
सोनम लववंशी,(स्वतंत्र लेखिकाएवं शोधार्थी)
एक समय था, जब किसी भी शहर की पहचान हरे-भरे पेड़ों, तालाबों और खुले आसमान से होती थी। आज उसकी पहचान रात की चमक से होने लगी है। जितनी अधिक रोशनी, उतना विकसित शहर! बहुमंजिला इमारतों की जगमगाहट, पूरी रात जलते विज्ञापन बोर्ड, एलईडी से नहाई सड़कें और कभी न सोने वाले बाजार आधुनिक विकास की पहचान बन गए हैं। लेकिन इस चमक के पीछे एक कड़वा सच छिपा है, जिस पर हमारी विकास नीतियां लगभग मौन हैं। सवाल यह है कि क्या विकास की दौड़ में हमने प्रकृति से उसका अंधेरा ही छीन लिया है?
वायु प्रदूषण, जल संकट और प्लास्टिक कचरे पर चर्चा होती है, लेकिन प्रकाश प्रदूषण अब भी पर्यावरणीय विमर्श के हाशिए पर है। न्यू वल्र्ड एटलस ऑफ आर्टिफिशियल नाइट स्काई ब्राइटनेस के अनुसार दुनिया की 83 प्रतिशत आबादी ऐसे आकाश के नीचे रह रही है, जहां कृत्रिम रोशनी ने प्राकृतिक अंधेरे को ढक दिया है। यूरोप और अमरीका के लगभग 99 प्रतिशत लोग इससे प्रभावित हैं, जबकि दुनिया के एक-तिहाई से अधिक लोग अब अपनी आंखों से आकाशगंगा तक नहीं देख सकते। यह केवल तारों के ओझल होने की कहानी नहीं, बल्कि प्रकृति की जैविक लय के टूटने की गंभीर चेतावनी है।
भारत में प्रकाश प्रदूषण का संकट तेजी से बढ़ रहा है। उपग्रह अध्ययनों के अनुसार शहरी विस्तार, औद्योगिकीकरण और चौबीसों घंटे चलने वाली गतिविधियों के कारण रात्रिकालीन कृत्रिम रोशनी लगातार बढ़ रही है। विडंबना यह है कि वायु और जल प्रदूषण के लिए कानून हैं, लेकिन प्रकाश प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए अब तक कोई राष्ट्रीय नीति नहीं है। इसी कारण लद्दाख के हनले डार्क स्काई रिजर्व जैसे क्षेत्रों को प्राकृतिक रात्रि पर्यावरण और वैज्ञानिक अनुसंधान की सुरक्षा के लिए विशेष संरक्षण देना पड़ा है। कृत्रिम रोशनी का प्रभाव केवल खगोल विज्ञान तक सीमित नहीं है।
पतंगे, जुगनू, चमगादड़ और हजारों रात्रिचर जीव अंधेरे पर निर्भर रहते हैं। वर्ष 2025 के एक अध्ययन में स्ट्रीट लाइट और स्काईग्लो का पतंगों की संख्या तथा उनकी प्रजातीय विविधता पर नकारात्मक प्रभाव पाया गया। चूंकि अनेक पौधों का परागण रात में इन्हीं जीवों के माध्यम से होता है, इसलिए इसका असर जैव विविधता के साथ कृषि उत्पादन पर भी पड़ सकता है। विडंबना यह है कि उत्पादन बढ़ाने की कोशिश में हम उन्हीं प्राकृतिक परागणकर्ताओं के आवास नष्ट कर रहे हैं, जो सदियों से बिना किसी लागत के कृषि व्यवस्था का आधार रहे हैं। यह विडंबना है कि किसान की समृद्धि के नाम पर अपनाया जा रहा विकास मॉडल परोक्ष रूप से कृषि तंत्र को ही कमजोर कर रहा है। इस संकट का दूसरा महत्त्वपूर्ण आयाम मानव स्वास्थ्य है।
मानव शरीर दिन-रात के प्राकृतिक चक्र के अनुरूप विकसित हुआ है और रात का अंधेरा मेलाटोनिन हार्मोन के स्राव के लिए आवश्यक है, जो नींद, प्रतिरक्षा प्रणाली और जैविक घड़ी को नियंत्रित करता है। देर रात तक एलईडी स्क्रीन, सफेद स्ट्रीट लाइट और तीव्र कृत्रिम रोशनी इस प्रक्रिया में बाधा डालती हैं। एक ओर भारत ऊर्जा दक्षता, एलईडी कार्यक्रमों और कार्बन उत्सर्जन में कमी की बात करता है, वहीं दूसरी ओर पूरी रात जलते विज्ञापन बोर्ड, खाली इमारतों की सजावटी रोशनी इन प्रयासों पर प्रश्नचिह्न लगाती है। ऊर्जा संरक्षण का उद्देश्य आवश्यकता के अनुरूप ही रोशनी का उपयोग करना होना चाहिए। दुनिया के कई देशों ने डार्क स्काई मानकों को अपनाते हुए नीचे की ओर केंद्रित प्रकाश, कम रंग-तापमान वाले एलईडी, टाइमर आधारित लाइटिंग तथा अनावश्यक रोशनी पर नियंत्रण जैसे उपाय शुरू किए हैं। भारत में भी स्मार्ट सिटी मिशन को पर्यावरण-अनुकूल रात्रि शहरों की दिशा में आगे बढऩा होगा। वास्तविक समस्या रोशनी नहीं, उसकी अति है। हमने विकास की परिभाषा में चमक तो जोड़ दी, लेकिन अंधेरे का महत्त्व भुला दिया। सच यह है कि पृथ्वी का आधा जीवन रात में सांस लेता है। यदि शहरों की चकाचौंध तारों, जुगनुओं, पतंगों और शांत रात को निगल गई, तो हम केवल अंधेरा ही नहीं, बल्कि प्रकृति का वह संतुलन भी खो देंगे, जिसके सहारे मानव सभ्यता फलती-फूलती रही है।