अमरीका में चुनाव: प्रवासी भारतीयों की संख्या 2010 से 2020 तक एरिजोना में 74% व जॉर्जिया में 67% बढ़ी
वाशिंगटन डीसी से ‘पत्रिका’ के पाठकों के लिए
‘अमरीका बनाम अमरीका’ पुस्तक के लेखक द्रोण यादव का अमरीका के चुनावी परिदृश्य का विश्लेषण
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‘लैंड ऑफ इमिग्रेंट्स’ के रूप में ख्यात अमरीका की जनसंख्या में मूल अमरीकियों के अलावा अनेक देशों के मूल निवासी भी शामिल हैं। इनमें दक्षिण अमरीका से मेक्सिको, अफ्रीका, यूरोप, एशिया से चीन व भारत जैसे देशों से आए लोगों का एक बड़ा हिस्सा है। यह बात जगजाहिर है कि इन दिनों अमरीका की राजनीति में एक अहम चर्चा इन अन्य देशों से आ बसे अनेक प्रवासियों व शरणार्थियों के इर्द-गिर्द घूम रही है, जिसका एक बड़ा हिस्सा भारतीय मूल के लोग हैं। डॉनल्ड ट्रंप खुले मंच से कमला हैरिस और डेमोक्रेटिक पार्टी को इस संदर्भ में चुनौती भी देते रहे हैं कि वे चुनाव जीते तो ऐसी कानूनी प्रक्रिया लागू की जाएगी कि अन्य देशों से अमरीका आकर बसने की प्रवृत्ति पर लगाम कसी जा सके।
अमरीका में भारतीय मूल का समुदाय चीन के बाद सबसे बड़ा एशियाई अमरीकी समुदाय है जो अमरीकी जनसंख्या का करीब 1.35% हिस्सा है। आज अमरीका में भारतीय मूल के लोगों की जनसंख्या करीब 50 लाख है जिनमें से करीब 21 लाख वोटर हैं। मुख्य मंच से लेकर पर्दे के पीछे तक प्रवासी भारतीय किसी न किसी रूप में अमरीकी लोकतंत्र में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। कमला हैरिस के राष्ट्रपति प्रत्याशी बनने के बाद यह माना जा सकता है कि दास-प्रथा से लेकर आज तक अमरीका में चले मानवाधिकारों के अनेक आंदोलनों का नतीजा यह हुआ कि सर्वसमुदाय को अपनाने का अहम अध्याय शुरू हुआ। पर हालात हमेशा से ऐसे नहीं थे और यहां तक के सफर में भारतीय सहित अन्य दक्षिण-एशियाई लोगों को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था।
करीब 1900 से शुरू हुई भारतीयों के अमरीकी प्रवास की कहानी कई उतार-चढ़ाव से भरी है। आज अमरीका में बसे सभी दक्षिण एशियाई समुदायों में सबसे अधिक व प्रभावशाली भारतीय ही माने जाते हैं, पर शुरुआती दौर में वहां अपनी जगह बनाना इतना सरल नहीं था। 1907 में वाशिंगटन स्टेट में हुए बेलहिंगम दंगे इसका उदाहरण हैं जब करीब 500 श्वेत अमरीकियों ने भारतीय मूल के लोगों समेत 200 दक्षिण-एशियाई प्रवासियों को राज्य के बाहर खदेड़ दिया था। अमरीका में प्रताडि़त भारतीयों ने अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ी और 1913 में पैसिफिक कोस्ट हिंदुस्तान एसोसिएशन की स्थापना कर ‘गदर मूवमेंट’ चलाया। सरकार ने 1920 में और अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने 1923 में भारतीय मूल के लोगों को अमरीकी नागरिक बनने से रोका, पर 1946 में राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने ‘लूस-सेलर’ अधिनियम अमरीका में लागू किया जिसके तहत प्रवासी भारतीयों को अमरीका में नागरिकता हासिल करने का कानूनी अधिकार प्राप्त हुआ और 100 भारतीयों का प्रति वर्ष का कोटा भी तय किया गया। तब से लेकर अब तक अमरीका में भारतीय मूल के लोगों के सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव में बड़ा बदलाव आया है। पहला असर 1957 में दिखा जब दलीप सिंह सौंध अमरीका में चुनाव जीतने वाले पहले भारतीय मूल के जन-प्रतिनिधि बने। अमरीका में भारतीय वोटरों की और जन-प्रतिनिधियों की संख्या में तब से अब तक बढ़ोतरी होती गई है। आज अमरीकी संसद में भारतीय मूल के 5 जन-प्रतिनिधि हैं तो सभी राज्यों में करीब 40 जन-प्रतिनिधि हैं।
अमरीका की दोनों मुख्य पार्टियां निश्चित ही भारतीय-अमरीकी वोटों को अपनी नजर में रखना चाहती हैं। 2020 के राष्ट्रपति चुनाव से एक वर्ष पहले, 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ह्यूस्टन में ‘हाउडी मोदी’ आयोजन को संबोधित किया था जिसमें करीब 50,000 प्रवासी भारतीयों ने हिस्सा लिया था। विशेष बात यह है कि अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भी इस कार्यक्रम का हिस्सा बनना जरूरी समझा ताकि अमरीकी-भारतीय वोटों को लुभाया जा सके। उसी चुनाव में राष्ट्रपति जो बाइडन ने जब अपना उपराष्ट्रपति उम्मीदवार भारतीय मूल की कमला हैरिस को चुना तब यह माना गया कि इससे भारतीय-अमरीकी वोटरों को डेमोक्रेटिक पार्टी से बांधे रखना आसान होगा। मूलत: ये वोटर डेमोक्रेट ही रहे हैं, और इस बार कमला हैरिस डेमोक्रेट्स को वोट करने का बड़ा कारण हैं। प्रधानमंत्री मोदी के हाल ही के 3 दिवसीय दौरे के दौरान भी ये खबरें चली थीं कि पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप, मोदी से मिलेंगे, कहा गया कि प्रवासी भारतीयों में खुद के लिए समर्थन जुटाने के इरादे से यह ट्रंप का कैम्पेन था। इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि भारतीय-अमरीकियों का वोट निर्णायक भले ही न हो पर सहायक जरूर है। 2020 का चुनाव ट्रंप हार गए थे, और कुल 6 निर्णायक राज्यों में से तीन में (एरिजोना, जॉर्जिया, विस्कॉन्सिन) वोटों का अंतर बहुत ज्यादा नहीं था। एक सर्वे के मुताबिक, प्रवासी भारतीयों की संख्या में 2010 से 2020 तक एरिजोना में 74% व जॉर्जिया में 67% बढ़ोतरी हुई है। दोनों ही राज्यों में पिछले चुनाव में वोट का अंतर इतना कम रहा कि वर्ग विशेष का एकमुश्त मतदान बड़ा असर डाल सकता है।
2024 के चुनाव में भी भारतीय मूल के लोगों की भागीदारी इस बात से समझी जा सकती है कि वे अन्य समुदायों को प्रभावित करने की भी क्षमता रखते हैं। भारतीय प्रवासियों के एक हिस्से ने कमला हैरिस के पक्ष में ‘डेज इन एक्शन’ नामक एक कैम्पेन चलाया हुआ है जिसके तहत सभी स्विंग स्टेट्स (निर्णायक राज्यों) में डेमोक्रेट्स के पक्ष में कई आयोजन किए जाएंगे, जिसका मुख्य मकसद है दक्षिण-एशिया मूल के वोटरों को आकर्षित करना।