नीता टहलयानी, स्वतंत्र लेखिका
रूस के विरुद्ध यूक्रेन को दी गयी आर्थिक और सैन्य सहायता को अमरीका के अब "खनिज समझौते" के रूप में प्रस्ताव ने शांतिपूर्ण वार्ता को तनावपूर्ण स्थिति में रख दिया है। यूक्रेन के समक्ष रूस जैसी चुनौती है जिसका हल अमरीकी हथियार और आर्थिक सहायता के बिना संभव नहीं है। वहीं यूरोपीय देशों के भी यूक्रेन के पक्ष में खड़े रहना भी कही न कहीं आर्थिक और व्यापारिक स्वार्थनिहित है, ऐसे में यूक्रेन को अपने लगभग ध्वस्त हो चुके साम्राज्य को पुनर्स्थापित करने और विकसित करने के लिए मित्र देशों के साथ साथ "सुपर पावर" भी जरुरी है। व्हाइट हाउस में हुई अविश्वसनीय, अमर्यादित राजनयिक वार्ता ने यह तो साबित कर दिया कि अब अमरीका युद्ध विराम के बारे में बिना समझौते के विचार नहीं करेगा। स्वयं को सर्वेसर्वा घोषित कर चुके डॉनल्ड ट्रम्प का आक्रामक रवैया यूक्रेन की मुश्किलें बढ़ा सकता है।
अमरीकी राष्ट्रपति का नया स्वार्थपूर्ण राजनीतिक स्वरुप जब यूरोप के लिए भी चिंता का विषय हो सकती है तो यूक्रेन को स्वयं को विश्व मानचित्र में अपनी पहचान बनाए रखने के लिए एक बार फिर शांति और धैर्य से सोचना होगा और वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए युद्ध विराम के बारे में ध्यान केंद्रित करना होगा क्यूंकि युद्ध जैसी आपदा देश के वज़ूद को खतरे में डालती है। सब जानते हैं कि सशक्त सैन्य व्यवस्था, आधुनिकतम हथियार और उन्नत तकनीक अमरीका की ताकत है और यदि अमरीका युद्ध विराम में साथ नहीं देगा तो यूक्रेन का केवल यूरोपीय देशों के भरोसे स्वयं को सुरक्षित रख पाना मुश्किल है।महाशक्ति के रूप में डॉनल्ड ट्रम्प अब अपने प्रभाव को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए अपनी कूटनीति के सहारे यूक्रेन पर दबाव भी बना सकते हैं। यूक्रेन को लेकर अगला ट्रम्प कार्ड क्या होगा ये तो वक़्त ही बताएगा लेकिन व्हाइट हाउस में हुई निष्फल शांति वार्ता ने अमरीका की ओर से यूक्रेन को मिल रहे सहयोग और युद्ध विराम की आशापूर्ण स्थिति को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है।