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डॉ. ऋतु सारस्वत, (समाजशास्त्री और स्तंभकार)
हाल ही दिल्ली उच्च न्यायालय ने विक्रम कुमार झा उर्फ आर्यन आद्विक बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली) एवं अन्य मामले में एक महत्त्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित करते हुए दहेज प्रताडऩा, दुष्कर्म, यौन उत्पीडऩ तथा अन्य धाराओं में दर्ज एफआइआर से संबंधित ट्रायल की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी। इस याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायालय ने वैवाहिक विवादों में उभर रही चिंताजनक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा, 'हाल के वर्षों में, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य के निर्णय के बाद, जिसमें धारा 498 ए और 406 के मामलों में गिरफ्तारी संबंधी प्रावधानों के दुरुपयोग पर अंकुश लगाया गया था, एक ऐसी प्रवृत्ति उभरती दिखाई दे रही है, जिसमें शिकायतकर्ता वैवाहिक विवादों में ससुराल पक्ष के लोगों पर दुष्कर्म, छेड़छाड़ तथा अन्य प्रकार के यौन दुराचार के गंभीर आरोप लगाने लगे हैं, जिससे उन्हें भारी धनराशि देकर समझौता करने के लिए विवश किया जा सके।'
दिल्ली उच्च न्यायालय की यह टिप्पणी स्पष्ट संकेत देती है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों के संभावित दुरुपयोग की प्रवृत्ति अब नए आयाम ग्रहण करती दिखाई दे रही है। अब तक सर्वोच्च न्यायालय तथा देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों की चिंता मुख्यत: वैवाहिक एवं पारिवारिक विवादों में दहेज प्रताडऩा संबंधी प्रावधानों के दुरुपयोग पर केंद्रित रही है। विशेष रूप से पति के परिवार के सदस्यों को, उनकी भूमिका से संबंधित विशिष्ट आरोपों के अभाव में भी, अभियुक्त बनाए जाने की प्रवृत्ति पर न्यायालय समय-समय पर गंभीर चिंता व्यक्त करते रहे हैं। बीते दिनों 'दारा लक्ष्मी नारायण बनाम तेलंगाना राज्य' मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा, 'भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए का उद्देश्य पति अथवा उसके परिवार द्वारा महिला के साथ की जाने वाली क्रूरता से उसकी रक्षा करना और ऐसे मामलों में राज्य के त्वरित हस्तक्षेप को सुनिश्चित करना था। किंतु पिछले कुछ वर्षों में वैवाहिक विवादों में वृद्धि के साथ-साथ ऐसी स्थिति भी देखने को मिली है, जिसमें पति एवं उसके परिजनों के विरुद्ध व्यक्तिगत प्रतिशोध की भावना से इस प्रावधान का दुरुपयोग किया जा रहा है। सामान्य एवं अस्पष्ट आरोपों के आधार पर पूरे परिवार को आपराधिक मुकदमे में घसीटना कानून की मंशा के अनुरूप नहीं है।' महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून, जैसे धारा 498ए, गंभीर सामाजिक जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाए गए थे। लेकिन कई मामलों में इनके दुरुपयोग की घटनाओं ने न्यायिक प्रक्रिया के साथ-साथ समाज और परिवारों पर भी व्यापक नकारात्मक प्रभाव डाला है।
ऐसे मामलों में आरोपों का प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ता है और उसकी सामाजिक, मानसिक तथा भावनात्मक कीमत सभी को चुकानी पड़ती है। गंभीर आरोपों की स्थिति में न्यायालय का मुकदमा तो बाद में चलता है, समाज का मुकदमा पहले शुरू हो जाता है। अनेक बार न्यायालय साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देता है, जबकि समाज अपनी धारणाओं के आधार पर। यहां एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उभरकर सामने आता है कि क्या न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय ही अंतिम निर्णय होता है? क्या न्यायालय द्वारा निर्दोष सिद्ध किए जाने के बाद भी समाज द्वारा निर्मित धारणाएं सहजता से परिवर्तित हो जाती हैं?
समाजशास्त्री एर्विंग गोफमैन ने अपनी पुस्तक 'स्टिग्मा: नोट्स ऑन द मैनेजमेंट ऑफ स्पॉयल्ड आइडेंटिटी' में सामाजिक कलंक की अवधारणा का विश्लेषण करते हुए बताया है कि जब किसी व्यक्ति की सामाजिक पहचान कलंकित हो जाती है, तब समाज उसके प्रति अपने व्यवहार में परिवर्तन कर देता है। व्यक्ति की पहचान उसके व्यक्तित्व से अधिक उस पर लगे कलंक के आधार पर देखी जाने लगती है। यही कारण है कि न्यायालय द्वारा निर्दोष सिद्ध किए जाने के बाद भी सामाजिक कलंक सहजता से समाप्त नहीं होता। परिणामस्वरूप अनेक बार न्यायालय से प्राप्त निर्दोषता भी व्यक्ति तथा उसके परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा पर लगे आघात की पूर्ण भरपाई नहीं कर पाती। गोफमैन की इस अवधारणा की पुष्टि मनोविज्ञान के क्षेत्र में भी होती है। समांथा के. ब्रूक्स और नील ग्रीनबर्ग द्वारा प्रकाशित शोध समीक्षा 'साइकोलॉजिकल इम्पैक्ट ऑफ बीइंग रॉन्गफुली अक्यूज्ड ऑफ क्रिमिनल ऑफेंसेज: ए सिस्टेमैटिक लिटरेचर रिव्यू' में कहा गया है कि झूठे आपराधिक आरोपों का मानसिक प्रभाव अत्यंत गहरा और दीर्घकालिक हो सकता है। इस अध्ययन में उद्धृत अनेक शोधों ने ऐसे अनुभवों की तुलना युद्ध से लौटे सैनिकों, शरणार्थियों, प्राकृतिक आपदाओं से बचे लोगों तथा युद्धबंदियों द्वारा अनुभव किए गए मानसिक आघात से की है।
यह निष्कर्ष स्पष्ट करता है कि झूठे आरोप केवल एक कानूनी विवाद नहीं होते, बल्कि वे व्यक्ति और उसके परिवार के मानसिक, सामाजिक तथा पारिवारिक जीवन पर भी गहरा प्रभाव छोड़ सकते हैं।निस्संदेह, महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों की आवश्यकता और उनकी उपयोगिता पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। किंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि इन कानूनों की विश्वसनीयता और नैतिक शक्ति अक्षुण्ण बनी रहे। किसी निर्दोष को सामाजिक और कानूनी उत्पीडऩ का सामना करना पड़े, यह न्याय का उद्देश्य कभी नहीं हो सकता। उसी प्रकार किसी वास्तविक पीडि़ता को न्याय से वंचित करना भी समान रूप से अन्याय है। आवश्यकता ऐसे संतुलित दृष्टिकोण की है, जहां कानून न केवल पीडि़त की रक्षा करे, बल्कि निर्दोष व्यक्ति की गरिमा, प्रतिष्ठा और उसके परिवार के सम्मान की भी समान रूप से रक्षा कर सके।
Updated on:
17 Jul 2026 04:38 pm
Published on:
17 Jul 2026 04:38 pm
