यदि राज्य को बंधक बनाने की छूट ईश्वर को नहीं दी जा सकती, तो राज्य को भी ईश्वर होने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। भारतीय संविधानवाद की मर्यादा का तकाजा है कि यह बहस जारी रहे।
- प्रताप भानु मेहता, राजनीतिशास्त्री
इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन और अन्य बनाम केरल के मुकदमे में आया फैसला ऐतिहासिक है। दस से पचास वर्ष की अवस्था के बीच की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश दिए जाने का निर्णय दुरुस्त है। वैसे तो इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए यही तथ्य पर्याप्त था कि उक्त बंदिश कोई प्राचीन नहीं, बल्कि हालिया है, लेकिन यह फैसला इसलिए अहम हो जाता है क्योंकि संविधान के प्रति यह भिन्न नजरियों को सूत्रीकृत करने का काम करता है जिससे संवैधानिक व्याख्या के प्रति एक किस्म का आकर्षण पैदा होता है। बहुमत से दिया गया यह फैसला बिल्कुल सही है। मैं इसके निष्कर्ष से इत्तेफाक रखता हूं, लेकिन इस तक पहुंचने की तर्क प्रक्रिया के कुछ आयामों के अनावश्यक रूप से व्यापक होने को लेकर मुझे थोड़ी चिंता है। उस संदर्भ में जस्टिस इंदु मल्होत्रा की असहमति एक चेतावनी के रूप में हमारे सामने आती है।
जस्टिस डीवाइ चंद्रचूड़ का निर्णय उन सिद्धांतों को स्पष्ट करता है जो अब तक धुंधले बने हुए थे। पहला सिद्धांत है सामूहिक अधिकारों के ऊपर व्यक्ति के अधिकारों को तरजीह। इस दावे की बुनियाद बिल्कुल वही है जिसके आधार पर समूह अपने अधिकारों पर दावा करते रहे हैं कि जिन प्रथाओं से उनकी सहमति नहीं, वे उन पर थोपी नहीं जानी चाहिए। बस इसी सिद्धांत को व्यक्तियों तक विस्तारित कर दिया जाए, जहां व्यक्तियों पर समूह अपने नियम-कानून न थोप सकें। जस्टिस मल्होत्रा की असहमति में इस दावे की अनदेखी की गई है।
ज्यादा अहम यह है कि उक्त फैसला संवैधानिक न्याय-निर्णय के सिद्धांत को स्पष्ट करता है। स्वतंत्रता, समानता और मर्यादा को बनाए रखने का काम राज्य का होता है। उसे बस इतना पूछना है कि क्या कोई प्रथा उक्त मूल्यों के समानुकूल है या नहीं। यह नजरिया नैतिक रूप से भी एकदम साफ है। जो प्रथाएं इन मूल्यों का अनुपालन नहीं करती हैं उन्हें राज्य का समर्थन नहीं होना चाहिए। अदालत को यह संकल्प कायम रखने में निरंतर धैर्य और साहस का परिचय देना होगा।
तीसरी बात, जो सबसे ज्यादा जरूरी है, वह यह कि यह फैसला धर्म विरोधी नहीं माना जाना चाहिए। धार्मिक स्वतंत्रता के प्रावधान, अन्य अधिकारों और उस समग्र संवैधानिक नैतिकता के संदर्भ में देखे जाएं, जहां स्वतंत्रता और समानता पर जोर निहित है। इस दलील के साथ उक्त फैसला धार्मिक पहचान की प्रामाणिकता के लिए परिप्रेक्ष्य उपलब्ध कराता है। धर्म को स्वतंत्रता और समानता का अनुगामी होना चाहिए, पर धर्म का सही अर्थ तभी खुलेगा जब उसकी पूर्व शर्त स्वतंत्रता और समानता हो। तभी हम जानेंगे कि कोई प्रथा जोर-जबर या गैर-बराबरी का उत्पाद है या फिर वास्तव में समाज उसे मानता है। मसलन, महिलाएं यदि खुद सबरीमला में प्रवेश नहीं करने का विकल्प चुनती हैं, तब हम यह जान पाएंगे कि यह धर्मपरायणता किसी जोर-जबर या अलगाव का नतीजा नहीं है।
ये सिद्धांत बेशक शुभकर हैं, पर जस्टिस चंद्रचूड़ की दलीलों को भी सतर्कता के साथ बरता जाना होगा। मान लें कि आप उनके समानता के इंकलाबी नजरिये से सहमत हैं, यह भी मानते हैं कि गैर-बराबरी पैदा करने वाली सामाजिक संरचना धर्म व संस्कृति सहित एकाधिक स्रोतों से तैयार होती है, इससे भी मुतमईन हैं कि इसे बदलना चाहिए। तब भी यह सवाल बचा रह जाता है कि क्या हर बार राज्य को किसी प्रथा के मामले में टांग अड़ाना चाहिए जिसे वह पसंद नहीं करता।
जस्टिस चंद्रचूड़ का फैसला इस तथ्य को तकरीबन स्थापित कर देता है कि जब कभी राज्य के समक्ष कोई ऐसा सांस्कृतिक आचार आए जो असमानता के विचार को न्यूनतम भी पैदा करता हो, उसे हस्तक्षेप करना चाहिए।
इस संदर्भ में जस्टिस मल्होत्रा की चिंता दुरुस्त है कि सामाजिक सुधार के नाम पर यह पूर्णरूपेण राज्यवाद को लागू करने का एक नुस्खा है। यहां ‘अस्पृश्यता’ के प्रावधानों का इस्तेमाल इस संदेह को पुख्ता करता है। जस्टिस चंद्रचूड़ सही कहते हैं कि संविधान का परिवर्तनकारी नजरिया हर किस्म के भेदभाव के खिलाफ है, पर हर किस्म के भेदभाव को अस्पृश्यता ठहराना न सिर्फ ऐतिहासिक उपमानों को अविश्वास के बिंदु पर लाकर छोडऩा है, बल्कि इससे अदालत में अवधारणात्मक स्तर पर एक किस्म की अराजकता भी पैदा होती है। ऐसे ही रहा तो अस्पृश्यता का प्रावधान जीने के अधिकार की तरह हर मामले का रामबाण बन जाएगा।
एक और मसला है राज्य व धर्म के बीच के रिश्ते का, जिससे हम बचते हैं। यह कहना अतिरंजना नहीं है कि हिंदूइज्म का राष्ट्रीयकरण करने में राज्य का हाथ रहा है। तमाम मंदिर राज्य की अधिसूचनाओं और कानूनों से बंधे हुए हैं या उनकी पैदाइश हैं। हम मानकर चलते हैं कि राज्य का काम धर्म को परिभाषित करना है।
अदालतों ने इस बार व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मर्यादा और समानता के हक में बात की है। बहुमत का फैसला भी इसी पक्ष में है। यहां यह ध्यान रखा जाना होगा कि निरपेक्ष राज्यवाद के अपने खतरे हैं। इंदु मल्होत्रा ने हमें इससे सचेत किया है। यदि राज्य को बंधक बनाने की छूट ईश्वर को नहीं दी जा सकती, तो राज्य को भी ईश्वर होने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। भारतीय संविधानवाद की मर्यादा का तकाजा है कि यह बहस जारी रहे।