अब यह केंद्र सरकार और संबंधित संवैधानिक संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि नागरिकता की परख के मानदंडों को स्पष्ट और न्यायसंगत बनाया जाए। लेकिन वैध नागरिकों के मताधिकार को मजबूत करने वाली पहल अर्थात एसआइआर, पर केवल राजनीतिक कारणों से प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। बेहतर यही होगा कि विपक्षी दल इस फैसले को स्वीकार करें और चुनावों के दौरान अनावश्यक विवाद खड़े करने से बचें।
प्रियरंजन भारती, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार
एसआइआर कोई चुनावी मुद्दा नहीं बन सका। हाल के विधानसभा चुनावों के नतीजे पहले ही इस बात को स्थापित कर चुके हैं। इसे जबरिया मुद्दा बनाने की कोशिशें की गईं, मगर मतदाताओं ने इसे वाजिब माना ही नहीं। यदि ऐसा होता, तो इसका असर चुनाव परिणामों पर दिखाई देता। बल्कि इसके विपरीत प्रभाव यह पड़ा कि मतदाताओं ने निष्पक्ष और साफ-सुथरे मतदान के प्रयासों को प्रभावित करने की कोशिशों को स्वीकार नहीं किया। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम इस बात के प्रत्यक्ष और सशक्त उदाहरण हैं। ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को लेकर व्यापक विरोध जताया और अदालतों में स्वयं पक्ष रखने तक पहुंच गईं। उनका आरोप था कि चुनाव आयोग केंद्र में सत्तारूढ़ दल के इशारे पर उनके समर्थकों के वोट साजिश के तहत हटाने का काम कर रहा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर विशेष पर्यवेक्षकों की निगरानी में एसआइआर की प्रक्रिया पूरी की गई।
इस दौरान टीएमसी समर्थकों ने अनेक स्थानों पर विरोध-प्रदर्शन किए और इस अभियान में जुटे अधिकारियों तथा कर्मचारियों के साथ जोर-जबरदस्ती की। इसके बावजूद चुनाव परिणाम यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि जनता ने टीएमसी और ममता बनर्जी के इन प्रयासों को न केवल खारिज किया, बल्कि एसआइआर को निष्पक्ष चुनाव के एक आवश्यक और उचित प्रयोग के रूप में स्वीकार किया। यदि यह कहा जाए कि पश्चिम बंगाल में पहले से भय और दबाव के माहौल में रहने वाले मतदाताओं को एसआइआर ने स्वतंत्र और निर्भय होकर मतदान करने के लिए प्रोत्साहित किया, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करने के लिए जितने उपाय किए गए, उनमें एसआइआर का योगदान भी महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है।
झूठ और दुष्प्रचार अधिक समय तक टिक नहीं सकते
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि एसआइआर न तो अवैध है और न ही इसकी उपयोगिता पर अनावश्यक प्रश्नचिह्न लगाया जा सकता है। इस निर्णय ने जनता के उस विश्वास को और अधिक मजबूत आधार प्रदान किया है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए एसआइआर जैसी प्रक्रिया आवश्यक है। वास्तव में सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश उन लोगों के लिए बड़ा झटका है, जो लगातार यह प्रचार कर रहे थे कि चुनाव आयोग केंद्र सरकार के कहने पर एसआइआर के बहाने चुनावी मनमानी करने में जुटा है। इस आदेश ने यह भी सिद्ध कर दिया कि झूठ और दुष्प्रचार अधिक समय तक टिक नहीं सकते। किसी वैध और आवश्यक प्रक्रिया को केवल प्रचार के आधार पर रोका नहीं जा सकता।
लोकतंत्र में जनविश्वास सर्वोपरि
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से असहमति हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र में जनविश्वास सर्वोपरि होता है। इस अभियान की सार्थकता भी जनता के इसी भरोसे में निहित दिखाई देती है। यही कारण है कि मतदाताओं ने राजनीतिक दलों के एसआइआर-विरोधी प्रचार को सच के रूप में स्वीकार नहीं किया। स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि एसआइआर का विरोध कुंठा से अधिक कुछ नहीं है। निष्पक्ष चुनावों की पहली शर्त यह है कि केवल वैध मतदाता ही भयमुक्त वातावरण में मतदान करें। किसी व्यक्तिके वैध मतदाता होने या न होने का निर्धारण करने के लिए आवश्यक जांच-पड़ताल करना चुनाव आयोग का अधिकार भी है और दायित्व भी।
नहीं प्रस्तुत कर सके ठोस उदाहरण
यह आश्चर्यजनक है कि कुछ राजनीतिक दल चुनाव आयोग के इसी अधिकार को चुनौती देते हुए यह आरोप लगा रहे थे कि आयोग इस बहाने उनके समर्थकों के वोट काटने की साजिश कर रहा है। ऐसे आरोपों के माध्यम से यह वातावरण बनाने का प्रयास किया गया कि यह अभियान केंद्र सरकार की कथित चुनावी साजिश का हिस्सा है। हालांकि, इन लोगों ने कभी यह बताने का प्रयास नहीं किया कि जिनके नाम मतदाता सूचियों से हटाए जा रहे हैं, वे वास्तव में उनके समर्थक ही हैं या नहीं। पश्चिम बंगाल से पहले बिहार में भी इसी प्रकार की आशंकाएं और आरोप लगाए गए थे। बिहार में एसआइआर के दौरान जब लगभग 65 लाख अप्रासंगिक या अनावश्यक नाम मतदाता सूची से हटाए गए, तब भी शोर मचाया गया कि वैध मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं। लेकिन ऐसे आरोप लगाने वाले कुछ दर्जन ठोस उदाहरण भी प्रस्तुत नहीं कर सके।
केंद्र सरकार एनआरसी जैसे विषयों पर स्पष्ट नीति विकसित करे
बिहार विधानसभा चुनाव में भी एसआइआर कोई बड़ा चुनावी मुद्दा नहीं बन सका। इसे मुद्दा बनाने की कोशिश करने वाले राजनीतिक दल जनता की मनोदशा को समझने में असफल रहे। परिणाम ऐसे आए कि हवा बनाने वाले स्वयं राजनीतिक हवा में उड़ गए। विडंबना यह है कि बिहार चुनाव परिणामों से भी इनकी सोच में कोई बदलाव नहीं आया और असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु तथा केरल में भी एसआइआर के विरोध का वही क्रम जारी रहा। इन राजनीतिक दलों को इस बात पर भी आपत्ति थी कि एसआइआर के बहाने लोगों की नागरिकता की जांच की जा रही है, जबकि चुनाव आयोग को ऐसा करने का अधिकार नहीं है। अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि मतदाता सूची में नाम शामिल करने की प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग नागरिकता से संबंधित आवश्यक जांच कर सकता है। आखिर इसी आधार पर यह तय किया जा सकता है कि संबंधित व्यक्ति भारत का वैध नागरिक है या नहीं। इसके साथ ही यह तथ्य भी सामने आया है कि नागरिकता की जांच के लिए स्पष्ट और पारदर्शी मानदंड होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि चुनाव आयोग की जांच को नागरिकता संबंधी अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि केंद्र सरकार राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) जैसे विषयों पर स्पष्ट नीति और व्यवस्था विकसित करे।
फैसले को स्वीकार करें विपक्षी दल
अब यह केंद्र सरकार और संबंधित संवैधानिक संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि नागरिकता की परख के मानदंडों को स्पष्ट और न्यायसंगत बनाया जाए। लेकिन वैध नागरिकों के मताधिकार को मजबूत करने वाली पहल अर्थात एसआइआर, पर केवल राजनीतिक कारणों से प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। बेहतर यही होगा कि विपक्षी दल इस फैसले को स्वीकार करें और चुनावों के दौरान अनावश्यक विवाद खड़े करने से बचें। जनता अब एसआइआर और वोट चोरी जैसे आरोपों को संदेह की दृष्टि से देखने लगी है। यदि इन आरोपों में वास्तविकता होती, तो चुनाव परिणामों पर उसका प्रभाव भी दिखाई देता।
मतदाता को भ्रमित नहीं किया जा सकता
हार के बाद लगातार एक ही प्रकार के बहाने दोहराना जनता को स्वीकार्य नहीं है। जीत के समय वोट चोरी और एसआइआर की चर्चा न करने वाले दलों को यह समझना चाहिए कि समझदार मतदाता को लंबे समय तक भ्रमित नहीं किया जा सकता। जनता अब यह भली-भांति समझ चुकी है कि कई बार अपनी राजनीतिक कमजोरियों को छिपाने के लिए ऐसे आरोप लगाए जाते हैं। इसलिए दूसरों पर आरोप लगाने के बजाय आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता अधिक है। यदि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से राजनीतिक दलों को यह समझ विकसित हो जाए, तो लोकतंत्र और चुनावी व्यवस्था दोनों के लिए यह एक सकारात्मक संकेत होगा।