
अजीत रानाडे वरिष्ठ अर्थशास्त्री, (द बिलियन प्रेस)
हाल के छात्र आंदोलन को केवल परीक्षातंत्र की विफलता के खिलाफ एक विरोध मानना बड़ी भूल होगी। इस घटना ने देश के करोड़ों युवाओं की उस गहरी चिंता को उजागर किया है, जिसमें उन्हें लगता है कि प्रतियोगी परीक्षा में सफलता ही सम्मानजनक और सुरक्षित रोजगार पाने के बचे-खुचे रास्तों में से एक है। जब इस पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है, तो इसका अर्थ है कि रोजगार की लंबी प्रतीक्षा में उन्हें एक और वर्ष गंवाना पड़ेगा। इसलिए यह आंदोलन केवल परीक्षा के खिलाफ नहीं, बल्कि रोजगार के संकट के खिलाफ भी था।
आज सरकारी प्रतियोगी परीक्षाएं लाखों स्नातकों के लिए विशाल प्रतीक्षालय बन गई हैं। २०-२२ वर्ष की उम्र के युवा उन परीक्षाओं के लिए प्रयासरत हैं, जिनमें सफलता की दर मुश्किल से एक या दो प्रतिशत होती है। व्यक्तिगत स्तर पर उनकी यह प्रतीक्षा इसलिए जायज है कि निजी क्षेत्र में शुरुआती वेतन बेहद कम हैं। जबकि सरकारी नौकरी में बेहतर वेतन, नौकरी की स्थिरता और सामाजिक प्रतिष्ठा है। लेकिन स्नातकों की हर वर्ष निकलने वाली लाखों की भीड़ में पक्की नौकरियां पाने वालों की संख्या बहुत कम है। परिणामस्वरूप लाखों युवा या तो अपनी योग्यता से कमतर काम कर रहे हैं, अथवा सरकारी नौकरी की अंतहीन प्रतीक्षा में बैठे हैं। 'पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे' के अनुसार 2025 में देश की कुल बेरोजगारी दर 3.1 प्रतिशत थी और युवाओं में यह 9.9 प्रतिशत थी। लेकिन सर्वेक्षण की 'यूजुअल स्टेटस' की ढीली परिभाषा के कारण वर्ष में केवल 30 दिन भी कोई आर्थिक गतिविधि करने वाला सांख्यिकीय गणना में रोजगारशुदा मान लिया जाता है। इसलिए, रोजगार की बहस को अल्पकालिक रोजगार, छिपी हुई बेरोजगारी, अनियमित घंटे, कम मजदूरी, अनुबंधों का अभाव और सामाजिक सुरक्षा के अभाव जैसे वास्तविक संकटों पर केंद्रित होना चाहिए।
कृषि क्षेत्र मानव संसाधन के कम उपयोग का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। कई दशकों की गिरावट के बाद कृषि में रोजगार का हिस्सा 2017-18 के 44.1 प्रतिशत से बढ़ कर 2023-24 में 46.1 प्रतिशत हो गया। कृषि देश के कुल उत्पादन में लगभग छठे हिस्से का योगदान करती है, लेकिन इसमें 40 प्रतिशत से अधिक कार्यबल खपता है। मजदूरी की तस्वीर और भी चिंताजनक है। 2025 में पुरुष दिहाड़ी श्रमिकों की औसत दैनिक मजदूरी 455 रुपए जबकि महिलाओं की दैनिक मजदूरी 315 रुपए थी। गिग वर्क का विस्तार इसी रोजगार संकट की पृष्ठभूमि में हुआ है। एक अध्ययन के अनुसार, प्लेटफॉर्म से जुड़े कई श्रमिक पारंपरिक घरेलू काम की तुलना में बेहतर आय तो पाते हैं, लेकिन उन्हें छुट्टी पर प्रतिबंध, लंबे कार्य घंटे और ऐप के जरिए लगातार निगरानी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यह सच है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म ग्राहकों और श्रमिकों को जोडऩे, नई सेवाएं विकसित करने और श्रम बाजार में पारदर्शिता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए गिग अर्थव्यवस्था को रोकना समाधान नहीं है। लेकिन जब प्लेटफॉर्म ही काम का मिलना, भुगतान, रेटिंग दंड और श्रमिक की कार्य निरंतरता नियंत्रित करता है, तो श्रमिक को केवल 'पार्टनर' कह देने से उसकी जिम्मेदारियां समाप्त नहीं हो जातीं।
अब रोजगार की असुरक्षा आइटी क्षेत्र में भी पहुंच गई है। सामान्य कोडिंग, परीक्षण और बैक-ऑफिस का काम करने वालों पर छंटनी की तलवार लटक रही है, वहीं एआइ के विशेषज्ञ इंजीनियरों तथा शोधकर्ताओं को शानदार मौके और वेतन मिल रहे हैं। श्रम बाजार में उभरती यह गहरी असमानता इस बात का संकेत है कि भविष्य में रोजगार का परिदृश्य बदलने वाला है। भारत को ऐसे भविष्य के लिए तैयार होना चाहिए जहां काम तो बहुत होगा, लेकिन पारंपरिक नौकरियां कम होंगी। उनकी जगह अल्पकालिक अनुबंध, प्रोजेक्ट-आधारित कार्य और गिग इकोनॉमी लेंगे। इससे उद्यमिता को तो बढ़ावा मिलेगा, लेकिन यदि उचित कानूनी और नीतिगत ढांचा नहीं बनाया गया तो यह लचीलापन श्रमिकों के लिए असुरक्षा में बदल सकता है। इसलिए भारत को दो समानांतर लक्ष्य साधने होंगे- गिग अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना और श्रमिकों को सुरक्षित माहौल देना।
सामाजिक सुरक्षा लाभ आसानी से स्थानांतरण योग्य हों। प्लेटफॉर्म अपने भुगतान, रेटिंग, काम का आवंटन और किसी श्रमिक को हटाने के निर्णय के आधार स्पष्ट करें। श्रमिकों को शिकायत निवारण की सरल व्यवस्था, समय पर भुगतान और मनमाने ढंग से काम से हटाने से सुरक्षा मिलनी चाहिए। कानून को वास्तविक लचीलेपन को बनाए रखते हुए यह भी सुनिश्चित करना होगा कि 'पार्टनर' जैसे शब्दों के पीछे नियोक्ता जिम्मेदारियों से न बच निकलें।
इसी संदर्भ में गिग श्रमिकों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के पहले बाध्यकारी समझौते (कन्वेंशन 193) के मतदान से भारत का दूर रहना चिंताजनक है। यह इसलिए चिंता पैदा करता है क्योंकि भारत में गिग कार्यबल तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन सरकार उसकी कानूनी स्थिति से जुड़े वैश्विक मानकों को स्वीकार करने से हिचकती दिखाई देती है। निस्संदेह भारत को अधिक रोजगार की आवश्यकता है, लेकिन श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ ही तकनीकी प्रगति और लचीली कार्यप्रणाली को प्रोत्साहित करने की भी जरूरत है।