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‘माया ही ब्रह्म का बंधन’ आलेख पर प्रतिक्रियाएं

Reaction On Gulab Kothari Article : पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के विशेष लेख- ‘माया ही ब्रह्म का बंधन’... पर प्रतिक्रियाएं
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जयपुर

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Rakesh Mishra

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Updated: 30 May 2026, 9:29 PM IST

Gulab Kothari Article

पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी (फोटो: पत्रिका)

जयपुर। पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के आलेख ‘माया ही ब्रह्म का बंधन’ को पाठकों ने अध्यात्म, दर्शन और मानव जीवन के गूढ़ रहस्यों की सरल तथा सारगर्भित व्याख्या बताया है। पाठकों का कहना है कि लेख में माया, ब्रह्म, आत्मा और सृष्टि के संबंधों को भारतीय दर्शन की दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

उपनिषदों और गीता के संदर्भों के माध्यम से लेखक ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि माया केवल भ्रम नहीं, बल्कि ब्रह्म की अभिव्यक्ति का माध्यम भी है, जो जीव को अनुभव, कर्म और आत्मबोध की यात्रा से जोड़ती है। पाठकों के अनुसार लेख मनुष्य को बाहरी जगत की आकर्षणपूर्ण परिधि से आगे बढकऱ अपने भीतर स्थित चेतना और सत्य की खोज करने के लिए प्रेरित करता है। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से।

आलेख ‘माया ही ब्रह्म का बंधन’ अध्यात्म, दर्शन और मानव चेतना के गहरे संबंधों को बहुत ही सरल और प्रभावी ढंग से समझाता है। उपनिषदों और गीता के संदर्भों से यह स्पष्ट किया गया है कि संपूर्ण चराचर जगत अव्यय पुरुष और माया के मिलन का ही परिणाम है। आलेख का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि यह केवल दार्शनिक बातें नहीं करता, बल्कि मन की चंचलता, इंसानी कामनाओं और स्त्री-पुरुष के आंतरिक स्वभाव का व्यावहारिक विश्लेषण भी करता है। यह हमें बताता है कि हमारी कामनाएं ही तय करती हैं कि हम बंधन की ओर जा रहे हैं या मुक्ति की ओर। आज के आपाधापी भरे जीवन में, जहां इंसान भौतिक आकर्षणों (माया) के पीछे अंधाधुंध भाग रहा है, यह लेख हमें अपने भीतर झांकने, मन को नियंत्रित करने और आत्मिक स्वतंत्रता की राह पर चलने की बेहद जरूरी प्रेरणा देता है। वैचारिक स्पष्टता के लिहाज से यह एक बेहद विचारणीय और उत्कृष्ट आलेख है।

  • केपीएस परिहार, छतरपुर

आलेख ‘माया ही ब्रह्म का बंधन’ जीवन, आत्मा और प्रकृति के गूढ़ संबंधों को सरल भाषा में समझाने का सार्थक प्रयास है। मनुष्य की इच्छाएं, कामनाएं और मोह ही उसे सत्य से दूर ले जाकर बंधनों में जकड़ते हैं। आत्मा स्वभावत: मुक्त है, लेकिन माया के प्रभाव से व्यक्ति स्वयं को शरीर और संसार तक सीमित मान लेता है। लेख आत्मचिंतन, संयम और विवेक का संदेश देता है तथा जीवन के आध्यात्मिक पक्ष को समझने की प्रेरणा देता है। यह चिंतन पाठकों को आत्मबोध की दिशा में अग्रसर करने वाला है।

  • अनिल श्रीवास्तव, साहित्यकार, सतना

यह आलेख भारतीय ज्ञान-परंपरा के समीप की अनुभूति प्रकट करता है। वेदों और ब्रह्म के अस्तित्व का वर्णन करता यह लेख वर्तमान पीढ़ी का पथ-प्रदर्शक हो सकता है। वेदों के माध्यम से सूर्य और वाणी की शक्ति को उद्धृत करना अनुकरणीय है। इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के गूढ़ ज्ञान को प्रदर्शित करते हैं।

  • डॉ. विनोद श्रीवास्तव, पूर्व एडी, रीवा

गुलाब कोठारी जी ने ‘माया ही ब्रह्म का बंधन’ लेख के जरिए भारतीय दर्शन की गहराइयों को समझाया है। माया, पुरुष और प्रकृति के संबंध की जिस प्रकार व्याख्या की है, वह पाठक को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती है। आज के भौतिकवादी युग में मनुष्य बाहरी आकर्षणों और इच्छाओं के जाल में उलझता जा रहा है। ऐसे समय में इस तरह के लेख हमें आत्मबोध के लिए प्रेरित करते हैं। इसमें स्त्री-पुरुष के गुणों, मन की चंचलता और कामना के प्रभाव को आध्यात्मिक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है। ऐसा लेख जीवन को संतुलित और सार्थक बनाने का संदेश देता है।

  • शिवरतन नामदेव, दादाजी धाम, भोपाल

‘माया ही ब्रह्म का बंधन’ आलेख में गुलाब कोठारी जी ने जटिल आध्यात्मिक विषयों को सहज और व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से समझाया है। इस लेख में बताया गया है कि माया और कामना जीव को उसके वास्तविक स्वरूप से दूर कर देती हैं। वर्तमान समय में, जहां व्यक्ति बाहरी उपलब्धियों और सुख-सुविधाओं को ही जीवन का लक्ष्य मान बैठा है, यह लेख आत्मा, चेतना और विवेक की ओर लौटने का संदेश देता है। यह लेख संदेश देता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक प्रगति नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति भी है। ऐसे लेख समाज में नैतिकता, संयम और आध्यात्मिक मूल्यों को मजबूती देते हैं।

  • पं. रमाकांत शुक्ला, भोपाल

आलेख ‘माया ही ब्रह्म का बंधन’ में माया, आत्मा और मनुष्य के जीवन के गहरे संबंधों को समझाया गया है। आत्मा स्वभाव से मुक्त है, लेकिन कामनाएं और मोह उसे बंधनों में जकड़ देते हैं। मन की चंचलता ही व्यक्ति के दुखों का प्रमुख कारण बनती है। आलेख आत्मचिंतन और आत्मज्ञान की आवश्यकता पर बल देता है। यह भौतिक सुखों के पीछे भागने के बजाय आंतरिक शांति खोजने की प्रेरणा देता है। आदरणीय कोठारी जी का यह आलेख जीवन और अध्यात्म को समझने की एक सार्थक दृष्टि प्रस्तुत करता है।

- रवि शंकर पारखे, प्रवक्ता, गायत्री परिवार, बैतूल

‘शरीर ही ब्रह्मांड’ श्रृंखला ने मुझे मानव जीवन को समझने में बहुत मदद की है। इस बार की कड़ी ‘माया ही ब्रह्म का बंधन’ में स्त्री और पुरुष के पारस्परिक बंधन और उपादेयता को बड़ी बारीकी से समझाया गया है। ब्रह्म स्वच्छंद रहना चाहता है, किंतु माया उसे बंधन का महत्व समझाती है और दोनों की परस्पर पूरक स्थिति के बाद मनुष्य अपना असली आकार लेता है।

  • राधाशरण द्विवेदी, सागर

माया ही ब्रह्म का बंधन है और प्रकृति में होने वाली सारी गतिविधियों का आधार भी वही है। स्त्री और पुरुष के भीतर माया के अलग-अलग रूप कार्य करते हैं। पुरुष में सौम्यता और स्त्री में चंचलता अधिक दिखाई देती है। मन की कामना, आकर्षण और विषय-वासनाएं जीव को संसार से बांधती हैं। जब मन अव्यय, शांत और संतुलित होता है, तब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप के निकट पहुंचती है। माया का प्रभाव जीवन को गतिशील बनाता है, पर उससे ऊपर उठकर विवेक, संयम और आत्मबोध प्राप्त करना ही आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है।

  • मनोज भार्गव, ज्योतिषाचार्य, ग्वालियर

गुलाब कोठारी जी ने ‘शरीर ही ब्रह्मांड’ के इस भाग ‘माया ही ब्रह्म का बंधन’ को बड़े ही गहराई से समझाया है। उन्होंने प्रकृति, आत्मा और पुरुष-स्त्री संबंधों पर भी सार्थक विचार प्रकट किए हैं। बताया है कि किस प्रकार अव्यय और अक्षर के साथ रहने से व्यक्ति स्वतंत्र रहता है और किस प्रकार कामना के संपर्क में आने से परतंत्र हो जाता है। उन्होंने प्रकृति में मायाबल के दोनों ओर क्रियाशील रहने और आत्मा के कर्तृत्व-भाव से मुक्त होने का भी सार्थक वर्णन किया है। पुरुष भीतर से सौम्य और दुर्बल भी है, जबकि स्त्री-शरीर चंचलता का पर्याय है। कोठारी जी ने यह भी कहा कि आज स्त्री अधिक आक्रामक हो गई है, उसका पौरुष-भाव बढ़ा है। भारतीय दर्शन में माया एक गूढ़ अवधारणा है, जिसे ब्रह्मांड की सृजनात्मक शक्ति या भ्रम के रूप में देखा जाता है।

  • तारकेश्वर त्रिपाठी, टीकमगढ़

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