ओपिनियन

संपादकीय : प्रकृति को जीवित विरासत मानने की जरूरत

घना की सबसे बड़ी जीवनरेखा पांचना बांध से गंभीर नदी के माध्यम से मिलने वाला पानी रहा है। पिछले कई वर्षों से कभी पानी देर से पहुंचा, कभी पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंचा और इस वर्ष तो अब तक पानी पहुंचा ही नहीं। परिणामस्वरूप पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर संकट गहरा गया है। पक्षियों का आगमन प्रभावित हुआ है, जलीय जीवों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है और जैव विविधता पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है।
2 min read
Jul 30, 2026
Ghana Sanctuary

राजस्थान का केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान केवल एक अभयारण्य नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के संतुलित सह-अस्तित्व की जीवंत मिसाल है। यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल यह आर्द्रभूमि कभी हजारों प्रवासी पक्षियों की चहचहाहट से गूंजती थी। साइबेरिया से लेकर मध्य एशिया तक के दुर्लभ पक्षी हर वर्ष यहां जीवन का उत्सव मनाने आते हैं, लेकिन आज वही घना अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। जिन जलाशयों में कभी पक्षियों का कलरव सुनाई देता था, वहां अब कीचड़, मृत मछलियां और कछुए दिखाई दे रहे हैं। यह दृश्य हमारी पर्यावरणीय सोच की विफलता का आईना है।
घना की सबसे बड़ी जीवनरेखा पांचना बांध से गंभीर नदी के माध्यम से मिलने वाला पानी रहा है। पिछले कई वर्षों से कभी पानी देर से पहुंचा, कभी पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंचा और इस वर्ष तो अब तक पानी पहुंचा ही नहीं। परिणामस्वरूप पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर संकट गहरा गया है। पक्षियों का आगमन प्रभावित हुआ है, जलीय जीवों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है और जैव विविधता पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है। किसी विश्व धरोहर का इस स्थिति तक पहुंच जाना हमारी नीतिगत प्राथमिकताओं पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। विडंबना यह है कि देश के अनेक बांध, तालाब, झीलें और आर्द्रभूमियां भी इसी तरह दम तोड़ रही हैं। शहरों के विस्तार, अनियोजित विकास, अंधाधुंध खनन, अतिक्रमण और जल स्रोतों के अवैज्ञानिक दोहन ने प्राकृतिक जल चक्र को बुरी तरह प्रभावित किया है। विकास परियोजनाएं बनाते समय पर्यावरण को अक्सर बाधा समझा गया, जबकि पर्यावरण ही सतत विकास की सबसे मजबूत नींव है। पर्यटन भी इस विरोधाभास का हिस्सा बन गया है। प्रकृति संरक्षण के नाम पर पर्यटकों को आकर्षित करने की होड़ तो दिखाई देती है, लेकिन उन पारिस्थितिकी तंत्रों को जीवित बनाए रखने की गंभीरता नहीं दिखती, जिनके कारण पर्यटन संभव हो पाता है। यदि जलाशय सूख जाएंगे, पक्षियों का आगमन बंद हो जाएगा और जैव विविधता नष्ट हो जाएगी, तो विश्व धरोहर का दर्जा भी केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा। प्रकृति की सुंदरता को जीवित विरासत मानने की जरूरत है।
केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान का सूखना केवल भरतपुर की चिंता नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है। विरासत केवल स्मारकों से नहीं बनती, बल्कि नदियों, जंगलों, तालाबों और उनमें बसने वाले जीव-जंतुओं से भी बनती है। यदि हमने आज भी विकास के नाम पर प्रकृति का विनाश जारी रखा, तो आने वाली पीढिय़ों को किताबों में पक्षियों के नाम तो मिलेंगे, लेकिन उनके गीत सुनने का सौभाग्य नहीं मिलेगा। हमारी जिम्मेदारी केवल इस विरासत का उपयोग करने की नहीं, बल्कि इसे और समृद्ध स्वरूप में अगली पीढिय़ों को सौंपने की भी है।

Updated on:
30 Jul 2026 09:23 pm
Published on:
30 Jul 2026 09:23 pm