
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुदृढ़ करने के लिए हिंदी और देवनागरी लिपि को विशेष महत्व दिया गया। हिंदी देश की सर्वाधिक व्यापक रूप से बोली और समझी जाने वाली भाषाओं में रही है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के प्रबल समर्थक थे। दुर्भाग्य यह है कि जिस देश ने अपनी स्वतंत्रता के बाद अपनी भाषा और संस्कृति को आत्मसम्मान का आधार बनाया, उसी देश के संविधान की मूल रचना अंग्रेजी में हुई। दुनिया के अधिकांश देशों में संविधान उनकी अपनी भाषा में है, जबकि भारत का संविधान आज भी ऐसी भाषा में है, जो आम भारतीय की सहज भाषा नहीं है।
यदि संविधान की मूल रचना हिंदी में हुई होती और अन्य भारतीय भाषाओं में उसके प्रामाणिक अनुवाद उपलब्ध कराए जाते, तो भाषाई दूरी और उससे उत्पन्न अनेक समस्याएं शायद इतनी गंभीर नहीं होतीं। हम अक्सर साक्षरता और शिक्षा में अंतर करते हैं। पढऩा-लिखना जानना साक्षरता है, लेकिन शिक्षित नागरिक वही है, जो अपने अधिकारों और कर्तव्यों से परिचित हो। संविधान में दिए गए अधिकारों की जानकारी के बिना नागरिक अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का पूर्ण उपयोग कैसे कर सकता है? जब संविधान और अधिकांश कानूनों का मूल पाठ ऐसी भाषा में हो जिसे सामान्य नागरिक समझने में कठिनाई अनुभव करता हो, तब वास्तविक संवैधानिक जागरूकता कैसे विकसित होगी?
आज भी अधिकांश कानूनों का मूल प्रारूप अंग्रेजी में तैयार होता है। आवश्यकता इस बात की है कि कानूनों और नियमों की मूल रचना हिंदी सहित भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हो तथा उनके प्रमाणिक अनुवाद सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में किए जाएं। इससे नागरिक अपने अधिकारों, कर्तव्यों और कानूनी प्रावधानों को सहज रूप से समझ सकेंगे। विडंबना देखिए कि हम स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना चुके हैं, फिर भी हिंदी के सम्मान और उसके संरक्षण के लिए हिंदी दिवस मनाने की आवश्यकता पड़ती है। लगभग चार वर्ष पूर्व हिंदी दिवस के अवसर पर घटी एक घटना आज भी स्मरण में है। 14 सितंबर को हिंदी दिवस के उद्घाटन समारोह के बाद हिंदी के साहित्यकार संगोष्ठी कक्ष से चर्चा करते हुए भोजन कक्ष में पहुंचे। भोजन की मेज पर रखी सामग्री की विवरणिका देखकर एक सज्जन ने कहा- हिंदी दिवस पर हिंदी के विद्वानों के लिए भारतीय व्यंजनों का विवरण भी अंग्रेजी लिपि में लिखा गया है! सभी लोग यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए। यह घटना केवल एक छोटी-सी विसंगति नहीं, बल्कि बदलती मानसिकता का संकेत है।
पत्र-लेखन और चि_ियों का स्थान मोबाइल फोन के संदेशों ने ले लिया है। संदेश भेजने की सुविधा देवनागरी में भी उपलब्ध है, फिर भी नई पीढ़ी तेजी से हिंदी को अंग्रेजी वर्णमाला में लिखने लगी है। इसका एक कारण देवनागरी में मात्राएं लगाने में लगने वाला समय भी बताया जाता है। सुविधा के लिए आरंभ हुआ यह परिवर्तन कहीं हमारी लिपि के अस्तित्व के लिए चुनौती न बन जाए, इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। आज अनेक लोग हिंदी बोलते हैं, पर उसे देवनागरी में लिखने का अभ्यास लगातार कम होता जा रहा है। मोबाइल पर बार-बार लिपि बदलना भी लोगों को असुविधाजनक लगता है। परिणामस्वरूप हिंदी शब्दों को अंग्रेजी वर्णमाला में लिखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। भाषा की शुद्धता के स्थान पर केवल इतना पर्याप्त मान लिया गया है कि सामने वाला हमारी बात समझ जाए। भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम नहीं होती। उसमें किसी समाज की संस्कृति, परंपरा, इतिहास, संवेदना और सामूहिक स्मृति सुरक्षित रहती है। लिपि उस भाषा को स्थायित्व प्रदान करती है। भाषा के प्रति अनुराग कम होगा तो साहित्य-सृजन भी प्रभावित होगा।
ब्राह्मी लिपि का उदाहरण हमारे सामने है। कभी भारतीय उपमहाद्वीप में उसका व्यापक प्रयोग था, लेकिन समय के साथ उसका प्रचलन समाप्त हो गया। आज ब्राह्मी के विशेषज्ञों की संख्या बहुत सीमित है। क्या भविष्य में देवनागरी की स्थिति भी ऐसी हो सकती है? क्या ऐसा समय आ सकता है जब हिंदी तो बोली जाएगी, लेकिन उसे देवनागरी के स्थान पर अंग्रेजी वर्णमाला में लिखने की आवश्यकता समझी जाएगी?
देवनागरी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह ध्वन्यात्मक और वैज्ञानिक लिपि है। सामान्यत: शब्द का जैसा उच्चारण किया जाता है, उसे उसी के अनुरूप लिखने की व्यवस्था इसमें है। ऐसी वैज्ञानिक लिपि का संरक्षण केवल हिंदी का प्रश्न नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत की रक्षा का प्रश्न है। विदेशी प्रभाव हमारे समाज पर शीघ्र पड़ता है। शक संवत् इसका एक उदाहरण है। सरकारी कैलेंडर और राजकीय प्रकाशनों में उसका प्रयोग दिखाई देता है, लेकिन सामान्य जीवन में उसकी लोकप्रियता बहुत सीमित है। हमें सावधान रहना होगा कि देवनागरी की स्थिति भी केवल औपचारिक प्रयोग तक सीमित न हो जाए। इस चुनौती का समाधान केवल सरकार के प्रयासों से संभव नहीं है। हिंदी के साहित्यकारों, लेखकों, शिक्षकों और प्रकाशकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। आवश्यकता ऐसे सरल, रोचक और मनोरंजक साहित्य की है जिसे सामान्य नागरिक और नई पीढ़ी रुचि से पढ़े। मोबाइल और आधुनिक तकनीक को हिंदी तथा देवनागरी के विरुद्ध नहीं, बल्कि उनके प्रसार का साधन बनाना होगा। हमें नई पीढ़ी को यह समझाना होगा कि अपनी भाषा और अपनी लिपि से प्रेम करना आधुनिकता के विरुद्ध नहीं है। आधुनिक तकनीक अपनाते हुए भी अपनी भाषाई पहचान को सुरक्षित रखा जा सकता है।
आज आवश्यकता हिंदी दिवस मनाने से अधिक हिन्दी को जीवन में अपनाने और देवनागरी को व्यवहार में बनाए रखने की है। यदि हमने समय रहते ध्यान नहीं दिया तो कहीं ऐसा न हो कि आने वाली पीढिय़ां हिंदी बोल तो सकें, लेकिन उसे देवनागरी में लिखने वाले लोगों को खोजने के लिए इतिहास के पन्ने पलटने पड़ें। देवनागरी का संरक्षण केवल एक लिपि का संरक्षण नहीं, बल्कि हमारी भाषा, संस्कृति और पहचान का संरक्षण है।