
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन, अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष, यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से जारी 'स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वल्र्ड-2026' रिपोर्ट हमारे सामाजिक व आर्थिक ढांचे को लेकर तीखे सवाल उठा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 52 करोड़ लोग संतुलित और पौष्टिक आहार से पूरी तरह वंचित हैं। यह संख्या भारत की कुल आबादी का करीब एक तिहाई है। ऐसे समय जब हम दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हो रहे हैं, यह रिपोर्ट देश की विकास प्रक्रिया पर चेतावनी है। यह स्थिति तब है जब सरकार 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को मुफ्त अनाज उपलब्ध करा रही है। इसमें शक नहीं कि मुफ्त या सस्ता अनाज उपलब्ध कराने के सरकारी प्रयासों ने भुखमरी के संकट को टालने में मदद की है, लेकिन क्या इसे ही संतोषजनक माना जा सकता है? संतुलित आहार के अभाव में देश की एक बड़ी आबादी समय पूर्व बूढ़ी हो रही है या पोषक तत्वों की कमी से होने वाली बीमारियों के जाल में फंसकर आर्थिक रूप से और बदहाल हो रही है।
इस रिपोर्ट को भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और राष्ट्रीय पोषण संस्थान द्वारा तैयार एक दूसरी रिपोर्ट के साथ पढ़ा जाए तो देश की आहार सुरक्षा के समक्ष उत्पन्न बड़े खतरे को समझने में आसानी होगी। इस रिपोर्ट के अनुसार, देश में जंक फूड की बिक्री 2009 से 2023 के बीच 150 फीसदी बढ़ गई है। जंक फूड कंपनियां खासतौर पर बच्चों को ध्यान में रखकर अपनी मार्केटिंग रणनीति बनाती हैं और स्कूल-कॉलेजों के आसपास अपने आउटलेट खोलती हैं। जंक फूड के कारण बच्चों में मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग तेजी से फैल रहे हैं। यह विडंबना ही कही जाएगी कि एक तरफ आर्थिक बदहाली की शिकार एक बड़ी आबादी इसलिए कुपोषण की शिकार है कि वह पौष्टिक भोजन का खर्च वहन नहीं कर सकती तो दूसरी बड़ी आबादी ऐसी भी है जो समृद्धि के कारण ऊल-जलूल कुछ भी खरीदकर खाते हुए कुपोषित हो रही है।
आर्थिक समृद्धि का पैमाना सिर्फ जीडीपी विकास दर या चमचमाते एक्सप्रेस-वे या ऊंची-ऊंची इमारतों को मानना भारी भूल है। सही मायने में स्वस्थ जीवन को ही विकास का पैमाना समझना चाहिए। अंतिम व्यक्ति की थाली तक पौष्टिक आहार पहुंचाकर ही हम खुशहाल देश की कल्पना कर सकते हैं। हालांकि, सरकार को दो दशकों में कुपोषण कम करने में 42 फीसदी सफलता मिली है। पिछले छह वर्षों में कुपोषण में 29 फीसदी कमी भी आई है। लेकिन यही काफी नहीं। अंतिम पायदान वाले परिवारों की आर्थिक सेहत सुधारने और शुरुआती पायदान वाले परिवारों के खानपान में अनुशासन और समझ लाकर ही हम देश का भविष्य सुरक्षित बना सकते हैं। इसके लिए नीति निर्माताओं को अपनी प्राथमिकताओं का क्रम बदलना होगा।