
डॉ. ब्रजेश कुमार तिवारी
लेखक, जेएनयू के अटल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में प्रोफेसर हैं
25 जून 2015 को भारत सरकार ने स्मार्ट सिटीज मिशन की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य 100 शहरों को टिकाऊ, नागरिक अनुकूल, तकनीक आधारित और बेहतर जीवन गुणवत्ता वाले शहरी केंद्रों के रूप में विकसित करना था। सरकार के अनुसार इस मिशन का लक्ष्य नागरिकों को कुशल सेवाएं, मजबूत आधारभूत संरचना और टिकाऊ समाधान उपलब्ध कराना था, ताकि ये शहर अन्य शहरों के लिए आदर्श बन सकें। एक दशक बाद जब भारत अपने शहरों को वैश्विक स्तर पर देखने की कोशिश करता है, तो इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (ईआइयू) की ग्लोबल लिवेबिलिटी इंडेक्स 2026 एक गंभीर सवाल खड़ा करती है। यदि स्मार्ट सिटी मिशन का मूल उद्देश्य जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाना था, तो फिर भारत के प्रमुख महानगर दुनिया के रहने योग्य शीर्ष 100 शहरों में भी क्यों नहीं हैं?
ईआइयू की ताजा सूची में नई दिल्ली 120वें और मुंबई 121वें स्थान पर हैं। चेन्नई 123वें और बेंगलूरु 127वें स्थान पर हैं। यानी देश की राजधानी, आर्थिक राजधानी, औद्योगिक शहर और तकनीकी केंद्र, चारों ही वैश्विक शीर्ष 100 से बाहर हैं। दूसरी ओर कोपेनहेगन ने लगातार दूसरे वर्ष दुनिया के सबसे रहने योग्य शहर का स्थान बनाए रखा है, जबकि वियना, ज्यूरिख, मेलबर्न, जिनेवा, सिडनी, ओसाका, ऑकलैंड, एडिलेड और टोक्यो जैसे शहर शीर्ष 10 में हैं। यह रैंकिंग केवल प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है, यह भारत के शहरी विकास मॉडल की बुनियादी कमजोरी को सामने लाती है।
ईआइयू का लिवेबिलिटी इंडेक्स 173 शहरों को स्थिरता, स्वास्थ्य सेवा, संस्कृति और पर्यावरण, शिक्षा तथा आधारभूत संरचना जैसे मानकों पर परखता है। इसलिए रहने योग्य शहर का अर्थ केवल चौड़ी सडक़ें, मेट्रो, फ्लाईओवर, ऊंची इमारतें या डिजिटल सेवाएं नहीं है। रहने योग्य शहर वह है जहां नागरिक सुरक्षित महसूस करे, हवा सांस लेने योग्य हो, सार्वजनिक परिवहन भरोसेमंद हो, अस्पताल और स्कूल सुलभ हों, हरित क्षेत्र बचा हो और शासन नागरिकों के प्रति जवाबदेह हो। भारत के शहरों ने आर्थिक गतिविधि तो पैदा की है, लेकिन जीवन की गुणवत्ता में संतुलित सुधार नहीं ला सके।
दिल्ली का मामला सबसे चिंताजनक
दिल्ली और मुंबई की कम रैंकिंग हमें यह सोचने के लिए बाध्य करती है कि क्या भारत में शहरीकरण का अर्थ केवल आबादी, वाहन, निर्माण, रियल एस्टेट और उपभोग का विस्तार बन गया है। दिल्ली देश की राजधानी है और मुंबई आर्थिक राजधानी। दोनों शहर भारत की आकांक्षा, रोजगार और अवसरों के प्रतीक हैं। फिर भी इन शहरों में आम नागरिक का दैनिक जीवन जाम, प्रदूषण, महंगे आवास, असमान सार्वजनिक सेवाओं और बढ़ते मानसिक तनाव से घिरा हुआ है। यदि शहर रोजगार देता है लेकिन स्वास्थ्य छीन लेता है, तो वह विकास का पूर्ण मॉडल नहीं हो सकता।
दिल्ली का मामला सबसे अधिक चिंताजनक है। हर साल सर्दियों में प्रदूषण पर तीखी बहस होती है, लेकिन मौसम बदलते ही नीति का दबाव भी कम हो जाता है। दिल्ली की समस्या केवल धुएं की नहीं, बल्कि शहरी संरचना, शासन और क्षेत्रीय समन्वय की समस्या है। दिल्ली की हवा पर दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार, नगर निकायों, पड़ोसी राज्यों, परिवहन नीति, निर्माण गतिविधियों, ऊर्जा उपयोग और कृषि अवशेष प्रबंधन, सभी का प्रभाव पड़ता है। जब जिम्मेदारी इतनी बंटी हुई हो, तो जवाबदेही अक्सर कमजोर हो जाती है। यही कारण है कि संकट हर साल लौटता है और समाधान स्थायी नहीं बन पाता।
समस्याएं अलग लेकिन मूल चुनौती एक ही
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि स्मार्ट शहर की कल्पना कई बार तकनीक तक सीमित हो गई। जबकि शहर की वास्तविक स्मार्टनेस इस बात से तय होनी चाहिए कि एक बच्चा सुरक्षित स्कूल जा सकता है या नहीं, एक बुजुर्ग पार्क में सांस ले सकता है या नहीं, एक महिला रात में सुरक्षित यात्रा कर सकती है या नहीं, और एक गरीब परिवार बिना निजी कार और निजी अस्पताल के भी सम्मानजनक जीवन जी सकता है या नहीं।
कोपेनहेगन जैसे शहरों से भारत को यह समझना चाहिए कि रहने योग्य शहर दशकों की निरंतर नीति से बनते हैं। वहां पैदल यात्री, साइकिल चालक, सार्वजनिक परिवहन, हरित क्षेत्र और नागरिक अनुशासन शहरी जीवन के केंद्र में हैं। इसके विपरीत भारतीय शहरों में कार आधारित विकास, अनियोजित निर्माण, सडक़ किनारे अतिक्रमण और कमजोर फुटपाथ आम नागरिक की जिंदगी को कठिन बना देते हैं। यदि किसी शहर में पैदल चलना ही असुरक्षित हो, तो वह आधुनिक हो सकता है, लेकिन नागरिक अनुकूल नहीं कहा जा सकता।
दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और बेंगलूरु के सामने अलग अलग समस्याएं हैं, लेकिन मूल चुनौती एक ही है। दिल्ली में प्रदूषण और शासन समन्वय बड़ी समस्या है। मुंबई में अत्यधिक घनत्व, महंगा आवास और बुनियादी ढांचे पर दबाव है। चेन्नई में जल प्रबंधन और जलवायु जोखिम गंभीर मुद्दे हैं। बेंगलूरु में यातायात, झीलों का क्षरण और अनियोजित विस्तार जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। इन शहरों को केवल अधिक निवेश की नहीं, बल्कि बेहतर नियोजन, पारदर्शी शासन और नागरिक केंद्रित दृष्टि की जरूरत है।
बनाएं लिवेबल सिटी की राष्ट्रीय नीति
भारत को अब स्मार्ट सिटी से आगे बढक़र लिवेबल सिटी की राष्ट्रीय नीति बनानी चाहिए। पहला सुधार सार्वजनिक परिवहन में होना चाहिए। बस, मेट्रो, लोकल ट्रेन, साइकिल ट्रैक और पैदल मार्ग को एकीकृत किया जाए। दूसरा, निर्माण धूल, सडक़ धूल और कचरा जलाने पर वास्तविक निगरानी हो। तीसरा, शहरों में वार्ड स्तर पर हवा, पानी, कचरा, यातायात और हरित क्षेत्र से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं। चौथा, शहरी नियोजन में जल निकायों, पेड़ों और खुले स्थानों को विकास के रास्ते की बाधा नहीं, बल्कि जीवन रक्षा की आधारभूत संरचना माना जाए। पांचवां, छोटे और मध्यम शहरों को शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और सेवा क्षेत्र के नए केंद्र बनाकर महानगरों पर दबाव कम किया जाए।
भारत ने स्मार्ट सिटीज मिशन के माध्यम से शहरी सुधार की महत्त्वाकांक्षा दिखाई थी। अब आवश्यकता है कि इस महत्त्वाकांक्षा को नागरिकों के जीवन में वास्तविक सुधार में बदला जाए। यदि शहर में डिजिटल बोर्ड तो हैं लेकिन साफ हवा नहीं, यदि कमांड सेंटर है लेकिन सडक़ पर पैदल चलने की जगह नहीं, यदि मेट्रो है लेकिन अंतिम मील संपर्क कमजोर है, तो विकास अधूरा है। भारत को चमकदार शहर नहीं, रहने योग्य शहर चाहिए।
दिल्ली और मुंबई का 120वें और 121वें स्थान पर होना निराशा का कारण अवश्य है, लेकिन इसे अवसर की तरह देखना चाहिए। यह रैंकिंग हमें बताती है कि भारत को अपने शहरों की सफलता का मापदंड बदलना होगा। शहरों को केवल जीडीपी, रियल एस्टेट मूल्य या वाहन संख्या से नहीं, बल्कि हवा की गुणवत्ता, यात्रा समय, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सुरक्षा, हरित क्षेत्र और नागरिक संतोष से मापा जाना चाहिए। विकसित भारत 2047 का सपना तभी सार्थक होगा जब भारत के शहर केवल आर्थिक इंजन नहीं, बल्कि स्वस्थ, सुरक्षित, समावेशी और रहने योग्य जीवन स्थल बनेंगे।