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जलवायु परिवर्तन से संकट में खेती, खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देने का समय

यदि 2040 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है तो फसलों की पैदावार गंभीर रूप से प्रभावित होगी और 2050 तक 8 करोड़ से अधिक लोगों पर भूख का खतरा मंडरा सकता है। इसलिए इन चेतावनियों को भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की गंभीर चुनौती मानकर समय रहते कदम उठाने होंगे।
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Jul 13, 2026
Farmer

रवि शंकर, स्वतंत्र पत्रकार
पूरी दुनिया आज ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना कर रही है। इसके पीछे मानव गतिविधियां प्रमुख कारण मानी जाती हैं, लेकिन अब तक कोई प्रभावी समाधान नहीं मिल पाया है। भारत में भी मौसम का असंतुलन साफ दिखाई दे रहा है। असमय गर्मी, अनियमित बारिश और मानसून की बदलती चाल कृषि पर गंभीर असर डाल रही है, जो देश की खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ने चेतावनी दी है कि बढ़ते तापमान, सूखा, बाढ़ और मिट्टी की घटती उर्वरता से मध्य पूर्व के कई देशों में कृषि को भारी नुकसान हो सकता है। वहीं, आइपीसीसी की जून 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, यदि 2040 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है तो फसलों की पैदावार गंभीर रूप से प्रभावित होगी और 2050 तक 8 करोड़ से अधिक लोगों पर भूख का खतरा मंडरा सकता है। इसलिए इन चेतावनियों को भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की गंभीर चुनौती मानकर समय रहते कदम उठाने होंगे। कृषि की उत्पादकता उपजाऊ मिट्टी, पर्याप्त जल, अनुकूल तापमान, वर्षा, आद्र्रता और कीटों से सुरक्षा पर निर्भर करती है। इनमें से किसी भी कारक में बदलाव होने पर फसलों की पैदावार प्रभावित होती है। बढ़ती आबादी के साथ खाद्यान्न की मांग बढ़ेगी, लेकिन जलवायु परिवर्तन इस चुनौती को और कठिन बना रहा है। इसलिए कृषि नीति को फसल उत्पादकता बढ़ाने और किसानों के लिए सुरक्षा तंत्र विकसित करने पर ध्यान देना होगा।

पृथ्वी का तापमान 3.7 से 4.8 डिग्री तक बढ़ सकता है
वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार इस सदी के अंत तक पृथ्वी का तापमान 3.7 से 4.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। इसका सीधा असर खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ेगा। गेहूं, जौ, सरसों और आलू जैसी ठंडे मौसम की फसलें प्रभावित होंगी, जबकि अधिक तापमान के कारण मक्का, धान और ज्वार में दाना बनने की प्रक्रिया कमजोर पड़ सकती है। तापमान वृद्धि से वर्षा में कमी, मिट्टी की नमी घटने, भूमि के अपक्षय और गंभीर सूखे की आशंका भी बढ़ती है। साथ ही, बढ़ता तापमान मिट्टी में प्राकृतिक नाइट्रोजन की उपलब्धता कम कर रहा है, जिससे रासायनिक उर्वरकों का अधिक उपयोग बढ़ रहा है और मिट्टी की उर्वरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। आज पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का सामना कर रहा है। जलवायु परिवर्तन जोखिम सूचकांक में भारत शीर्ष 20 देशों में शामिल है। पिछले चार दशकों में देश का औसत तापमान 0.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है, जिससे बाढ़, सूखा और तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाएं बढ़ी हैं। इसका सबसे अधिक असर छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ रहा है, जिनकी आय लगातार प्रभावित हो रही है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन के अनुरूप कृषि पद्धतियों, फसल सुरक्षा और किसानों को उचित लाभ देने वाली नीतियों को प्राथमिकता देना आवश्यक है, ताकि उनका खेती से मोहभंग न हो।

संकट किसी एक देश तक सीमित नहीं
चूंकि यह संकट किसी एक देश तक सीमित नहीं है, इसलिए इससे निपटने के लिए वैश्विक और स्थानीय स्तर पर ठोस कदम उठाना जरूरी है। स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन केवल कृषि ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव सभ्यता के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है।  विकास की दौड़ में यह नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया की बड़ी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है। यदि प्रकृति के साथ लगातार छेड़छाड़ जारी रही तो कृषि पर दबाव बढ़ेगा और 2030 तक भूख समाप्त करने का लक्ष्य अधूरा रह सकता है। भारत में पिछले 40 वर्षों से वर्षा में गिरावट दर्ज की गई है। बीसवीं सदी की शुरुआत में औसत वर्षा 141 सेंटीमीटर थी, जो 1990 के दशक में घटकर 119 सेंटीमीटर रह गई। गंगोत्री ग्लेशियर सिकुड़ रहा है, नदियों में जल घट रहा है और पानी की कमी से खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है। यह भारत के लिए अधिक गंभीर है, क्योंकि 70 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। जलवायु परिवर्तन आजीविका, जल आपूर्ति, मानव स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा सभी के लिए खतरा बन चुका है। 2050 तक वैश्विक आबादी 9.5 अरब से अधिक होने का अनुमान है, जिसके लिए 70 प्रतिशत अधिक खाद्यान्न उत्पादन की आवश्यकता होगी। इसलिए कृषि और खाद्य प्रणाली को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल, अधिक लचीला और टिकाऊ बनाना होगा। छोटे और सीमांत किसानों की आय की सुरक्षा के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन पर प्रभावी नियंत्रण के लिए तत्काल वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर ठोस कदम उठाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

Updated on:
13 Jul 2026 05:00 pm
Published on:
13 Jul 2026 04:56 pm