
-अद्विक चौधरी और डॉ. शशि सिंघवी
NEET Exam Academic Stress: पिछले साल की गर्मियों की छुट्टियों में दसवीं क्लास के स्टूडेंट के तौर पर मुझे संयुक्त राज्य अमेरिका में एक कार्डियोवैस्कुलर सर्जन के मार्गदर्शन में एक हफ्ते के लिए क्लिनिकल ऑब्जर्वेशन प्रोग्राम (अमेरिका में इसे शैडोइंग कहा जाता है) का अनुभव मिला। इस दौरान मैंने देखा कि सर्जन एक काटी गई नस की सिलाई कर रहे थे। यह नस उस दिल की थी, जिसने धड़कना बंद कर दिया था, जबकि बाईपास मशीन के जरिए मरीज को जीवित रखा गया था। जब सर्जन ने टिशू को कॉटराइज किया तो मुझे एक अनजानी, परेशान करने वाली गंध आई। इसकी वजह से मुझे सीधा खड़ा रहने में भी परेशानी हुई।
सर्जरी होने के बाद डॉक्टर ने मरीज की पत्नी को बताया कि ऑपरेशन सफल रहा। डॉक्टर की यह बात सुनकर मरीज की पत्नी के चेहरे पर सुकून दिखा, जो थोड़ी देर पहले तक तनाव और चिंता से भरा था। उस एक सप्ताह ने डॉक्टर को लेकर मेरे मन में टीवी पर आने वाली जो नाटकीय छवि बनी थी, उसे हकीकत की तस्वीर में बदल दिया। उसी पल मुझे पूर्ण विश्वास हो गया कि यही वह करियर है, जो मुझे अपनाना है। लेकिन जब मैं भारत में अपने रिश्तेदार-दोस्तों से बात करता हूं, तो डॉक्टर बनने का उनका रास्ता बिल्कुल अलग दिखता है।
अमेरिका में मेडिकल एजुकेशन के अंतर्गत सबसे पहले चार साल का अंडरग्रेजुएट प्रिपेरेटरी (प्री मेडिकल) फेज होता है। इस बफर पीरियड के दौरान छात्र डॉक्टरों के मार्गदर्शन में अपनी रुचि और क्षमता को परखते हैं। साथ ही, इस पेशे को नजदीक से समझते हैं। भारत में 17-18 साल का छात्र NEET परीक्षा देता है। इसके बाद वह सीधे MBBS में प्रवेश लेता है और 22 साल की उम्र में प्रैक्टिस शुरू कर सकता है। लेकिन इस यात्रा को एक व्यवसायिक कोचिंग सिस्टम ने हाईजैक कर लिया है। हजारों किशोर बायोलॉजी के जटिल कॉन्सेप्ट को सिर्फ रटते हैं। फिजिक्स के सवालों को तब तक हल करते हैं, जब तक थक ना जाएं। यह सब वे सिर्फ नीट की परीक्षा पास करने के लिए करते हैं। उनका तब तक जीवन में अस्पताल से सामना बतौर मरीज के रूप में ही हुआ होता है, जबकि पेशेवर अनुभव के विषय में उन्हें कोई जानकारी नहीं होती है। फिर भी वे जीवन भर का फैसला ले लेते हैं।
इस लेख की को-ऑथर डॉ. शशि सिंघवी ने पब्लिक हेल्थ में पिछले पांच दशकों में इस पीढ़ीगत बदलाव को देखा है। वह SMS मेडिकल कॉलेज में पैथोलॉजी की पूर्व हेड हैं और राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज की वाइस-चांसलर रह चुकी हैं। उनका कहना है कि हमने नीट प्रवेश परीक्षा को पूरे पेशे पर हावी होने दिया है। उन्होंने कहा कि अब यह नीट परीक्षा एक अकादमिक मेरिट रेस में तब्दील हो गई है।
सिंघवी ने कहा कि टॉप रैंक वाले छात्र MBBS के पहले साल में ही भारी सदमे से गुजरने लगते हैं। उनमें से कई में क्लिनिकल वातावरण का तनाव सहन करने की मानसिक मजबूती नहीं होती है। वे मरीजों से बातचीत करने में असहज हो जाते हैं और अस्पताल के भागदौड़ वाले माहौल में बहुत जल्द थक जाते हैं। उन्होंने कहा कि हम बड़े पैमाने पर बेहतरीन टेस्ट देने वाले स्टूडेंट्स तैयार कर रहे हैं, लेकिन ऐसे नैचुरल केयरगिवर्स को तैयार करने में फेल हो रहे हैं, जिनमें देखभाल करने की स्वाभाविक समझ हो।
यह साफ है कि भारत में मेडिसिन की पढ़ाई करने वाले स्टूडेंट्स के लिए मौकों की बड़ी कमी है। नेशनल मेडिकल कमीशन ने एमबीबीएस के पाठ्यक्रम में AETCOM (एटीट्यूड, एथिक्स और कम्युनिकेशन) मॉड्यूल शुरू करके इस कमी को पूरा करने की कोशिश की है। लेकिन,जब कोई स्टूडेंट प्रोफेशन चुन चुका होता है, तो उसे सहानुभूति और क्लिनिकल लचीलापन सिखाने की कोशिश करना देर से उठाया गया कदम है।
इसके अलावा वर्तमान व्यवस्था में गहरी असमानता भी है। सिर्फ वे छात्र जो डॉक्टर परिवारों से आते हैं, उन्हें ही अनौपचारिक रूप से अस्पताल देखने का मौका मिल पाता है। किसी सरकारी स्कूल का होनहार छात्र तो इससे पूरी तरह वंचित रहता है।
हमारी राय में इस समस्या का समाधान राजस्थान प्री-मेडिकल क्लिनिकल ऑब्जर्वेशन हो सकता है। इस योजना को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया जा सकता है। इसके जरिए राजस्थान में एक सुनियोजित, सुव्यवस्थित और केवल ऑब्जर्वेशन-आधारित क्लिनिकल एक्सपोजर कार्यक्रम शुरू करके कक्षा 11 और 12 के विज्ञान छात्रों को मौका दे सकते हैं। यह कार्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 की धारा 4.26 को लागू करके किया जा सकता है। ताकि सीनियर सेकेंडरी के छात्र विशेषज्ञों की निगरानी और उनके मार्गदर्शन में व्यावसायिक ज्ञान भी हासिल कर सकें।
छुट्टियों के दौरान इच्छुक छात्रों को एक सप्ताह या अधिक वक्त के लिए एक सेंट्रलाइज ऑब्जर्वेशन रोटेशन प्रक्रिया से गुजारा जा सकता है। भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था को समझने के लिए छात्र को सरकारी/निजी मेडिकल कॉलेज, अस्पताल और कम से कम एक दिन ग्रामीण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भी समय बिताना होगा। यह ‘जीरो-टच’ प्रोटोकॉल होगा। इस दौरान छात्र सिर्फ चिकित्सकीय कामकाज को देखेंगे। इस दौरान मरीजों को यह अधिकार होगा कि वह चाहें तो छात्र (ऑब्जर्वर) को वहां से जाने के लिए भी कह सकते हैं। अस्पताल के नियम, बायो-सेफ्टी और मरीज की गोपनीयता से जुड़ी प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी लेने और उनके पालन के साथ ही वार्ड विजिट होगी।
इसमें सभी की सहभागिता हो, यह सुनिश्चित करने के लिए सरकारी स्कूलों के छात्रों के लिए सभी ऑब्जर्वेशन स्लॉट में से कम से कम 25 प्रतिशत आरक्षण रखा जाए। उनके आने-जाने और रहने आदि का खर्च CSR फंड से उठाया जा सकता है।
इस प्रोग्राम पर अमल के लिए हमें डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्टर विकसित करना होगा, जिसके तहत एक केंद्रीयकृत डिजिटल पोर्टल के माध्यम से अस्पताल उपलब्ध स्लॉट घोषित करेंगे। फिर स्कूल छात्रों की पात्रता सत्यापित करेंगे और पारदर्शी तरीके से उनका मिलान होगा। कार्यक्रम पूरा करने और पोर्टल पर इस बारे में एक निबंध पब्लिश करने पर छात्र को डिजिटल सर्टिफिकेट ऑफ क्लिनिकल ओरिएंटेशन मिलेगा। यह सर्टिफिकेट NEET में कोई वेटेज नहीं रखेगा, बल्कि छात्र की करियर के प्रति सोच की स्पष्टता को दर्शाएगा।.
राजस्थान कोचिंग सेंटरों का केंद्र होने के कारण इस पायलट के लिए बेहतर स्थान है। इससे न सिर्फ नैतिक रूप से मजबूत और जुनूनी डॉक्टर तैयार होंगे, बल्कि बार-बार NEET देने की थकान भी कम होगी। आंकड़े बताते हैं कि 60% से ज्यादा NEET रिपीटर छात्रों में डिप्रेशन और एंग्जायटी का खतरा अपेक्षाकृत ज्यादा होता है।
हर साल लाखों छात्र बार-बार ली जाने वाली प्रवेश परीक्षाओं की जाल में फंस कर जीवन के सबसे कीमती साल बर्बाद करते हैं। किसी कैजुअल्टी वार्ड में एक हफ्ते का अनुभव उनके लिए सच्चाई का आईना बन सकता है। इससे उन्हें खुद अहसास हो सकता है कि वे मेडिसिन फील्ड के लिए कितने उपयुक्त हैं। वे इस आधार पर अपने लिए दूसरा बेहतर रास्ता भी चुन सकेंगे। इस तरह न केवल उनका समय बचेगा, बल्कि वे उस क्षेत्र में भी जा सकेंगे जहां सही मायने में बेहतर प्रदर्शन कर सकेंगे।
हम फैक्टरियों की तरह चल रहे कोचिंग संस्थानों से मेडिकल स्टूडेंट्स बनाना जारी नहीं रख सकते हैं, जिनमें मरीजों की सेवा का भाव ही नहीं रह जाता। समय आ गया है जब भारत के भावी डॉक्टर्स परीक्षा में बैठने से पहले अस्पतालों के वार्ड को देखें-समझें।
(लेखक अद्विक चौधरी 11वीं कक्षा के साइंस स्टूडेंट हैं, जो मेडिकल में जाने से पहले के अवसरों की वकालत करते हैं। डॉ. शशि सिंघवी अनुभवी पैथोलॉजिस्ट हैं। उन्हें राजस्थान में पब्लिक हेल्थ और मेडिकल एजुकेशन के क्षेत्र में 5 दशकों से अधिक का अनुभव है।)