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उथल-पुथल के दौर से गुजरती दुनिया में भारत से प्रबल उम्मीदें

आज हर देश दूसरे से आगे निकलने की होड़ में है, जिससे वैश्विक शांति खतरे में पड़ गई है। हाल के समय में वर्चस्ववादी हस्तक्षेपों ने उस स्थिरता को चोट पहुंचाई है, जो आर्थिक विकास की आधारशिला होती है।

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जी. एन. बाजपेयी (सेबी और एलआइसी के पूर्व अध्यक्ष) , प्रवीण तिवारी (पूर्व उप नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) - दूसरे विश्व युद्ध के बाद के करीब 75 सालों तक दुनिया में शांति बने रहने की बड़ी वजह यह थी कि सभी देश नियम-आधारित व्यवस्था और मुक्त बाजार सिद्धांतों पर आधारित नवशास्त्रीय आर्थिक ढांचे से चल रहे थे। मांग व आपूर्ति का संतुलन था और संसाधनों के कुशल आवंटन से चीजें तय होती थीं। दुनिया भले ही दो गुटों में बंटी थी और कुछ बड़े देशों का दबदबा था, फिर भी संयुक्त राष्ट्र और विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं ने देशों के बीच मतभेदों को पाटने और विवादों को सुलझाने में अहम भूमिका निभाई।

1990 के दशक में सोवियत संघ के पतन के बाद दुनिया एकध्रुवीय हो गई, जिससे बड़े देशों की मनमानी और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की उपेक्षा बढ़ी। हालांकि वैश्विक आय बढ़ी, लेकिन अमीर-गरीब के बीच की खाई भी चौड़ी हुई। इस असमानता ने कई देशों में दक्षिणपंथी राजनीति और आर्थिक राष्ट्रवाद को जन्म दिया। इसका गहरा असर तेल या खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न देशों में दिखा। इसी माहौल ने अन्य देशों में भी ताकतवर बनने की आकांक्षा जगाई, ताकि दुनिया किसी एक के इशारे पर न चले। आज हर देश दूसरे से आगे निकलने की होड़ में है, जिससे वैश्विक शांति खतरे में पड़ गई है। हाल के समय में वर्चस्ववादी हस्तक्षेपों ने उस स्थिरता को चोट पहुंचाई है, जो आर्थिक विकास की आधारशिला होती है। इस अराजकता से मानवता को बचाने और अनिश्चितताओं को कम करने के लिए एक संतुलनकारी शक्ति की जरूरत है। मध्यम-शक्ति वाले देशों के पास यह अवसर है कि वे गठबंधन बनाकर नियम-आधारित व्यवस्था को फिर से सुदृढ़ कर वैश्विक संतुलन स्थापित करें।

भारत इस दिशा में लोकतांत्रिक 'मिडिल पावर' देशों का नेतृत्व करने में पूरी तरह सक्षम है। इसके पांच प्रमुख कारण हैं- पहला, भारत दुनिया का सबसे बड़ा और सक्रिय लोकतंत्र और तीव्रगामी अर्थव्यवस्था है। दूसरा, भारत ने सदैव संप्रभुताओं का सम्मान, आक्रामकता का विरोध और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया है। तीसरा, भारत की साख उसकी बहुलतावादी राजनीति, शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण, कानून के शासन और प्रभावी प्रशासनिक तंत्र पर टिकी है। चौथा, दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और हिंद-प्रशांत के बिल्कुल मध्य में स्थित होने के कारण भारत को रणनीतिक बढ़त हासिल है और पांचवां, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और तकनीकी क्षमताओं के कारण भारत वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं, डिजिटल शासन और विकास सहयोग को प्रभावित कर सकता है। मिडिल पावर देशों का नेतृत्व सहयोग, समायोजन और पारस्परिक सम्मान पर आधारित हो सकता है। भारत विकसित और विकासशील देशों के बीच एक सेतु बन सकता है। यह गठबंधन वैश्विक संस्थाओं को सशक्त और अधिक न्यायसंगत बनाने पर केंद्रित होना चाहिए। भारत की कूटनीति की प्राथमिकता संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार होनी चाहिए। भारत को जी-20, ब्रिक्स और क्वाड जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय समूहों में अपनी भूमिका और सक्रिय करनी होगी। वर्तमान उथल-पुथल को देखकर दुनिया के कई देश अब चाहते हैं कि वैश्विक व्यवस्था किसी की मनमर्जी से नहीं, बल्कि तय नियमों से चले। भारत को भी चाहिए कि वह ऑस्ट्रेलिया, जापान, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के साथ मिलकर जलवायु परिवर्तन, समुद्री सुरक्षा, साइबर शासन और आपूर्ति शृंखला सुदृढ़ीकरण जैसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाए।

आज दुनिया भारत को सिर्फ एक बड़े बाजार के रूप में देखती है, लेकिन हमें इससे आगे बढ़कर अंतरिक्ष, रक्षा, विमानन, एआइ और सेमीकंडक्टर और कुशल मानव संसाधन में न सिर्फ आत्मनिर्भर बनना होगा, बल्कि इनमें निर्यात क्षमता भी बढ़ानी होगी। हमें आर्थिक कूटनीति व सॉफ्ट पावर- सांस्कृतिक विविधता, लोकतांत्रिक स्थिरता का उपयोग दुनिया का भरोसा जीतने के लिए करना चाहिए। भारत को अपने सामथ्र्य का उपयोग करते हुए स्थिर, समावेशी और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभानी होगी।