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अदालत का ऐसा कहना व्यावहारिक बिल्कुल नहीं

वकीलों के कामकाज, उनके अनुभव और उनकी विषय विशेषज्ञता को लेकर किसी तरह का कोई मापक उपलब्ध नहीं होता।

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Dec 17, 2017
indian courts

- अदीश सी. अग्रवाल

देश की सर्वोच्च अदालत की अधिवक्ताओं की ऊंची फीस को लेकर पिछले दिनों की गई टिप्पणी दरअसल किसी तरह का आदेश नहीं है। सबसे पहले तो यह बात हमें स्पष्ट तौर पर समझ लेनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने किसी एक मामले में केवल यह कहा है कि आम आदमी को भी न्याय मिल सके, इसके लिए अधिवक्ताओं की फीस की अधिकतम सीमा तय की जानी चाहिए। न्यायालय कोई अन्य मामले में अपनी बात कह रहा था और इसके संदर्भ में उसने अधिवक्ताओं की फीस का सुझाव भी दे दिया।

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यदि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला होता तो अधिवक्ताओं की ओर से इस मामले पर अपना पक्ष भी रखा जाता। जहां तक इस सुझाव का मामला है तो इसे व्यावहारिक तौर पर सही नहीं माना जा सकता। दरअसल, वकीलों के कामकाज, उनके अनुभव और उनकी विषय विशेषज्ञता को लेकर किसी तरह का कोई मापक उपलब्ध नहीं होता। उन्हें काम के संदर्भ में कोई प्रमाणपत्र नहीं मिलता। यही वजह है कि निजी तौर पर वकीलों की फीस तय कर पाना संभव नहीं हो पाता। अधिवक्ताओं की मेहनत को सोने या हीरे की तरह तौलकर उनकी कीमत नहीं लगाई जा सकती।

किसी मामले में कम मेहनत की आवश्यकता होती है और किसी मामले बहुत अधिक मेहनत की जरूरत पड़ती है। इस बात को सरकारी स्तर पर भी मान्यता मिलती है। अलग-अलग विभाग में उनकी फीस अलग-अलग होती है। आमतौर पर अधिवक्ताओं की दो तरह की श्रेणी होती है। एक होते हैं साधारण या जनरल एडवोकेट और दूसरे होते हैं, डेजिग्नेटेड सीनियर एडवोकेट। लेकिन, स्थितियां ऐसी हैं कि इन वरिष्ठ अधिवक्ताओं के अनुभव को भी कई बार प्रार्थी अपेक्षित अहमियत नहीं देते।

जब काम और अनुभव के आधार पर भी फीस तय नहीं हो सकती है तो फीस की सीमा तय करने का सुझाव, उचित नहीं लगता। इस बात को भी सच ही मानिए कि यदि विषय विशेषज्ञता वाले बड़े अधिवक्ताओं की फीस की सीमा तय होने लगेगी तो ये बड़े अधिवक्ता तो शायद काम ही नहीं करेंगे। आपराधिक मामलों में तो जो व्यक्ति अपना वकील तय नहीं कर पाता, उसे भारत सरकार या राज्य सरकार की ओर से वकील उपलब्ध कराया जाता है।

न्याय के लिए सिविल मामलों के लिए भी सरलता से वकील उपलब्ध होने लगे और वकीलों की फीस की सीमा तय की जाने लगी, तो यह भी संभव है कि झूठे मामलों की संख्या में भी इजाफा हो जाए। आज तो बड़ी अदालत में फीस के डर से भी बहुत से मामले नहीं आते। ये सारे तर्क तब जरूर दिए जाते जबकि अदालत ने फीस की सीमा तय करने के लिए आदेश दिया होता। फिर कहूंगा कि यह केवल सुझाव है जिसे लागू कर पाना काफी मुश्किल है।

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Published on:
17 Dec 2017 01:28 pm
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