
20 अगस्त…राजस्थान विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होगा, लेकिन चर्चा इसकी शुरुआत से ज्यादा, इसकी अवधि की है। महज एक सप्ताह का यह सत्र शुरू होने से पहले ही कई सवाल छोड़ रहा है। आखिर कौनसा 'अल नीनो' विधानसभा पर छा गया है, जो मानसून में भी लोकतंत्र का मौसम सूखा रहने वाला है?
यह विषय इसलिए भी बेहद अहम है, क्योंकि कुछ ही दिन पहले ही राजस्थान विधानसभा ने 75 वर्ष पूरे होने पर अमृत महोत्सव मनाया। मंच से संसदीय परंपराओं, घटती बैठकों, स्वस्थ बहस और लोकतांत्रिक मूल्यों पर लंबा चिंतन हुआ। पूर्व अध्यक्षों और संसदीय विशेषज्ञों ने विधानसभा को अधिक सक्रिय और प्रभावी बनाने पर जोर दिया, लेकिन समारोह की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि मानसून सत्र महज एक सप्ताह का तय हो गया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वह चिंतन केवल मंच तक ही सीमित था?
किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी विधायिका होती है। विधानसभा केवल कानून बनाने की संस्था नहीं, बल्कि सरकार और जनता के बीच सबसे मजबूत संवाद का मंच है। यहीं सरकार से जवाब मांगा जाता है, नीतियों की समीक्षा होती है और प्रशासन की जवाबदेही तय होती है।
सदन जितना अधिक चलेगा, शासन उतना ही अधिक जवाबदेह होगा। बैठकों का घटता कैलेंडर केवल तारीखें नहीं घटाता, जवाबदेही भी घटा देता है।
आंकड़े भी यही कहानी कहते हैं। पहली और दूसरी विधानसभा को छोड़ दें तो 300 बैठकों का मानक कभी पूरा नहीं हो पाया। कई वर्षों में तो 30 बैठकें भी नहीं हुईं। नतीजा यह हुआ कि सत्र जनसरोकारों पर गंभीर विमर्श का मंच कम और संवैधानिक औपचारिकता अधिक दिखाई देने लगा। सबसे ज्यादा फिक्र जनता की है, जिसकी उम्मीदें विधानसभा पर ही टिकी रहती हैं।
यह भी किसी से छिपा नहीं कि हर विधायक के लिए मंत्री तक सीधी पहुंच आसान नहीं होती। कई मंत्री विधानसभा सत्र के अलावा जनप्रतिनिधियों से मिलने का समय ही नहीं निकाल पाते। ऐसे में सदन ही वह अवसर होता है, जब विधायक अपने क्षेत्र की सड़क, अस्पताल, स्कूल, पेयजल, सिंचाई, बिजली या कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सरकार से सीधे जवाब मांग सकता है। यदि वही अवसर सीमित कर दिया जाए, तो सबसे बड़ी कीमत जनता ही चुकाती है।
प्रदेश आज भी अनगिनत चुनौतियों से घिरा है। कहीं किसान बारिश और सिंचाई को लेकर चिंता में है, कहीं शहर जलभराव और ट्रैफिक से जूझ रहे हैं। अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी है, स्कूलों में शिक्षकों के पद खाली हैं। पेयजल संकट और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे हर जिले का सच है।
इस बार सत्र का महत्व इसलिए भी अधिक था, क्योंकि प्रदेश पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों की दहलीज पर खड़ा है। यही वह समय होता है, जब गांव से शहर तक की छोटी-बड़ी समस्याएं सबसे तीखे रूप में सामने आती है। विधानसभा उन आवाजों को सरकार तक पहुंचाने का सबसे बड़ा मंच बन सकती थी। चुनाव से पहले जनप्रतिनिधियों को अपने क्षेत्रों की अधूरी योजनाओं और स्थानीय समस्याओं पर सरकार से जवाब मांगने का पूरा अवसर मिलना चाहिए था। लेकिन विडंबना देखिए, जब संवाद की सबसे ज्यादा जरूरत है, तभी संवाद का समय सबसे कम कर दिया गया।
चिंता केवल बैठकों की संख्या तक सीमित नहीं है। प्रश्नकाल की स्थिति भी कम गंभीर नहीं। वर्षों से हजारों प्रश्नों के उत्तर लंबित पड़े हैं। मौजूदा सरकार के भी सैकड़ों प्रश्न अब तक अनुत्तरित हैं। विधानसभा में पूछा गया हर प्रश्न हजारों नागरिकों की अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है। यदि जवाब समय पर न मिलें और सत्र भी छोटा होता जाए, तो जवाबदेही का सबसे प्रभावी तंत्र धीरे-धीरे खोखला होने लगता है।
अमृत महोत्सव मनाना आसान है, लोकतंत्र को अमृत देना कठिन। विधानसभा जितनी अधिक बैठेगी, उतनी अधिक सुनेगी; जितनी अधिक सुनेगी, उतना ही बेहतर शासन दे सकेगी। यह सदन 75 वर्षों की उस लोकतांत्रिक परंपरा का प्रतिनिधि है, जिसने हर कठिन दौर में जनता की आवाज को मंच दिया है। कसूर सदन का नहीं, उसे सीमित कर देने वाली सोच का है। लोकतंत्र की उम्र चुनावों से नहीं, उसके भीतर होने वाली बहसों से तय होती है। ध्यान रहे, लोकतंत्र में सबसे खतरनाक सन्नाटा वही होता है, जो विधानसभा के भीतर पसरने लगे। इतिहास जब इसका हिसाब लिखेगा, तो सवाल सदन से नहीं, उसे खामोश करने वालों से पूछेगा।
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