यदि हम चाहते हैं कि भारतीय संस्थान वैश्विक स्तर के बनें, तो हमें केवल शोध पत्रों की संख्या नहीं, बल्कि समाज और उद्योग पर उनके प्रभाव को मापना होगा। तकनीकी और सामाजिक विज्ञान के संस्थानों के लिए अलग-अलग मूल्यांकन मानक होने चाहिए। क्लासरूम टीचिंग को रैंकिंग में अधिक वेटेज देना होगा।
भारतीय शिक्षा जगत में अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। एक ओर हम वैश्विक मानकों को छूने का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था 'शॉर्टकट' और 'नंबर गेम' के जाल में फंसती जा रही है। राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआइआरएफ) और वैश्विक रैंकिंग्स का भारतीय विश्वविद्यालयों पर प्रभाव आज बिल्कुल वैसा ही है, जैसा संयुक्त प्रवेश परीक्षा इंजीनियरिंग और राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा मेडिकल के लिए भारत की प्रमुख प्रवेश परीक्षाएं हैं; परीक्षाओं का छात्रों पर असर होता है।
जिस तरह कोचिंग संस्थानों में छात्र इस बात से बेखबर होते हैं कि वे विषय को गहराई से समझ रहे हैं या नहीं, उनका पूरा ध्यान केवल रैंक लाने पर होता है। ठीक यही स्थिति आज हमारे विश्वविद्यालयों की है। कई निजी और सरकारी विश्वविद्यालय अब पढ़ाई की गुणवत्ता सुधारने के बजाय अपना 'धारणा स्कोर' एनआइआरएफ बढ़ाने के लिए करोड़ों रुपए विज्ञापनों और पीआर एजेंसियों पर खर्च कर रहे हैं।
रैंकिंग का सबसे बड़ा पैमाना 'अनुसंधान' और 'प्रकाशन' है। इसका परिणाम यह हुआ है कि भारतीय विश्वविद्यालयों में शोध की 'बाढ़' आ गई है, लेकिन उसकी 'प्रासंगिकता' गायब है। 'पब्लिश या पेरिश' की नीति को ध्यान में रखते हुए यूजीसी की 'केयर सूची' और प्रमोशन के लिए अनिवार्य रिसर्च पेपर की नीतियों ने प्रोफेसरों को 'डेटा जनरेटर' बना दिया है। प्रेडेटरी जर्नल्स का जाल: रैंकिंग सुधारने के दबाव में कई शोधकर्ता ऐसे जर्नल्स में पैसे देकर पेपर छपवाते हैं, जिनकी कोई वैज्ञानिक साख नहीं होती।
आइआइटी और आइआइएससी जैसे शीर्ष संस्थान भी वैश्विक रैंकिंग में इसलिए पिछड़ जाते हैं क्योंकि उनके शोध का 'साइटेशन' स्कोर तो अच्छा होता है, लेकिन 'इंटरनेशनल आउटलुक' और 'पेटेंट कमर्शियलाइजेशन' में वे पीछे रह जाते हैं। यह कोचिंग के उस छात्र जैसा है जो थ्योरी तो रट लेता है, लेकिन लैब में जाकर प्रयोग करने से डरता है। सरकार की इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस योजना का उद्देश्य भारतीय संस्थानों को दुनिया के टॉप-100 में लाना था, लेकिन इस दौड़ में संस्थानों ने अपनी मौलिक पहचान खोनी शुरू कर दी है।
जब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय या बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जैसे मानविकी प्रधान विश्वविद्यालयों को भी उन्हीं पैमानों पर तौला जाता है जिन पर आइआइटी को, तो एक असंतुलन पैदा होता है। मानविकी के विषयों में शोध की प्रकृति विज्ञान से अलग होती है, लेकिन रैंकिंग सिस्टम 'एक ही लाठी से सबको हांकने' जैसा काम कर रहा है। चॉइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम नीति कागजों पर तो बहुत अच्छी है, लेकिन कोचिंग संस्थानों की तरह यहां भी छात्र केवल उन्हीं 'सॉफ्ट' विषयों को चुनते हैं जिनमें स्कोर करना आसान हो, न कि वे जिनमें उन्हें गहरी रुचि हो। रैंकिंग की दौड़ में 'शिक्षण' सबसे अधिक उपेक्षित हुआ है।
एक प्रोफेसर का मूल्यांकन अब इस आधार पर नहीं होता कि उसने छात्रों को कितना प्रेरित किया, बल्कि इस आधार पर होता है कि उसके नाम पर कितने एच सूचकांक हैं। विशिष्ट स्थिति यह है कि कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में एडहॉक शिक्षकों की संख्या बढ़ती जा रही है। संस्थान स्थायी नियुक्तियों के बजाय डेटा मैनेज करने में व्यस्त हैं। जब शिक्षक ही असुरक्षित और डेटा-केंद्रित होगा, तो वह छात्र को 'आउट-ऑफ-द-बॉक्स' सोचने की प्रेरणा कैसे दे पाएगा? जब कोई निजी विश्वविद्यालय राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग ढांचे में टॉप-50 में आता है, तो वह तुरंत अपनी फीस में भारी बढ़ोतरी कर देता है।
विश्वविद्यालयों के लिए रैंकिंग अब एक 'बिजनेस टूल' बन गई है। संस्थान उन छात्रों को प्रवेश देने में ज्यादा रुचि रखते हैं जो उनके 'प्लेसमेंट डेटा' को बेहतर बना सकें। रैंकिंग के मापदंडों में अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय सहयोग/साझेदारी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इसे पूरा करने के लिए विश्वविद्यालय अब एक शॉर्टकट अपना रहे हैं। विश्वविद्यालय अन्य राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ बड़ी संख्या में समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर तो करते हैं, लेकिन इनमें से 80-90% केवल फाइलों तक सीमित रहते हैं। न तो छात्रों का आदान-प्रदान होता है और न ही संयुक्त शोध।
विश्वविद्यालय केवल 'लोगो' इस्तेमाल करने और रैंकिंग फॉर्म में संख्या भरने के लिए ये समझौते करते हैं। कई बार ये एमओयू केवल प्रशासनिक अधिकारियों के विदेशी दौरों का माध्यम बन जाते हैं, जिनका जमीनी स्तर पर छात्रों की शिक्षा से कोई संबंध नहीं होता। जब तक हमारा ध्यान 'रैंक' और 'नंबरों' पर रहेगा, हम डिग्रियां तो बांटेंगे, लेकिन 'अन्वेषक' पैदा नहीं कर पाएंगे। एनआइआरएफ और अन्य रैंकिंग प्रणालियों ने अनजाने में भारतीय शिक्षा व्यवस्था को एक 'विशाल फैक्ट्री' में तब्दील कर दिया है।
यदि हम चाहते हैं कि भारतीय संस्थान वैश्विक स्तर के बनें, तो हमें केवल शोध पत्रों की संख्या नहीं, बल्कि समाज और उद्योग पर उनके प्रभाव को मापना होगा। तकनीकी और सामाजिक विज्ञान के संस्थानों के लिए अलग-अलग मूल्यांकन मानक होने चाहिए। क्लासरूम टीचिंग को रैंकिंग में ज्यादा वेटेज देनी होगी, ताकि शिक्षक-छात्र का संबंध पुनस्र्थापित हो सके।