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दरार तो है, बना रहेगा मजबूरी का गठबंधन

भाजपा नीत राजग की केंद्र सरकार के विरोध को लेकर विपक्षी दलों में फूट दिखती रही है। खासतौर से विपक्ष के अहम घटक जनता दल (यू) के नेता व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कई मौकों पर केेंद्र की नीतिगत फैसलों का समर्थन कर चुके हैं
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Jul 04, 2017
Congress
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नीरजा चौधरी वरिष्ठ पत्रकार
भाजपा नीत राजग की केंद्र सरकार के विरोध को लेकर विपक्षी दलों में फूट दिखती रही है। खासतौर से विपक्ष के अहम घटक जनता दल (यू) के नेता व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कई मौकों पर केेंद्र की नीतिगत फैसलों का समर्थन कर चुके हैं। तो क्या वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में विपक्षी दलों का महागठबंधन अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है?


विपक्ष के 'महागठबंधन' में आ रही दरार पिछले दिनों राष्ट्रपति चुनाव के लिए उम्मीदवार चुनने के मसलेे पर खुलकर दिखने लग गई। महागठबंधन का एक अहम हिस्सा है जनता दल (यूनाइटेड)। इसके नेता व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विभिन्न मुद्दों पर विपक्ष से इतर अपनी राय जाहिर करते रहे हैं। चाहे नोटबंदी हो या जीएसटी और या फिर राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी।

नीतीश कुमार ने विपक्ष की साझा उम्मीदवार मीरा कुमार का समर्थन न कर सत्तासीन राजग के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद का समर्थन करने का ऐलान किया तो राजनीतिक गलियारों में ऐसी अटकलें लगाई जाने लगी कि वे विपक्ष के महागठबंधन से बाहर निकलकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का हिस्सा बनना चाहते हैं।

बिहार में भी सरकार के प्रमुख घटक राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव कई मौकों पर साफ कह चुके हैं कि अगर नीतीश राजग के साथ जाना चाहते हैं तो वे सहर्ष जा सकते हैं। ऐसे हालात में सवाल उठता है कि क्या नीतीश वाकई विपक्ष का महागठबंधन तोड़कर राजग से हाथ मिलाने वाले हैं? विपक्षी दलों के महागठबंधन की बात करें तो लम्बे समय से केन्द्र में सत्तासीन रही कांग्रेस का व्यवहार गठबंधन के अन्य दलों के प्रति अग्रज की तरह रहता है।

पिछले दिनों जद (यूनाइटेड) नेता नीतीश कुमार ने ही पहल कर कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों से अपील की थी कि राष्ट्रपति पद पर विपक्ष का संयुक्त उम्मीदवार खड़ा किया जाए। साझा उम्मीदवार के तौर पर उन्होंने पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल व महात्मा गांधी के पौत्र गोपाल कृष्ण गांधी का नाम भी सुझाया था।

महागठबंधन के सभी अठारह दल गांधी की उम्मीदवारी पर सहमत भी हो गए थे। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी उनका समर्थन करने का वादा किया था। द्रमुक के प्रमुख करुणानिधि के जन्म दिवस के अवसर पर सभी प्रमुख नेता चेन्नई में एकत्र होने वाले थे। उम्मीद थी कि इस मौके पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, गोपाल कृष्ण गांधी को राष्ट्रपति पद के विपक्ष के साझा उम्मीदवार के तौर पर पेश करेंगे। लेकिन, ऐसा कुछ नहीं हुआ।

कांग्रेस ने विपक्षी दलों की राय को दरकिनार करते हुए कुछ समय पश्चात विपक्षी उम्मीदवार के तौर पर पूर्व लोकसभाध्यक्ष मीरा कुमार का नाम घोषित कर दिया। इससे विपक्षी दलों में संदेश गया कि कांग्रेस अपना उम्मीदवार जबरन थोप रही है। हालांकि, यह भी सच है कि राष्ट्रपति पद के दोनों ही उम्मीदवार दलित हैं। लेकिन, यह भी दिलचस्प है कि गोपाल कृष्ण गांधी हों या मीरा कुमार, ये दोनों ही राष्ट्रपति चुनाव जीतने लायक बहुमत जुटाने में असमर्थ हैं।

जब राजग ने रामनाथ कोविंद को अपना उम्मीदवार बनाया तो नीतीश कुमार ने उनके स्वच्छ राजनीतिक जीवन व व्यक्तिगत छवि को देखते हुए उनको समर्थन देने की घोषणा कर दी। जहां तक अन्य दूसरों मुद्दों जैसे नोटबंदी पर समर्थन का सवाल है तो यह कहा जा सकता है कि नीतीश कुमार ने काले धन के खिलाफ जनता के आक्रोश को देखते हुए नोटबंदी के फैसले का विरोध न कर सिर्फ उसके क्रियान्वयन की ही आलोचना की।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की देश में लोकप्रियता को देखते हुए नीतीश कुमार बहुत ही सधे हुए नेता के तौर पर अपनी प्रतिक्रिया देते रहे हैं। ऐसा लगता है कि जनभावनाओं को देखते हुए नीतीश कुमार केन्द्र सरकार को मुद्दों पर आधारित समर्थन देते रहेंगे।

भविष्य में इससे गठबंधन में दरार आने की आशंका क्षीण ही है क्योंकि अभी जनमानस में मोदी का जादू बरकरार है। विपक्ष के पास न तो मोदी जैसा चमत्कारिक नेतृत्व है और न ही वो अभी इतना मजबूत है कि राजग को चुनौती दे सके। नीतीश भी जानते हैं कि अगर विपक्ष जीतता भी है तो उनकी स्वयं की पार्टी की अधिक से अधिक बीस से बाईस सीटें ही आएंगी। इन सीटों के बलबूते प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल नहीं हो सकती।

इसे वे सार्वजनिक तौर पर यह कहकर स्वीकार भी कर चुके हैं कि वे 2019 में प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं है। बिहार में राजद से मतभेदों की बात करें तो यह कहा जा सकता है कि दोनों ही दलों का यह मजबूरी का गठबंधन है। बिहार में गठबंधन के नेता के रूप में नीतीश अभी स्वतंत्र रूप से कार्य कर रहे हैं।

अगर वे मौजूदा गठबंधन तोड़कर राजग के साथ जाते हैं तो उन्हें भाजपा का नेतृत्व स्वीकारना होगा। दूसरी ओर प्रमुख सहयोगी राजद की भी यही स्थिति है। राजद प्रमुख लालू यादव और उनके परिजन पहले ही आय से अधिक संपत्ति सम्बंधी विभिन्न मुकदमों में फंसे हुए हैं।

अगर वे गठबंधन तोडऩे की बात करते हैं तो वे सत्ता से बाहर हो जाएंगे। ऐसे मेें सत्ता से बाहर होने पर कानून का शिकंजा उन पर और कड़ा होने की आशंका रहेगी। सत्ता से बाहर होने पर राजद को अपना बचा-खुचा जनाधार खोने का भी डर है। जनता दल (यूनाइटेड) और राजद का जनाधार बिहार के कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित है। दोनों ही अपने बलबूते वहां सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है और कांग्रेस सहित गठबंधन के अन्य दलों के पास साथ बने रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। इसीलिए यह मजबूरी का गठबंधन अस्तित्व में बना रह सकता है।
Published on:
04 Jul 2017 10:54 pm