सबसे बड़ी समस्या यह है कि सोशल मीडिया पर सामग्री डालने वाले व्यक्ति की योग्यता, मंशा और जिम्मेदारी तय नहीं होती। कोई भी खुद को फिटनेस एक्सपर्ट, न्यूट्रिशनिस्ट या आयुर्वेदाचार्य घोषित कर देता है।
तमिलनाडु के मदुरै की 19 वर्षीय युवती कलैयारसी की मौत ने एक बार फिर समाज को झकझोर कर रख दिया है। स्लिम होने की चाह में उसने यूट्यूब पर देखी गई एक दवा का सेवन किया, जो जानलेवा साबित हुई। यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि उस खतरनाक प्रवृत्ति की चेतावनी है, जिसमें युवा पीढ़ी बिना जांच-परख सोशल मीडिया की सलाह पर आंख मूंदकर भरोसा कर रही है। आज सोशल मीडिया केवल मनोरंजन या संवाद का माध्यम नहीं रह गया है। यह स्वास्थ्य, सौंदर्य, फिटनेस, निवेश और यहां तक कि मानसिक समस्याओं के समाधान का तथाकथित मंच बन चुका है।
कुछ मिनटों की वीडियो या आकर्षक रील में 100 फीसदी रिजल्ट का दावा किया जाता है, और युवा वर्ग उसे सच मान लेता है। कलैयारसी का मामला इसी अंधविश्वास और जल्दबाजी का दर्दनाक परिणाम है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि सोशल मीडिया पर सामग्री डालने वाले व्यक्ति की योग्यता, मंशा और जिम्मेदारी तय नहीं होती। कोई भी खुद को फिटनेस एक्सपर्ट, न्यूट्रिशनिस्ट या आयुर्वेदाचार्य घोषित कर देता है। दवाओं, सप्लीमेंट्स और घरेलू नुस्खों को चमत्कारी बताकर प्रचारित किया जाता है, जबकि उनके दुष्प्रभाव, वैज्ञानिक प्रमाण और व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थितियों की कोई चर्चा नहीं होती। ऐसे में एक गलत सलाह सीधे जीवन पर भारी पड़ सकती है। वहीं युवा भी स्लिम, फिट और परफेक्ट दिखने की सामाजिक होड़ में त्वरित समाधान चाहते हैं। मेहनत, समय और चिकित्सकीय सलाह की जगह शॉर्टकट को चुना जाता है। सोशल मीडिया इसी कमजोरी का फायदा उठाता है।
इस पूरे परिदृश्य में सोशल मीडिया के नियमन की कमी भी एक बड़ा कारण है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर स्वास्थ्य संबंधी सामग्री की कोई सख्त निगरानी नहीं है। भ्रामक विज्ञापन, अप्रमाणित दवाएं और झूठे दावे खुलेआम प्रसारित होते हैं। जब कोई हादसा होता है, तब जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है। न कंटेंट क्रिएटर पर सीधी जवाबदेही होती है, न प्लेटफॉर्म पर ठोस कार्रवाई। हालांकि, इसके लिए हम खुद भी जिम्मेदार है। किसी भी दवा या उपचार से पहले डॉक्टर से परामर्श अनिवार्य होना चाहिए। सोशल मीडिया पर मिली जानकारी को अंतिम सत्य मानने के बजाय उसे अन्य माध्यमों से जांचना जरूरी है। विश्वसनीय स्रोत, प्रमाणित विशेषज्ञ और वैज्ञानिक तथ्यों पर भरोसा करना ही सुरक्षित रास्ता है। ऐसे मामलों में शिक्षा संस्थानों और परिवारों की भूमिका भी अहम है। युवाओं को डिजिटल साक्षरता सिखानी होगी, यह समझाने की जरूरत है कि हर ऑनलाइन जानकारी सही नहीं होती। उन्हें यह भी बताना होगा कि स्वास्थ्य से जुड़ा कोई भी फैसला प्रयोग का विषय नहीं है। इस घटना को एक चेतावनी माना जाना चाहिए। सोशल मीडिया का उपयोग करें, लेकिन सावधानी, विवेक और जिम्मेदारी के साथ। क्योंकि एक क्लिक, एक वीडियो या एक गलत सलाह, किसी की जिंदगी खत्म कर सकती है।