
डॉ.सुरेश कुमार पांडेय, (वरिष्ठ चिकित्सकएवं लेखक)
हर वर्ष पहली जुलाई को भारत एक ऐसे महानायक के सामने नतमस्तक होता है, जिसने सिद्ध किया कि चिकित्सक होना केवल पेशा नहीं, बल्कि एक तपस्या है। यह दिन भारत रत्न डॉ. बिधान चंद्र रॉय की पावन स्मृति को समर्पित है। वर्ष 1882 में पटना में जन्मे डॉ. रॉय असाधारण प्रतिभा के धनी थे। अस्सी वर्ष की आयु में भी वह सक्रिय थे। अपनी मृत्यु के दिन भी उन्होंने सुबह रोगियों को देखा और शांति से संसार से विदा ली। यही उनका सच्चा परिचय है, अंतिम सांस तक मानवता की निस्वार्थ सेवा।
इस वर्ष, 1 जुलाई 2026 को मनाए जा रहे राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस की थीम है, बिहाइंड द मास्क, केयरिंग फॉर केयरगिवर्स, यानी 'मुखौटे के पीछे:देखभाल करने वालों की देखभाल'। यह विषय हमारे समाज के सामने एक बेहद गहरा प्रश्न रखता है, जो चिकित्सक दिन-रात हम सबकी देखभाल करते हैं, उनकी देखभाल आखिर कौन करता है? इस प्रश्न में चिकित्सा जगत की अनकही पीड़ा, तनाव और मौन संघर्ष छिपा है। हम एक चिकित्सक को हमेशा सफेद कोट में, आत्मविश्वास से लबरेज और विपरीत परिस्थिति में स्थिर खड़े देखने के आदी हैं। हमें भ्रम हो जाता है कि वे कभी थकते नहीं, टूटते नहीं और एकांत में रोते नहीं। लेकिन सत्य यह है कि वह असीम दृढ़ता केवल एक पेशेवर मुखौटा है, जिसे रोगी को आश्वस्त करने के लिए पहना जाता है। उस मुखौटे के ठीक पीछे एक थका हुआ, नींद से वंचित और कई बार भीतर ही भीतर संघर्ष करता हुआ एक इंसान खड़ा है।
एक नेत्र शल्य चिकित्सक के रूप में जब आप किसी दृष्टिहीन व्यक्ति की आंखों में रोशनी लौटाते हैं, तो वह अद्भुत क्षण दुनिया के किसी भी पुरस्कार से बड़ा प्रतीत होता है। पर इस आनंद की भारी व्यक्तिगत कीमत चुकानी पड़ती है। एक चिकित्सक रोगियों की पीड़ा को भीतर समेट लेता है लेकिन अपनी पीड़ा किससे कहे? वैश्विक सर्वेक्षणों में भी चिकित्सक सबसे भरोसेमंद पेशेवरों में शीर्ष पर हैं। परंतु कड़वा सच यह है कि समय के साथ यह पवित्र भरोसा कमजोर हो रहा है। दुर्घटना, गंभीर रोग में जान न बच पाने, शत-प्रतिशत परिणाम न आने या संवाद की कमी के कारण मरीजों और चिकित्सकों के बीच गहरी खाई पैदा हो रही है। इसी अविश्वास ने अस्पतालों में हिंसक घटनाओं को बढ़ाया है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अनुसार लगभग 75 प्रतिशत चिकित्सक कार्यस्थल पर हिंसा या दुव्र्यवहार का सामना कर चुके हैं। चिकित्सा पेशे के अन्य आंकड़े और भी हृदय विदारक हैं। भारत में चिकित्सकों की औसत आयु सामान्य जनसंख्या की तुलना में लगभग दस वर्ष कम है। अध्ययन बताते हैं कि देश के 82.7 प्रतिशत चिकित्सक निरंतर भयंकर तनाव में जीते हैं।
सरकारी अस्पतालों के आपातकालीन वार्डों में रेजिडेंट चिकित्सक बिना पर्याप्त नींद लिए, महज चाय-बिस्किट के सहारे 24 से 48 घंटे की निर्बाध ड्यूटी करते हैं। इतने कम समय में किसी अनजान की जटिल पीड़ा समझना चमत्कार है। इस अमानवीय कार्यभार का परिणाम है, बढ़ता बर्नआउट, अवसाद और चिकित्सकों में आत्महत्या की बढ़ती दर। महिला चिकित्सकों की स्थिति और असुरक्षित है। 9 अगस्त 2024 को कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में युवा महिला रेजिडेंट डॉक्टर के साथ हुई वीभत्स घटना ने देश को झकझोर दिया। 40 प्रतिशत महिला चिकित्सक असुरक्षा के कारण कॅरियर के पहले छह वर्षों में पेशा छोड़ देती हैं। इन अनगिनत चुनौतियों के बावजूद भारत ने चिकित्सा क्षेत्र में असाधारण प्रगति की है।
आज हमारा देश मेडिकल टूरिज्म के वैश्विक गंतव्यों में थाईलैंड के साथ शीर्ष पर है। उन्नत तकनीकों ने चिकित्सा को नई ऊंचाइयां दी हैं लेकिन इस चमकती तस्वीर के पीछे हमारे चिकित्सकों का अथक त्याग है। सबसे बड़ी आवश्यकता है कि देश अपनी जीडीपी का जो 3.8 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च करता है, उसे बढ़ाकर 8 से 10 प्रतिशत किया जाए। स्थायी समाधान तभी निकलेगा जब समाज स्वीकार करेगा कि चिकित्सक कोई चमत्कारी भगवान नहीं, बल्कि हाड़ मांस का मनुष्य है। उसे भी पर्याप्त विश्राम और उपचार का पूर्ण अधिकार है। सुरक्षित कार्यस्थल, पारदर्शी व्यवस्था और मानसिक स्वास्थ्य सुविधाएं अनिवार्य हैं। इस राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस पर आइए, उस सफेद मुखौटे के पीछे छिपे इंसान के दर्द को समझें।
डॉ. बिधान चंद्र रॉय को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम अविश्वास की दीवारों को गिराकर विश्वास, करुणा और सम्मान का रिश्ता गढ़ें। स्वस्थ समाज का निर्माण तभी संभव है, जब हम अपने देखभाल करने वालों की देखभाल करेंगे।