुल्कों से छूट दी गई है। इसके अलावा 2022 में लागू विंडफॉल टैक्स को भी खत्म कर दिया गया है, जिससे घरेलू तेल कंपनियों को राहत मिलेगी। ये सभी बदलाव 26 मार्च से तुरंत प्रभाव से लागू हो गए हैं।
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट कर दिया है कि देश में ईंधन की कमी के कारण किसी भी तरह का लॉकडाउन लगाने की कोई योजना नहीं है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 100 डॉलर तक पहुंचने से तेल कंपनियों को प्रति लीटर लगभग 48 रुपए का घाटा हो रहा है। अब एक्साइज ड्यूटी में कटौती के बाद इसमें कमी आएगी। अगर हालात इसी तरह बने रहे और युद्ध की समाप्ति के आसार नहीं होंगे या कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होती रहेगी तो फिर इनका घाटा बढ़ता ही रहेगा। ऐसे में सरकार के पास विकल्प कम होंगे। वैसे तो कच्चे तेल की कीमतें बढऩे से अमरीका की अर्थव्यवस्था पर इसका असर दिखने लगा है। ऐसे में ट्रंप ने भारत तथा अन्य देशों को रूस से तेल लेने की इजाजत दे दी है। इतना ही नहीं, ईरान पर तेल बेचने संबंधी प्रतिबंधों को एक महीने के लिए वापस ले लिया है। इससे भारत जैसे देशों को राहत मिल सकती है।
2019 तक ईरान भारत का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश था, किंतु अमरीकी प्रतिबंधों के कारण उसे दूरी बनानी पड़ी। इसके बाद रूस से भारत ने तेल लेना शुरू किया, जो काफी सस्ता था लेकिन ट्रंप ने बहाना बनाकर उस पर भी रोक लगा दी। वैसे उस प्रतिबंध के बावजूद भारत रूस से तेल लेता ही रहा। अब भी वहां से तेल आ रहा है लेकिन सप्लाई सीमित है। अगर तेल की सप्लाई बढ़ भी गई तो गैस की कमी रहेगी ही, क्योंकि भारत का मुख्य सप्लायर कतर अभी युद्ध की चपेट में है। वहां गैस के कुओं में आग लगी हुई है और सुधार की गुंजाइश नहीं है। ऐसे में एलपीजी की कमी बनी रहेगी। लेकिन भारत के पास काफी बड़ी तादाद में कच्चा तेल है और सरकार ने पिछले दिनों स्पष्ट किया था कि उसके पास 70 दिनों तक के लिए कच्चे तेल का भंडार है यानी पर्याप्त तेल है। सरकार ने पहले भी सस्ती दरों पर तेल खरीदा था और आने वाले समय में भी तेल की नियमित सप्लाई वह सुनिश्चित कर लेगी। ऐसे में किसी भी तरह की कमी की संभावना नहीं है। एक्साइज ड्यूटी में कमी कर भारत ने पेट्रोल-डीजल की कीमतें थाम ली हैं।
Updated on:
30 Mar 2026 02:00 pm
Published on:
30 Mar 2026 01:59 pm
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