ओपिनियन

राष्ट्र को चाहिए कठिनाइयों में अडिग रहने वाली पीढ़ी

आज का विद्यार्थी ही कल का नागरिक है। वही आगे चलकर सैनिक, चिकित्सक, अभियंता, वैज्ञानिक, शिक्षक, प्रशासक, न्यायाधीश, उद्योगपति और जनप्रतिनिधि बनेगा। राष्ट्र की कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने और अपना दायित्व निभाने की क्षमता उसके भीतर विद्यार्थी जीवन में ही विकसित होनी चाहिए। अनुशासन पर भाषण देकर अनुशासित नागरिक तैयार नहीं किए जा सकते। अनुशासन एक जीवन-पद्धति है। उसे नियमित रूप से जीना पड़ता है।
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Aug 24, 2026
Youth

डॉ.एन.एम.सिंघवी, पूर्व अध्यक्ष, प्रशासनिक सुधार, मानव संसाधन विकास एवं जनशक्ति नियोजन समिति, राजस्थान

हम अपने बच्चों को किस प्रकार का नागरिक बनाना चाहते हैं- सुविधाओं में पला हुआ, हर कठिनाई से बचाया गया नागरिक या कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य पर अडिग रहने वाला नागरिक यह प्रश्न आज हमारी शिक्षा-व्यवस्था के सामने गंभीरता से खड़ा है। आज अनेक स्थानों पर मौसम थोड़ा प्रतिकूल हुआ नहीं कि विद्यालयों में छुट्टी की घोषणा कर दी जाती है। सर्दी अधिक हुई तो छुट्टी, गर्मी बढ़ी तो छुट्टी और वर्षा अधिक हुई तो छुट्टी। निश्चित रूप से अत्यधिक प्रतिकूल परिस्थितियों में बच्चों की सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन हमें यह भी विचार करना चाहिए कि क्या लगातार सुविधा और संरक्षण विद्यार्थी को जीवन की कठिन परिस्थितियों के लिए तैयार करते हैं? सीमा पर तैनात सैनिक के लिए मौसम कोई बहाना नहीं हो सकता। अत्यधिक ठंड हो, प्रचंड गर्मी हो या मूसलाधार वर्षा- राष्ट्र की रक्षा का कर्तव्य अपनी जगह रहता है। युद्ध की स्थिति में सैनिक यह नहीं कह सकता कि मौसम अनुकूल नहीं है, इसलिए आज वह मोर्चे पर नहीं जाएगा।
आज का विद्यार्थी ही कल का नागरिक है। वही आगे चलकर सैनिक, चिकित्सक, अभियंता, वैज्ञानिक, शिक्षक, प्रशासक, न्यायाधीश, उद्योगपति और जनप्रतिनिधि बनेगा। राष्ट्र की कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने और अपना दायित्व निभाने की क्षमता उसके भीतर विद्यार्थी जीवन में ही विकसित होनी चाहिए। अनुशासन पर भाषण देकर अनुशासित नागरिक तैयार नहीं किए जा सकते। अनुशासन एक जीवन-पद्धति है। उसे नियमित रूप से जीना पड़ता है। समय पर उठना, समय पर पहुंचना, निर्धारित वेशभूषा रखना, शारीरिक श्रम करना, वरिष्ठ के निर्देश का पालन करना, अपने साथियों के प्रति उत्तरदायी रहना, कठिनाई में धैर्य बनाए रखना और व्यक्तिगत सुविधा से ऊपर सामूहिक कर्तव्य को रखना- ये संस्कार लंबे समय के अभ्यास से विकसित होते हैं। इसलिए मेरा मानना है कि कुछ सप्ताह के प्रशिक्षण से वह गहरा अनुशासन उत्पन्न करना कठिन है, जो लंबे समय तक सैन्य वातावरण में रहने से विकसित हो सकता है। अनुशासन को केवल सिखाया नहीं जा सकता, उसे जीवन में उतारना पड़ता है।
मेरे विचार में माध्यमिक शिक्षा के बाद प्रत्येक युवक और युवती के लिए दो वर्ष का अनिवार्य राष्ट्रीय अनुशासन एवं सेवा प्रशिक्षण होना चाहिए। यह प्रशिक्षण भारतीय सेना के अनुशासन और प्रशिक्षण-पद्धति से प्रेरित हो तथा सेना के साथ रहकर कराया जाए। इसका उद्देश्य प्रत्येक विद्यार्थी को सैनिक बनाना नहीं होगा। उद्देश्य होगा- सैनिक जैसा अनुशासित, साहसी, उत्तरदायी और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक बनाना। इन दो वर्षों में विद्यार्थी को- शारीरिक प्रशिक्षण, योग और स्वास्थ्य, समयपालन, सामूहिक जीवन, नेतृत्व, प्राथमिक चिकित्सा, आपदा प्रबंधन, नागरिक सुरक्षा, कठिन परिस्थितियों में कार्य करना, स्वावलंबन, सामुदायिक सेवा, संविधान और नागरिक कर्तव्यों का ज्ञान दिया जा सकता है। सैन्य प्रशिक्षण का मूल उद्देश्य केवल युद्ध की तैयारी नहीं, बल्कि जीवन के लिए तैयार होना है। सैन्य अनुशासन व्यक्ति को केवल युद्ध के लिए तैयार नहीं करता। वह उसके व्यक्तित्व में समयपालन, आत्मसंयम, नेतृत्व, निर्णय क्षमता, कठिनाइयों से जूझने की शक्ति और उत्तरदायित्व की भावना पैदा कर सकता है।
भारत के औद्योगिक इतिहास में जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा (जेआरडी टाटा) इसका एक प्रेरक उदाहरण हैं। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के समय फ्रांसीसी सेना की विदेशी सेना इकाई में सेवा की और सैन्य जीवन का अनुभव प्राप्त किया। आगे चलकर वे भारत के महान उद्योगपतियों में गिने गए और टाटा समूह को नई ऊंचाइयों तक ले गए। जेआरडी टाटा का उदाहरण यह विचार रखने में सहायक है कि अनुशासन, साहस और कठिन परिस्थितियों में काम करने की क्षमता व्यक्ति के व्यावसायिक और सार्वजनिक जीवन में भी उपयोगी सिद्ध होती है। हमारे विद्यार्थियों को भी ऐसी ही जीवन-दृष्टि की आवश्यकता है- जहां सुविधा से अधिक कर्तव्य, अधिकार से अधिक उत्तरदायित्व और कठिनाई से भागने के बजाय उसका सामना करने का संस्कार विकसित हो। भारत की शिक्षा-व्यवस्था में सरकारी और निजी संस्थानों के बीच अनेक अंतर हैं। राष्ट्रीय अनुशासन के प्रश्न पर ऐसा अंतर नहीं होना चाहिए। चाहे विद्यार्थी सरकारी विद्यालय में पढ़ता हो या अत्यंत महंगे निजी विद्यालय में, सरकारी महाविद्यालय में हो या निजी विश्वविद्यालय में- राष्ट्र के प्रति उसका कर्तव्य समान है, इसलिए राष्ट्रीय अनुशासन का प्रशिक्षण भी समान होना चाहिए।
दो वर्ष का यह प्रशिक्षण शिक्षा से अलग कोई दंडात्मक व्यवस्था नहीं होना चाहिए। इसे उच्च शिक्षा की प्रक्रिया का ही एक अनिवार्य चरण बनाया जा सकता है। प्रशिक्षण के दौरान विद्यार्थी अपनी शैक्षणिक पढ़ाई भी जारी रखे और साथ-साथ राष्ट्रीय प्रशिक्षण प्राप्त करे।
बच्चे की सुरक्षा आवश्यक है। मगर सुरक्षा और अति-संरक्षण में अंतर है। हम यदि बच्चे को हर असुविधा से बचाते रहेंगे तो वह असुविधा का सामना करना कब सीखेगा? जीवन में हर दिन मौसम अनुकूल नहीं होगा। काम-धंधा और नौकरी हमेशा सुविधाजनक नहीं होगी। बीमारी, दुर्घटना, प्राकृतिक आपदा, आर्थिक संकट और राष्ट्रीय संकट किसी पूर्व सूचना के साथ नहीं आते। शिक्षा को विद्यार्थी को इन परिस्थितियों से भागना नहीं, उनका सामना करना सिखाना चाहिए।
हमें ऐसे युवा चाहिए जो कठिन परिस्थिति में घबराएं नहीं, जो संकट में दूसरों की सहायता करें, जो आदेश की प्रतीक्षा किए बिना अपनी जिम्मेदारी समझें और जो व्यक्तिगत सुविधा से ऊपर राष्ट्र तथा समाज के हित को रख सकें। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि सैन्य अनुशासन का अर्थ लोकतांत्रिक स्वतंत्रता समाप्त करना नहीं है। अनुशासन के साथ ही सुदृढ़ लोकतंत्र चल सकता है, अनुशासन के अभाव में स्वतंत्रता अराजकता का रूप ले सकती है। भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है। हमारे युवाओं को अनुशासन के साथ-साथ स्वतंत्र चिंतन, प्रश्न करने की क्षमता, संविधान का सम्मान, कानून का पालन और दूसरों के अधिकारों का सम्मान भी सिखाया जाना चाहिए। हमें आज्ञाकारी नागरिक भर नहीं, विवेकशील और अनुशासित नागरिक चाहिए। सैन्य प्रशिक्षण से हमें उसकी श्रेष्ठ व्यवस्थाएं लेनी चाहिए- समयपालन, शारीरिक क्षमता, उत्तरदायित्व, नेतृत्व, टीम भावना, कठिनाइयों का सामना और राष्ट्रसेवा की भावना और उन्हें लोकतांत्रिक नागरिक जीवन के अनुरूप विकसित करना चाहिए। जब सडक़ पर नागरिक यातायात नियमों का पालन करता है, कर्मचारी समय पर कार्यालय पहुंचता है, विद्यार्थी अपने कर्तव्य को गंभीरता से लेता है, अधिकारी बिना दबाव के नियमों के अनुसार निर्णय करता है और नागरिक संकट के समय एक-दूसरे की सहायता करते हैं- तभी राष्ट्रीय अनुशासन का निर्माण होता है। यह केवल शिक्षा की आवश्यकता नहीं, राष्ट्र-निर्माण की आवश्यकता है।

हमें कैसी पीढ़ी चाहिए?
आज हमें यह तय करना होगा कि हम आने वाली पीढ़ी को केवल डिग्रियां देना चाहते हैं या जीवन जीने की क्षमता भी। हमारे विश्वविद्यालयों से निकलने वाला युवा केवल रोजगार पाने वाला व्यक्ति न हो। वह समय का मूल्य समझे, अपने दायित्व को पहचाने, कठिनाइयों में धैर्य रखे, समाज के प्रति संवेदनशील हो और आवश्यकता पडऩे पर राष्ट्र के लिए अपना योगदान देने को तैयार रहे। इसलिए मेरा सुझाव है कि भारत में शिक्षा-व्यवस्था के साथ दो वर्ष का अनिवार्य राष्ट्रीय अनुशासन एवं सेवा प्रशिक्षण सेना के साथ जोडक़र कराया जाए। यह प्रशिक्षण किसी एक वर्ग, धर्म, क्षेत्र या आर्थिक स्थिति के युवाओं तक सीमित न हो। भारत का प्रत्येक विद्यार्थी—लडक़ा हो या लडक़ी, सरकारी संस्था में पढ़ता हो या निजी संस्था में इस राष्ट्रीय प्रशिक्षण का समान सहभागी बने। राष्ट्र के अधिकार सभी नागरिकों पर समान हैं, तो राष्ट्र के प्रति कर्तव्य भी समान होने चाहिए। अंतत: प्रश्न इतना ही है- क्या हम अपने बच्चों को जीवन की कठिनाइयों से बचाते रहना चाहते हैं या उन्हें इतना सक्षम बनाना चाहते हैं कि वे कठिनाइयों का सामना कर सकें? हमें संरक्षित बच्चे नहीं, सशक्त नागरिक चाहिए। सशक्त नागरिक केवल पुस्तकों से नहीं बनते। उन्हें अनुशासन, श्रम, कठिनाई, उत्तरदायित्व और सेवा के अनुभव से गढऩा पड़ता है।

Updated on:
24 Aug 2026 07:21 pm
Published on:
24 Aug 2026 07:21 pm