
पद्मविभूषण डॉ. तीजनबाई की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने उनके नाम पर राज्य अलंकरण पुरस्कार देने का ऐलान किया है, जोकि पंडवानी के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले कलाकार को दिया जाएगा। साथ ही तीजनबाई के पैतृक गांव गनियारी को कलाग्राम के रूप में विकसित किया जाएगा।
पंडवानी की महान साधिका स्व. तीजनबाई को सरकार द्वारा दी गई इस 'श्रद्धांजलि' से कलाजगत और हम छत्तीसगढिय़ा लोगों की पीड़ा थोड़ी-सी कम जरूर हुई है, लेकिन अभी भी सभी मर्माहत हैं... सभी के दिलों में एक टीस है..। टीस इस बात की है कि इस महान कला साधिका के निधन पर 5 जुलाई को राजकीय शोक घोषित न हो सका। हालांकि राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार हुआ। पर, सभी को यह उम्मीद थी कि भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से अलंकृत तीजनबाई के निधन पर देश में नहीं, तो कम-से-कम उनके अपने प्रदेश में राजकीय शोक घोषित किया जाएगा।
राजकीय शोक एक तरह का सम्मान होता है मृतात्मा का। यह वर्तमान या पूर्व राज्यपाल, वर्तमान या पूर्व मुख्यमंत्री या राज्य के किसी अत्यंत विशिष्ट व्यक्ति-हस्ती और राष्ट्रीय नेताओं के निधन पर दिया जाता है। ऐसे अवसरों पर राज्य में आधिकारिक अवकाश और पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शामिल हो सकती है। तो क्या देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार से अलंकृत छत्तीसगढ़ की अबतक की एकमात्र हस्ती तीजनबाई इस 'सम्मान' की हकदार नहीं थीं? पद्मविभूषण तीजनबाई की ख्याति देशों की सीमाओं से परे विदेशों में भी थी। उनकी कला साधना, योगदान और उन्होंने जो देश-विदेश में भारत को कीर्ति दिलाई, उसे किसी भी तरह से दूसरी महान हस्तियों की तुलना में किसी भी रूप में कम नहीं माना जा सकता है।
आखिर छत्तीसगढ़ राज्य का गठन क्यों किया गया था, जब यहां कि धरोहरों को हम पहचान और सम्मान नहीं दे पा रहे? क्या अविभाजित मध्यप्रदेश में तब के छत्तीसगढ़ अंचल से विधायक-सांसद-मंत्री-मुख्यमंत्री नहीं हुए थे? क्या तब सड़कें-स्कूल-कॉलेज-अस्पताल नहीं थे? यह सभी था। कुछ कम-ज्यादा या कमीबेशी थी। हमें अलग राज्य इसलिए चाहिए था कि हमारी संस्कृति, हमारी भाषा-बोली, हमारी धरोहरों, हमारे आचार-विचारों को वह सम्मान मिले, जिसका सपना हमारे पुरखों खूबचंद बघेल, पं. सुंदरलाल शर्मा, पं. वामनराव लाखे आदि-आदि ने देखा था।
खैर, जो हुआ सो हुआ। अब सरकार को यह पहल दिलोजान से करनी चाहिए कि भारत की अनमोल रतन स्व. तीजनबाईभारतरत्न से अलंकृत हो। साथ ही तीजनबाई ने जिस संस्थान भिलाई स्टील प्लांट में नौकरी की, अगर हो सके तो उसका नामकरण 'तीजन स्टील प्लांट' कराने का भी प्रयास किया जाना चाहिए। यही उस महान कला साधिका को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।-अनुपम राजीव राजवैद्य anupam.rajiv@in.patrika.com
संबंधित विषय:
Updated on:
17 Jul 2026, 2:05 AM IST
Published on:
17 Jul 2026, 2:05 AM IST
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.