
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ससुराल में दहेज प्रताड़ना की शिकार विवाहित बेटियों को 'समझौता कर लो' की सलाह न देने की परिजनों को नसीहत दी है। दहेज हत्या के एक मामले में कोर्ट ने यह गंभीर टिप्पणी भी की है कि कई मामलों में यह सलाह बेटियों के लिए जानलेवा भी हो सकती है। जाहिर है कि अभिभावकों की जिम्मेदारी केवल बेटियों का विवाह कर देने तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह देखना भी उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने ससुराल में सुख से जीवन व्यतीत कर रही है अथवा नहीं।
बेटियों को यह भरोसा होना भी चाहिए कि मुसीबत के दौर में उसका समूचा पीहर पक्ष उसके साथ है। सामाजिक सुधार के अनेक प्रयासों और सख्त कानूनी प्रावधानों के बावजूद दहेज की मांग, पति के विवाहेत्तर संबंधों तथा विवाहिता के चरित्र पर संदेह जैसे कारणों से आज भी अनेक बेटियां विवाह के बाद ससुराल में प्रताडऩा का शिकार हो रही हैं। दहेज प्रथा अब तक न जाने कितनी बेटियों की जिंदगी निगल चुकी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिस गंभीर विषय की ओर ध्यान दिलाया है वह इसलिए भी विचारणीय है क्योंकि कई मामले ऐसे सामने आते हैं जब प्रताडऩा की शिकार बेटियां अपने परिजनों से इसका जिक्र करती हैं तो उसे यह कहकर शांत रहने को कहा जाता है कि सब ठीक हो जाएगा। बेटी पराया धन है और जिस घर में डोली गई है उस घर से ही उसकी अर्थी उठेगी जैसी हमारी सामाजिक सोच भी इस तरह के दबाव में भागीदार बनती है। परिजनों की अनदेखी से कई बार बेटियां ससुराल पक्ष की क्रूरता का शिकार होती रहती हंै। यही कू्ररता उनकी जान की दुश्मन तक बन जाती है। ससुराल से प्रताडि़त होकर मायके पहुंचने वाली बेटियों का दर्द समझते हुए परिजन व्यवहार करने लगे तो दहेज लोलुपों को सजा दिलाने में मदद मिल सकती है। एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि बेटियों को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार तो कानूनी रूप से मिल चुका है, लेकिन व्यवहार में संपत्ति का बंटवारा अक्सर केवल भाइयों के बीच ही सीमित रह जाता है। ऐसे में जब कोई बेटी मायके लौटती है, तो कई परिवारों में उसके अधिकार से अधिक संपत्ति के बंटवारे की चिंता हावी हो जाती है। जबकि अधिकांश बेटियां विवाह के बाद स्वेच्छा से अपने हिस्से का दावा छोड़ देती हैं। जबकि पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी उन्हें मजबूत करने वाली ही हो सकती है। खासतौर पर प्रताडऩा के ऐसे मामलों में। एक तथ्य यह भी है कि दहेज प्रताडऩा के मामलों में नई पीढ़ी अत्याचारों के विरोध में आवाज उठाने लगी है लेकिन परिजनों की सोच में बदलाव लाए बिना उन्हें पूरा संरक्षण मिलना आसान नहीं है।
दहेज प्रताडऩा का सामना करने वाली बेटियों को भावनात्मक और कानूनी रूप से संरक्षण देना परिजनों का कर्तव्य है। बेटियों को यह हमेशा विश्वास दिलाना होगा कि वे बोझ नहीं बल्कि परिवार की ताकत हैं। प्रताडऩा के मामलों में समझौता कर लो जैसी नसीहत तो उन्हें अकेला छोडऩा ही कहा जाएगा।