कितनी ही विसंगतियां हमारे देश के संविधान में देखने में आती है, जिन्हें दूर किया जाना नितांत आवश्यक है। इनका बने रहना अंतत: हानिकारक होगा
भारत का संविधान लागू हुए 75 बरस से ज्यादा हो गए। हर बार गणतंत्र दिवस पर हम इसी संविधान की रक्षा का संकल्प भी लेते रहे हैं। लेकिन संविधान के प्रावधान किस रूप में लागू हो रहे हैं, हो भी रहे हैं या नहीं हो रहे, इसे देखने की पुख्ता व्यवस्था नहीं की गई। श्रद्धेय कुलिश जी ने देश के नाम और राष्ट्रीयता की पहचान पर सवाल उठाते हुए 38 साल पहले एक आलेख में यह भी कहा कि संंविधान के प्रावधान जिन त्रुटियों को दूर करने के लिए किए गए थे वे दूर होने के बजाय और बढ़ गईं। आलेख के प्रमुख अंश:
कहने को तो इस देश को आजादी के पहले हिन्दुस्तान कहा जाता था। सरकार के कई प्रतिष्ठानों के नाम भी हिन्दुस्तान के साथ ही जोड़कर रखा गया था। जैसे- हिन्दुस्तान कॉपर, हिन्दुस्तान जिंक, हिन्दुस्तान एरोनोटिकल आदि, परन्तु संविधान में जब देश का नाम रखा गया तो 'इंडिया देट इज भारत' कर दिया गया और हिन्दुस्तान को नामकरण के अभिषेक से वंचित कर दिया गया। इसी तरह देश के नाम के साथ उसके बहुसंख्यक समाज का भी उल्लेख किया जा सकता था परन्तु ऐसा नहीं किया गया और यह विसंगति बनी रह गई। इससे देश में राजनीतिक विसंगतियां भी पैदा होती गईं। इस तरह की कितनी ही विसंगतियां हमारे संविधान में देखने में आती है, जिन्हें दूर किया जाना नितांत आवश्यक है। इनका बने रहना अंतत: हानिकारक होगा। संविधान में जो मूलभूत कमी खटक रही है वह हमारी राष्ट्रीयता की पहचान की है। संविधान में इस देश के दो नाम रख दिए गए हैं। जिनमें एक नाम तो 'इंडिया' है। 'इंडिया' इस देश का मुख्य नाम है और वैकल्पिक रूप में इसके साथ 'भारत' का नाम भी जोड़ दिया गया है। 'इंडिया दैट इज भारत' इस देश का नाम है जो एक नाम न होकर जुड़वां नाम है। इसी नाम के साथ हमारी जातीयता या राष्ट्रीयता का संबंध भी जुड़ गया है। विदेश यात्रा में हमारे सामने व्यावहारिक रूप से यह प्रश्न प्रतिदिन उपस्थित होता है कि हम क्या हैं? एयर लाइन या होटल में प्रवेश करते समय हम जो फार्म भरते हैं उसमें राष्ट्रीयता के स्थान पर हम अपने आपको क्या लिखें- 'इंडियन' या भारतीय? संविधान की दृष्टि से तो हम दोनों लिख सकते हैं परन्तु यह तो साफ ही है कि हमारी राष्ट्रीयता के दो नाम हो गए हैं। इसमें भी भारत चूंकि वैकल्पिक नाम है, मुझे सोचना पड़ेगा कि मैं अपने आपको भारतीय न लिखकर इंडियन ही लिख दूं। मुझे सदैव खटका रहेगा कि यदि मैं अपने आपको भारतीय लिख भी दूं और कोई सिरफिरा अफसर या होटल प्रबंधक न माने तो एक बार तो संकट पैदा कर ही देगा। इसी तरह हमारी नागरिकता भी विवाद में पड़ सकती है।
हम भारत के नागरिक हैं या इंडिया के, यह भी स्पष्ट होना चाहिए। आश्चर्य की बात है कि हमारी कोई एक सुरक्षित पहचान नहीं है। हमारी एक राष्ट्रीयता हो, एक नागरिकता हो, हमारे देश का एक सुनिश्चित नाम हो, क्या यह भी विवाद का विषय है, परन्तु संविधान प्रदत्त विकृति के कारण हमें इस दो नाम वाली राष्ट्रीयता और दो नाम वाली नागरिकता का अभिशाप ढोना पड़ता है। संविधान में दो नामों का उल्लेख करते समय यह भी निश्चय नहीं किया गया कि यह जुड़वां नाम कब तक चलेगा? इसका अर्थ हुआ कि हमारी राष्ट्रीयता और पहचान कभी साफ नहीं हो पाएगी। हम सदा-सदा के लिए बिना पहचान के ही बने रहेंगे। एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब हम किसी पहचान के अभाव में इतिहास के पन्नों से ही निकाल दिए जाएं।
हमने संविधान की व्यवस्थाओं का पालन किस सीमा तक किया यह सामने है। हमने कोई व्यवस्था ऐसी नहीं की, जिससे संविधान के प्रावधानों को लागू करने की कार्यवाही की जा सके। हमने कभी ईमानदारी से आकलन भी नहीं किया कि संविधान के प्रावधानों के अनुसार देश में क्या प्रगति हुई? संविधान के प्रावधानों को हमने राजनीतिक मोहरा बनाया। इसके लिए एक-दो राजनीतिक दल ही दोषी नहीं हैं, बल्कि सभी दल समान भागीदार हैं। यथार्थ तो यह है कि जिन त्रुटियों को दूर करने के लिए प्रावधान किए गए थे वे दूर होने के बजाय बढ़ गईं। ( कुलिश जी के आलेखों पर आधारित पुस्तक 'दृष्टिकोण से' )
आजादी मिलियाँ तलक,
कहता हिन्दुस्तान।
हुयो पुराणूँ नाँव अब,
टाबर कोनै जाँण।।
('सात सैंकड़ा' से)