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पेंटागन के अपनी प्रमुख कमांड से ‘इंडो’ हटाने के मायने

कमांड से 'इंडो' शब्द हटाना अमरीका की इसी रणनीति का हिस्सा है। तो क्या आने वाले समय में हिंद महासागर को लेकर अमरीका की प्राथमिकताएं पूरी तरह से बदलती हुई दिखाई देंगी।
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Jun 26, 2026
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डॉ. एन.के. सोमानी, (अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार)

अमरीका रक्षा विभाग पेंटागन ने अपनी सबसे बड़ी सैन्य कमांड यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड से 'इंडो' शब्द हटा दिया है। अब इस कमांड को यूएस पैसिफिक कमांड (यूएसपीएसीओएम) के नाम से जाना जाएगा। हालांकि अमरीका का कहना है कि नाम बदलने या इंडो शब्द हटा देने से इसकी प्राथमिकताओं और स्वतंत्र नौवहन को बनाए रखने के लक्ष्य में बदलाव नहीं आएगा। कमांड पहले की तरह ही अमरीकी पश्चिमी तट से लेकर भारत की पश्चिमी सीमा तक अपना कार्य करती रहेगी। यह बदलाव केवल कमांड के ऐतिहासिक गौरव और सात दशकों से चली आ रही पुरानी पहचान को वापस लाने के लिए किया गया है। लेकिन जिस तरह से नाम परिवर्तन का निर्णय राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान हुई द्विपक्षीय वार्ता से ठीक पहले किया गया है, उससे अमरीकी निर्णय पर सवाल उठ रहे हैं।

यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड को भारत-अमरीका के बीच बढ़ती साझेदारी का प्रतीक कहा जाता है। ऐसे में सवाल यह है कि पेंटागन अपनी प्रमुख कमांड से 'इंडो' शब्द हटाकर भारत को क्या संदेश देना चाहता है। अमरीका के इस कदम को क्वाड (भारत, अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ) के लिए भी खतरे की घंटी कहा जा रहा है। पिछले कुछ समय से चीन के प्रति अमरीका के तेवर तल्ख हुए हैं, खासतौर से डॉनल्ड ट्रंप के दोबारा व्हाइट हाउस में आने के बाद। चीन से बढ़ती प्रतिस्पर्धा और ताइवान मुद्दे के कारण ट्रंप प्रशासन की रणनीति प्रशांत क्षेत्र और दक्षिण चीन सागर की ओर शिफ्ट होती दिख रही है। कमांड से 'इंडो' शब्द हटाना अमरीका की इसी रणनीति का हिस्सा है। तो क्या आने वाले समय में हिंद महासागर को लेकर अमरीका की प्राथमिकताएं पूरी तरह से बदलती हुई दिखाई देंगी। कही ऐसा तो नहीं कि ईरान युद्ध के बाद देश के भीतर अमरीकी रणनीति के पुनर्विचार को लेकर जो बहस छिड़ी हुई है, उस पर पर्दा डालने के लिए कमांड के गौरवपूर्ण इतिहास की आड़ ली जा रही है। यूएस पैसिफिक कमांड संयुक्त राज्य अमरीका की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी एकीकृत लड़ाकू कमान है। इसकी स्थापना 1 जनवरी 1947 (द्वितीय विश्व युद्ध के बाद) को अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति हैरी टूमैन ने की थी। 1957 में 'फॉर ईस्ट कमांड' और बाद में 'अलास्का कमांड' का अतिरिक्त प्रभार पैसिफिक कमांड के पास आ जाने के कारण इसके कार्यक्षेत्र में अभूतपूर्व विस्तार हो गया।

कमांड का निगरानी तंत्र अमरीका के पश्चिमी तट से लेकर भारत की पश्चिमी सीमा तक और अंटार्कटिका से लेकर उत्तरी ध्रुव लगभग पृथ्वी के आधे हिस्से पर नजर रखता है। इसके अधिकार क्षेत्र में लगभग 3 लाख 75 हजार से अधिक सैन्य कर्मी और 100 से अधिक द्वीप आते है । कमान ने कोरियाई युद्ध और वियतनाम युद्ध सहित कई प्रमुख सैन्य अभियानों के साथ-साथ मानवीय अभियानों में भूमिका निभाई हैं। दिलचस्प बात यह है कि प्रशांत महासागर और हिंद महासागर के बीच बढ़ती कनेक्टिविटी और रणनीतिक संबंधों को दर्शाने के लिए राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने मई 2018 (पहला कार्यकाल) में इसका नाम बदलकर 'यूएस इंडो पैसिफिक कमांड' किया था। उस वक्त राजनीतिक गलियारों में इस बात की गूंज सुनाई देती थी कि एशिया में बीजिंग को काउंटर करने के लिए भारत अमरीकी रणनीति का अहम हिस्सा हो गया है। अब उन्हीं डॉनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में 'इंडो' शब्द हटाकर भारत के रणनीतिक कद को कम करने की कोशिश की जा रही है तो क्या भारत को लेकर ट्रंप की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। एशिया में चीन के खिलाफ जिस धुरी की परिकल्पना ट्रंप और उनके प्रशासन ने की थी उसमें भारत की जरूरत अब नहीं है?

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के भू-राजनीतिक प्रभाव को काउंटर करने के लिए जिस क्वाड को अमरीका रणनीतिक हथियार के तौर पर आगे बढ़ा रहा था क्या उसकी धार कुंद नहीं होगी? क्या इस निर्णय को ट्रंप के स्वभावानुसार सामान्य घटना के तौर लिया जाए या अमरीका की रक्षा प्राथमिकताओं को दर्शाने वाला एक बड़ा भू-राजनीतिक कदम माने? हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन अपनी सैन्य क्षमताओं, आर्थिक निवेश और रणनीतिक गठजोड़ों का तेजी से विस्तार कर रहा है। उसका उद्देश्य इस महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर अपनी पकड़ मजबूत कर अमरीका और भारत जैसे देशों के प्रभाव को सीमित करना है। ग्वादर (पाकिस्तान) व हंबनटोटा (श्रीलंका) चीनी प्रयासों की जीवंत मिसाल है, जहां वह दोहरे उपयोग वाले (सैनिक और व्यापारिक) बुनियादी ढांचे विकसित कर रहा है। सोलोमन द्वीप के साथ हुआ सुरक्षा समझौता इस कड़ी में अगला कदम है। कहा तो यह भी जा रहा है कि ट्रंप चीन के साथ रणनीतिक तनाव को कम कर कूटनीतिक संवाद बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इसके लिए वह ग्रुप-2 जैसी साझेदारी विकसित करना चाहते हैं। ग्रुप-2 की सैद्वांतिक सहमति के बाद दोनों देश इस बात पर सहमत हो गए हैं कि भविष्य में वह एक दूसरे के रास्ते में बाधा उपस्थित नहीं करेंगे। दोनों नेताओं के बीच यह सहमति पिछले महीने हुई जब ट्रंप बीजिंग दौरे पर गए थे।


इस कथा में अगर सत्यता का कोई अंश है तो यह भारत के लिए असहज करने वाली स्थिति होगी। अमरीका के साथ आने से चीन को भारत के खिलाफ कूटनीतिक बढ़त मिल सकती है। ऐसे में भारत को अपनी सीमाओं (एलएसी) पर अधिक सतर्कता बरतनी होगी। दूसरी ओर अमरीकी रीब्रांडिंग के बाद हिंद महासागार क्षेत्र की सुरक्षा का दायित्व भी भारत के कंधों पर आ जाएगा। जाहिर है आने वाले समय में हिंद महासागर में भारत की सुरक्षा चुनौतियां बढ़ेंगी। भारत इन चुनौतियों से कैसे निबटता है यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।

Published on:
26 Jun 2026 04:19 pm