
जुलाई का पहला सप्ताह वन महोत्सव के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 1950 में तत्कालीन कृषि एवं खाद्य मंत्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की पहल पर आरंभ हुआ यह अभियान केवल पेड़ लगाने का कार्यक्रम नहीं था। इसके पीछे यह विचार था कि वन संरक्षण को सरकारी दायित्व तक सीमित न रखकर जनभागीदारी का विषय बनाया जाए। सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इस अभियान की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। बल्कि जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और घटते भूजल स्तर ने इसकी आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ा दी है। किंतु हर वर्ष करोड़ों पौधे लगाने के दावों के बीच यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इन अभियानों से वास्तव में कितना स्थायी परिवर्तन आया है। भारतीय वन सर्वेक्षण की ‘इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट-2023’ के अनुसार देश का कुल ‘वन एवं वृक्ष आवरण’ 8,27,357 वर्ग किलोमीटर, अर्थात भौगोलिक क्षेत्रफल का 25.17 प्रतिशत है। इसमें 7,15,343 वर्ग किलोमीटर (21.76 प्रतिशत) वन क्षेत्र तथा 1,12,014 वर्ग किलोमीटर (3.41 प्रतिशत) वृक्ष आवरण शामिल है।
यह स्थिति उत्साहजनक अवश्य है, परंतु इन आंकड़ों को सतही दृष्टि से देखने के बजाय उनके भीतर छिपे संकेतों को समझना अधिक आवश्यक है। कई क्षेत्रों में वृक्षों की संख्या बढ़ी है, लेकिन प्राकृतिक वनों पर दबाव भी बना हुआ है। विशेषकर पूर्वोत्तर भारत के कुछ राज्यों में वनावरण में कमी दर्ज की गई है, जबकि मध्य भारत के कई वनक्षेत्र खनन, सडक़ निर्माण और अन्य विकास परियोजनाओं के दबाव का सामना कर रहे हैं। इसलिए केवल हरित क्षेत्र बढऩा पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्राकृतिक वनों का सुरक्षित रहना अधिक आवश्यक है।
पौधे लगाना नहीं, बचाना बड़ी चुनौती
वास्तविक चुनौती पौधरोपण नहीं, वृक्षों का संरक्षण है। प्रत्येक वर्ष राज्यों द्वारा करोड़ों पौधे लगाए जाते हैं। उत्तर प्रदेश ने भी हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर पौधरोपण अभियान चलाए हैं। किंतु अनेक स्वतंत्र अध्ययनों और सरकारी समीक्षा बैठकों में यह स्वीकार किया गया है कि पौधों के जीवित रहने की दर हर स्थान पर संतोषजनक नहीं रहती। कई स्थानों पर पौधे रोप दिए जाते हैं, लेकिन सिंचाई, सुरक्षा और नियमित देखरेख के अभाव में कुछ ही महीनों में वे नष्ट हो जाते हैं। यदि एक पौधा वृक्ष बनने तक सुरक्षित नहीं पहुंचता तो पौधरोपण का पूरा प्रयास केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। इसलिए अब अभियान की सफलता लगाए गए पौधों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके जीवित रहने की दर से मापी जानी चाहिए।
जंगलों का अर्थ पर्यावरण से कहीं अधिक
वन संरक्षण को केवल पर्यावरण का प्रश्न मानना भी पर्याप्त नहीं है। इसका सीधा संबंध कृषि, जल, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था से है। भारतीय कृषि का बड़ा हिस्सा आज भी वर्षा पर निर्भर है। वन वर्षाचक्र को संतुलित रखने, भूजल के पुनर्भरण, मिट्टी के कटाव को रोकने तथा नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यही नहीं, देश के करोड़ों लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वन आधारित आजीविका पर निर्भर हैं। बांस, लाख, शहद, तेंदूपत्ता और अनेक लघु वनोपज आज भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार हैं। वन केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि एक जीवंत आर्थिक और पारिस्थितिक तंत्र हैं।
जलवायु संकट में बढ़ी जिम्मेदारी
आज जलवायु परिवर्तन के प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। इस वर्ष भी देश के अनेक भागों में सामान्य से अधिक तापमान, असामान्य वर्षा और चरम मौसमी घटनाएं देखने को मिलीं। संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न जलवायु रिपोट्र्स लगातार चेतावनी दे रही हैं कि यदि प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले दशकों में जल संकट, जैव विविधता का ह्रास और खाद्य सुरक्षा की चुनौतियां और गहरी होंगी।
ऐसे समय में वन महोत्सव को केवल एक वार्षिक सरकारी कार्यक्रम के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह भी आवश्यक है कि पौधरोपण स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप हो। कई बार केवल लक्ष्य पूरा करने के लिए ऐसी प्रजातियां लगा दी जाती हैं, जो उस क्षेत्र की पारिस्थितिकी के अनुकूल नहीं होतीं। विशेषज्ञ लंबे समय से इस बात पर बल देते रहे हैं कि स्थानीय और देशज प्रजातियों को प्राथमिकता दी जाए, क्योंकि वही स्थानीय जलवायु, मिट्टी और वन्यजीवों के साथ बेहतर सामंजस्य स्थापित करती हैं। इसी प्रकार शहरों में भी केवल सजावटी पौधों के स्थान पर छायादार और दीर्घजीवी वृक्षों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
सरकारी अभियान से सामाजिक संस्कृति तक
वन महोत्सव की सबसे बड़ी सफलता तब होगी, जब यह सरकारी अभियान से आगे बढक़र सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बने। विद्यालयों में लगाए गए पौधों की जिम्मेदारी विद्यार्थियों को मिले, ग्राम पंचायतें सामुदायिक वन विकसित करें, नगर निकाय अपने हरित क्षेत्रों की नियमित निगरानी करें और प्रत्येक नागरिक अपने जीवन में कम-से-कम एक वृक्ष को सुरक्षित रखने का संकल्प ले।
पर्यावरण की रक्षा केवल कानूनों और योजनाओं से नहीं होती, बल्कि समाज की सहभागिता से होती है। वन महोत्सव हमें यही याद दिलाता है कि वृक्ष भविष्य की आवश्यकता नहीं, वर्तमान की अनिवार्यता हैं। पौधरोपण का महत्व तब सिद्ध होगा, जब लगाए गए पौधे आने वाले वर्षों में घने वृक्ष बनकर धरती को छाया, जल और जीवन दे सकें। हरियाली का वास्तविक विस्तार संख्या से नहीं, संरक्षण की निरंतरता से होता है। यही वन महोत्सव का मूल संदेश भी है।