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डॉ. प्रभात ओझा, (वरिष्ठ पत्रकारएवं स्तंभकार)
वेनेजुएला पर हमला और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर अपने यहां मुकदमा शुरू करने के बाद अमरीका ने वहां के तेल व्यवसाय को खुद के तरीके से चलाना शुरू कर दिया। ईरान में भी वह ऐसा ही चाहता है। इजराइल के साथ मिलकर ईरान से सीधी लड़ाई में वह सफल नहीं हो पा रहा, तो होर्मुज में उसकी घेरेबंदी का तरीका अख्तियार कर रहा है। यह तरीका व्यावसायिक है। राष्ट्रपति ट्रंप ने होर्मुज से गुजरने वाले तेलवाहक जहाजों से 20 फीसद टैरिफ वसूलने का फैसला किया था। फिर 24 घंटे के अंदर ही इस फैसले को रद्द करने के नाम पर खाड़ी देशों से एक डील पक्की कर ली।
होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से कर वसूली का अमरीकी फैसला अजीब तरह का था। अमरीका पहले हवाला दे रहा था कि अंतराष्ट्रीय कानूनों के मुताबिक यह जलडमरूमध्य पूरी तरह सभी देशों के लिए खुला रहना चाहिए। जो राष्ट्रपति ट्रंप हाल के महीनों में तक कम से कम पांच बार होर्मुज के बिना बाधा खोलने की वकालत करते सुने गए, इस क्षेत्र से गुजरने वालों से वसूली का एलान कर बैठे।
सच यह है कि ट्रंप ने यह नया कदम इसलिए उठाया कि देश में उनकी अपनी हालत ठीक नहीं है। ईरान से शांति समझौते के बावजूद ट्रंप को इसका क्रेडिट नहीं मिला। और तो और, युद्ध के कारण आर्थिकी पर भी असर हुआ। अमरीका का अपना खुद का आयल रिजर्व 1983 के बाद से सबसे निचले स्तर पर आ गया। ट्रंप अपने ही देश में घिरते नजर आ रहे हैं। इस बार उन्हें कुछ निर्णायक हासिल करते दिखना पड़ेगा। आतंकी संगठनों को कथित समर्थन और परमाणु हथियारों के लिए संवर्धित यूरेनियम रखने वाले ईरान को राष्ट्रपति ट्रंप अभी तक डिगा नहीं पाए हैं। अब किसी तरह देश में धन लाना ही ट्रंप के सम्मान की रक्षा कर सकेगा। टैरिफ के डर से होर्मुज के रास्ते तेल आपूर्ति करने वाले देश अमरीका के दबाव में आए हैं। वे अमरीका में भारी निवेश करने जा रहे हैं।
अमरीकी नाकेबंदी और तेल ढोने वाले जहाजों से वसूली की अमरीकी घोषणा पर ईरान के टॉप मिलिट्री हेडक्वार्टर खात्म अल अंबिया ने कहा था कि वह होर्मुज के प्रबंधन में अमरीकी दखल को कामयाब नहीं होने देगा। ऐसे में अमरीका की यह रणनीति हो सकती है कि वह पूर्ण युद्ध की जगह ईरान पर छिटपुट हमले कर उसे उलझाए रखे। ऐसा कर वह होर्मुज पर ईरानी प्रभुत्व को चोट पहुंचा सकेगा। इस स्थिति में खुद ईरान के तेल व्यापार के भविष्य पर विपरीत असर होगा। होर्मुज से होकर सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इराक, कुवैत और कतर जैसे देशों का भी तेल और प्राकृतिक गैस इसी रास्ते एशिया में प्रमुख रूप से भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया तक पहुंचता है। राष्ट्रपति ट्रंप खाड़ी देशों से सदैव कूटनीतिक करीबी रखना चाहते हैं। इसी कूटनीति से रणनीतिक दबाव बनाकर उन्होंने इन देशों को अपने यहां निवेश के लिए मजबूर किया है।
इस बीच अमरीका के उस दूसरे कदम पर भी दुनिया की नजरें होंगी, जिसके तहत उसने रूस से तेल खरीदने वालों से 500 फीसद तक टोल वसूलने का कानून लाने की योजना बनाई थी। यह अलग बात है कि अमरीकी सीनेट में एक द्विदलीय बिल के जरिए रूस के पांच बड़े तेल निर्यातकों पर यह 100 प्रतिशत ही करने का प्रस्ताव किया गया है। इन देशों में भारत भी है। बिल पास होने पर अमरीका को भेजे जाने वाले टेक्सटाइल, ज्वेलरी और इंजीनियरिंग जैसे सामान काफी महंगे होने से हमारे व्यापार पर विपरीत असर होगा। राष्ट्रपति ट्रंप को इसमें छूट देने का अधिकार है। ट्रंप व्यापार के मामले में दुविधा नहीं रखते। वे अभी होर्मुज से आवाजाही करने वालों पर टैक्स से ही मुकरे हैं, प्रस्तावित सैंक्शनिंग रशिया एक्ट पर अमल का इरादा उन्होंने नहीं छोड़ा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य अभी चर्चा के केंद्र में रहेगा। युद्ध में क्षति की भरपाई का हवाला देकर ईरान होर्मुज से गुजरने वाले तेल भरे जहाजों पर पहले से ही टोल लगा रहा है। इसे रोकने के लिए अमरीका ने घेराबंदी कर रखी है। दोनों हमले-दर-हमले कर रहे हैं। जहाजों पर हमलों में भारतीय नाविकों की भी जान गई है। अशांति के इस नए दौर में दुनिया की सांसें अटकी हुई हैं। अभी तो महंगाई के ही खतरे हैं। भविष्य में ना जाने और क्या हो!
Updated on:
17 Jul 2026 04:43 pm
Published on:
17 Jul 2026 04:43 pm
