Chhattisgarh politics: खाद-बीज का संकट गहराता है। विपक्ष मुखर होता है। सत्ता पक्ष चिंता करता है, फिर भी इसका हल नहीं निकलता है।
किसान अब अन्नदाता के केंद्र बिंदु से उठकर वोटदाता बन गया है। दरअसल, यह बात पिछले कुछ दशकों से राजनीतिक दलों की सोच में देखी जा सकती है। यही वजह है कि राजनीतिक दल इसका फायदा उठाने से भी नहीं चूकते हैं। हम देश-दुनिया नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की बात करेंगे। छत्तीसगढ़ की राजनीति हमेशा से किसानों के ईदगिर्द घूमती नजर आती है। पिछले दो विधानसभा चुनावों में किसान फैक्टर मजबूती के साथ सामने आया था। राजनीतिक दल को सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाने में जमीन चीर कर उम्मीद बोने वाले किसानों का बड़ा योगदान था। इसके बाद भी हमारे अन्नदाता राजनीति का शिकार होते आए है। राजनीतिक दलों की मंशा देखकर ऐसा लगता है, मानों जब वो विपक्ष हैं, तभी तक किसान हितैषी होते हैं। पता नहीं सत्ता की चमक और धमक के आगे किसानों की दुख और तकलीफ क्यों दिखाई-सुनाई नहीं देती। वे खुलकर नहीं बोलते या फिर समस्या की अनदेखी कर देते हैं। सत्ता की किसानों के प्रति चिंता सरकारी बैठकों में या फिर उनके भाषणों में ज्यादा नजर आती है। या फिर यह कहें कि सत्ता विपक्ष और किसानों के बीच लालफीताशाही दीवार बनकर खड़ी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण प्रदेश में खेती-किसानी का मौसम शुरू होने से पहले गहराया खाद-बीज का संकट है। ऐसा नहीं है कि यह संकट पहली बार आया हो। फिर भी सत्ता किसी की भी हो लालफीताशाही ने किसानों के भाग्य में इस संकट को लिख दिया है। किसान को फसल बोने से ज्यादा चिंता खाद-बीज की हो जाती है। यही कर्ज की वजह बनते हैं और यहीं से किसानों की हालत खस्ता होना शुरू होती है। शायद यही वजह है कि सत्ता में किसान हितैषी सरकार भी बैठ जाए, तो भी बलि का बकरा किसानों को ही बनना पड़ा है।
प्रदेश में खाद के संकट को हम आंकड़ों से समझ सकते हैं। खरीफ सीजन 2025 के लिए सहकारिता के लिए 10.72 लाख मीट्रिक टन का लक्ष्य है। इसके विरूद्ध 4.10 लाख मीट्रिक टन का भण्डारण हुआ है, जो कि लक्ष्य का मात्र 38.23 प्रतिशत है। किसानों को सबसे ज्यादा दिक्कत डीएपी खाद को लेकर आ रही है। किसान मजबूरी में महंगे दाम पर बाहर से खाद खरीदने को मजबूर हैं। इसे लेकर विपक्ष मुखर हो गया है। वहीं सरकार चिंता कर रही है। यानी जो विपक्ष में रहता है, वो ऑटोमेटिक किसानों का सच्चा हितैषी बन जाता है। पिछले दो दशक ऐसे कई उदाहरणों से भरे पड़े हैं। अब किसानों को अपनी समझदारी दिखानी होगी, ताकि उनको उनका हक मिल सके।